इमरान खान ने टेके आतंकियों के सामने घुटने, तहरीक-ए-तालिबान के साथ गुप्त समझौते पर हुए राजी

पाकिस्तान की पहले टीएलपी के साथ और अब टीटीपी के साथ तथाकथित शांति संधि देश की आतंकवाद विरोधी नीति की 'गंभीर वास्तविकता' को उजागर करती है। यह एक तथ्य है, जिस पर फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) को अपनी अगली बैठक में ध्यान देना चाहिए।

फोटोः IANS
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नवजीवन डेस्क

पाकिस्तान ने एक बार फिर आतंकियों के सामने घुटने टेक दिए हैं। खबर है कि पाक पीएम इमरान खान आतंकवादी संगठन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के साथ गुप्त शांति समझौते पर हस्ताक्षर करने को राजी हो गए हैं। जबकि टीटीपी 130 से अधिक स्कूली बच्चों सहित कई हजार नागरिकों की हत्या में शामिल रहा है।

आतंकियों के सामने इस तरह का जघन्य आत्मसमर्पण शायद ही कभी पाकिस्तान के अलावा कहीं और हुआ हो। आतंकवादी समूहों के साथ तथाकथित शांति संधि, पहले टीएलपी के साथ और अब टीटीपी के साथ, पाकिस्तान की आतंकवाद विरोधी नीति की 'गंभीर वास्तविकता' को उजागर करती है। यह एक तथ्य है, जिसे फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) को अपनी अगली बैठक में ध्यान देना चाहिए।

पाकिस्तान में, इस तरह के शांति सौदे एक सामान्य विशेषता बन गए हैं, क्योंकि आतंकवादियों का इस्तेमाल राजनीतिक और सैन्य शक्ति के साधन के रूप में किया जाता है। चाहे वह जनरल परवेज मुशर्रफ हों, जिन्होंने सभी प्रकार के आतंकवादियों के साथ सौदे किए हों या प्रधानमंत्री इमरान खान, आतंकवादी समूहों को उनके समर्थकों और संरक्षकों के बीच अपार दबदबा के लिए तैयार किया गया है। ये समूह सेना और राजनीतिक दलों के लिए चुनावों और राष्ट्रीय विमर्श में हेरफेर करने के काम आए हैं।

अपने पूर्ववर्तियों की तरह, इमरान खान ने भी टीटीपी के साथ शांति समझौते की रूपरेखा को गुप्त रखने का फैसला किया है। जनता, हमेशा की तरह टीटीपी को दी जाने वाली रियायतों से अनभिज्ञ रहती है। टीटीपी उस समय तक पाकिस्तान के लिए सबसे बड़े खतरों में से एक था, जब तक उसे 'भारतीय और अमेरिकी एजेंसियों द्वारा वित्त पोषित' करार दिया जाता रहा था।


सवाल उठना लाजिमी है कि इमरान खान पहले से ही कमजोर उग्रवादी समूह द्वारा निर्धारित शर्तो को स्वीकार करने के लिए अपने रास्ते से क्यों हट रहे हैं? इमरान खान लंबे समय से टीटीपी और अन्य उग्रवादी समूहों के समर्थक रहे हैं और इसी कारण उन्हें 'तालिबान खान' की उपाधि मिली थी। प्रधानमंत्री के रूप में एक बड़ी विफलता और सेना के साथ संबंधों में खटास का सामना करते हुए इमरान ने हाइब्रिड शासन में अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान (टीएलपी) और टीटीपी जैसे आतंकवादी समूहों का समर्थन करने का फैसला किया है।

इमरान पहले ही टीएलपी के सामने घुटने टेक चुके हैं और अब टीटीपी के सामने झुकना चाहते हैं। उनके किए गुप्त सौदे के तहत जेल में बंद कई टीटीपी आतंकवादियों को पहले ही रिहा किया जा चुका है। यह देखा जाना बाकी है कि क्या वह उग्रवादी संगठन द्वारा निर्धारित एक और कठिन शर्त को स्वीकार करेंगे?

देश में शरीयत के अपने संस्करण को लागू करने के लिए साल 2008-2009 में तत्कालीन सरकार ने टीटीपी के साथ समझौता किया था और संघर्षविराम के बाद आतंकवादी संगठन को स्वात घाटी में अपनी स्थिति मजबूत करने की अनुमति दी थी। इससे सेना को उस समूह के खिलाफ एक आक्रामक अभियान शुरू करने के लिए मजबूर होना पड़ा और इससे नागरिकों और सुरक्षा कर्मियों के बीच से कई हताहत हुए थे।

लेकिन लगता है कि इमरान खान हाल की असफलताओं के इतिहास से सीखने के मूड में नहीं हैं। उन्हें इस बात की चिंता नहीं है कि टीएलपी और टीटीपी के प्रति उनका समर्पण पाकिस्तान में 250 से अधिक धार्मिक संगठनों को किस तरह का संदेश भेजेगा।


इससे भी बुरी बात यह है कि इमरान खान ने तालिबान के आंतरिक मंत्री सिराजुद्दीन हक्कानी को बातचीत के लिए बुलाया है। हक्कानी अपने स्वयं के एजेंडे के साथ एक प्रसिद्ध आतंकवादी नेता है जो अफगानिस्तान में इमरान खान के धोखेबाज खेलों के अनुरूप नहीं हो सकता है। हक्कानी कबीले की मदद लेकर, इमरान खान ने अपना रुतबा छोटा कर लिया है और इस क्षेत्र में अपने देश के सुरक्षा हितों से समझौता किया है। टीएलपी और टीटीपी के साथ उनका एक के बाद एक समझौता निकट भविष्य में उनके लिए बड़ी मुसीबत साबित हो सकता है।

(आईएएनएस के इनपुट के साथ)

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