केरल को नशामुक्त और सामाजिक बुराइयों से सुरक्षित रखने की कवायद, UDF सरकार का ड्रग माफिया पर ‘तूफानी’ प्रहार
दशकों तक केरल को देश के सबसे प्रगतिशील राज्यों में गिना जाता रहा। यहां की उच्च साक्षरता दर, बेहतरीन स्वास्थ्य सेवाएं और जागरूक नागरिक समाज को देख माना जाता था कि केरल नशामुक्त और सामाजिक बुराइयों से सुरक्षित रहेगा।

केरल में 1 जून को शुरू हुआ ‘ऑपरेशन तूफान: द नार्को हंट’ खुली स्वीकारोक्ति है कि राज्य में नशीले पदार्थ बड़ा सामाजिक संकट बन चुके हैं। यूडीएफ सरकार बनने के कुछ ही हफ्तों के भीतर गृहमंत्री रमेश चेन्निथला द्वारा घोषित यह अभियान, नई सरकार का पहला बड़ा और कड़ा फैसला है। यह दिखाता है कि सरकार उस मुद्दे पर कितनी गंभीर है, जो विधानसभा चुनाव के दौरान जनता में चर्चा का सबसे बड़ा केंद्र था।
अभियान के पहले ही दिन 100 से ज्यादा मुकदमे दर्ज कर 137 लोगों को गिरफ्तार किया गया और एमडीएमए (जिसे आमतौर पर एक्स्टसी कहा जाता है) समेत जैसी सिंथेटिक ड्रग्स जब्त कीं। तीन दिनों में आंकड़ा बढ़कर 340 केस और 368 गिरफ्तारियों तक पहुंच गया। कार्रवाई की अहमियत सिर्फ इसके पैमाने में नहीं, बल्कि यह उस कड़वी हकीकत को उजागर करती है जो राज्य में सालों से धीरे-धीरे पैर पसार रही थी।
दशकों तक केरल को देश के सबसे प्रगतिशील राज्यों में गिना जाता रहा। यहां की उच्च साक्षरता दर, बेहतरीन स्वास्थ्य सेवाएं और जागरूक नागरिक समाज को देख माना जाता था कि केरला नशामुक्त और सामाजिक बुराइयों से सुरक्षित रहेगा। लेकिन हालिया सबूतों ने यह धारणा तोड़ दी। एमडीएमए, मेथामफेटामाइन और डिजाइनर ड्रग्स ने चुनौती का चेहरा बदल दिया है। पारंपरिक नशीले पदार्थों (जैसे गांजा) के उलट, ये हाई-टेक नेटवर्क से बेची जा रही हैं। इसमें डिजिटल प्लेटफॉर्म का खुलकर इस्तेमाल हो रहा है। इस संकट को सिर्फ पुलिसिया जब्ती या गिरफ्तारी आंकड़ों से नहीं नाप सकते; इसकी भयावहता यह है कि यह जहर स्कूलों, कॉलेजों, मोहल्लों और हंसते-खेलते परिवारों तक पहुंच चुका है।
नशीली दवाओं के आंकड़े आंखें खोलने वाले हैं। केरला में कुछ सालों में ड्रग्स से जुड़े अपराधों में रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई। सिर्फ 2024 में एनडीपीएस एक्ट के तहत 27,000 से ज्यादा मामले दर्ज किए गए। इस आंकड़े ने केरला को देश के उन शीर्ष राज्यों में शुमार कर दिया, जहां आबादी के अनुपात में ड्रग्स से जुड़े अपराधों की दर सबसे ज्यादा है। 2020-2024 में राज्य में एनडीपीएस के कुल मामले 87,000 को पार कर गए, जो बताता है कि यह जाल कितनी तेजी से फैला है। अगस्त 2025 तक अकेले आबकारी विभाग ने 8,622 मामले दर्ज कर 8,500 लोगों को जेल भेजा।
शहरों में भी हालात उतने ही चिंताजनक हैं। एनसीआरबी की 2023 की रिपोर्ट के मुताबिक, व्यक्तिगत इस्तेमाल के लिए ड्रग्स रखने के मामलों में कोच्चि देश में मुंबई के बाद दूसरे नंबर पर था। मुंबई की तुलना में कोच्चि की आबादी बहुत कम है, लेकिन इसके बावजूद यहां प्रति लाख आबादी पर अपराध की दर 245 मामले थी, जो मुंबई से कई गुना अधिक है। ये आंकड़े बताते हैं कि केरल में नशीले पदार्थों की समस्या अब कस्बों और शहरों की जड़ों तक धंस चुकी है, जिसके लिए ठोस और कड़े नीतिगत फैसलों की जरूरत है।
साथ ही, राज्य में बिक रहे नशीले पदार्थों का ट्रेंड भी बदला। पहले जहां मुख्यतः गांजा पकड़ा जाता था, आज एमडीएमए जैसी सिंथेटिक नशीली दवाएं मिल रही हैं। पिछले एक दशक में साइकोट्रोपिक पदार्थों की जब्ती में भारी उछाल आया है। गांजे का चलन आज भी है, लेकिन सिंथेटिक ड्रग्स का यह दौर कहीं खतरनाक है। इन दवाओं को छिपाना, लाना-ले जाना और बेचना बेहद आसान होता है, और तस्करों को भी कई गुना मुनाफा मिलता है।
हाल के दिनों में ड्रग्स की बड़ी खेप पकड़ा जाना आम हो गया है। पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों ने सैकड़ों ग्राम से लेकर एक-एक किलो तक एमडीएमए बरामद किया है, जिनके तार दूसरे राज्यों और अंतरराष्ट्रीय तस्करी नेटवर्क से जुड़े पाए गए। उदाहरण के लिए, पिछले साल तिरुवनंतपुरम में पुलिस ने कई करोड़ मूल्य का 1.2 किलोग्राम से अधिक एमडीएमए जब्त किया था। राज्य भर में हुए ऐसे ही ऑपरेशनों से पता चला है कि केरल के ड्रग तस्करों का नेटवर्क पड़ोसी राज्यों और विदेशों से जुड़ा है।
आज के इस संकट और पहले की नशीली दवाओं की समस्या में सिर्फ मात्रा का अंतर नहीं, बल्कि तस्करी के हाई-टेक तरीकों का भी है। अब यह पूरा धंधा कूरियर सेवाओं, एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप्स और सोशल मीडिया के जरिये चल रहा है, जिससे छोटी और गुप्त खेपों को पकड़ना बेहद मुश्किल हो जाता है। पुलिस जांच में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि माफिया अब छात्रों और युवाओं को ही पेडलर्स0 के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। हॉस्टल, किराये के कमरे और कोचिंग हब अब नशीली दवाओं की डिलीवरी के मुख्य पॉइंट बन गए हैं। पुलिस की एक खुफिया रिपोर्ट में राज्य के 1,057 स्कूलों की पहचान की गई थी, जो सीधे तौर पर इन ड्रग नेटवर्क्स के निशाने पर थे। इसके दुष्परिणाम साफ दिखने लगे हैं। किशोरों और युवाओं में नशे की लत तेजी से बढ़ रही है। स्कूलों के भीतर और आसपास नशीले पदार्थ मिलने की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। सर्वे बताते हैं कि बच्चे अब बहुत कम उम्र में इन नशीली दवाओं के चंगुल में फंस रहे हैं।
इस संदर्भ में ‘ऑपरेशन तूफान’ को कुछ दिनों का रूटीन अभियान नहीं, बल्कि एक बड़ी और स्थायी सुधार प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए। केरल ने पहले भी नशा विरोधी अभियान चलाए हैं। जनवरी 2024 में शुरू हुए 'डी-हंट' जैसे अभियानों के तहत हजारों गिरफ्तारियां और भारी बरामदगी हुई। साल 2025 में भी पुलिस और आबकारी विभाग ने नशा विरोधी मुहिम में करीब 19,000 अपराधियों को पकड़ा। इसके बावजूद मामलों का लगातार बढ़ना साबित करता है कि अब तक की पुलिसिया कार्रवाई केवल घटनाओं के बाद की जाने वाली तात्कालिक प्रतिक्रिया थी, कोई ठोस रणनीतिक प्रहार नहीं।
गृह मंत्री चेन्निथला ने इस नई मुहिम की घोषणा करते हुए साफ कहा था कि हमारा मकसद सिर्फ नशा करने वालों या छोटे-मोटे पेडलर्स को पकड़ना नहीं, बल्कि छात्रों, पुलिस, स्वास्थ्य और आबकारी विभागों के आपसी तालमेल से ‘ड्रग माफिया की रीढ़ को तोड़ना’ है। अंतर-राज्यीय नेटवर्क को ध्वस्त करने की तैयारी है। वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने साफ किया कि इस बार ऑपरेशन के दायरे को केरल से बाहर तक फैलाया जाएगा, जिसमें पड़ोसी राज्यों की पुलिस और केंद्रीय जांच एजेंसियों की भी मदद ली जा रही है।
ऑपरेशन की सबसे बड़ी खूबी यही है कि यह स्वीकार करता है कि टुकड़ों-टुकड़ों में की गई कार्रवाई से संगठित ड्रग माफिया को नहीं हराया जा सकता। नशीली दवाओं का पूरा धंधा सप्लायर्स, फाइनेंसरों, लॉजिस्टिक्स पार्टनर्स, डिजिटल मददगारों और मनी लॉन्ड्रिंग के एक बड़े नेटवर्क से चलता है। इसलिए इस ऑपरेशन की असली सफलता सिर्फ गिरफ्तारियों की संख्या से नहीं, बल्कि इससे तय होगी कि पुलिस उनके वित्तीय लेनदेन का पता लगाने, तस्करी के रास्तों को ब्लॉक करने, राज्यों के बीच खुफिया जानकारी साझा करने और जांच एजेंसियों में समन्वय बनाने में कितनी कामयाब होती है।
साथ ही, इस जंग में स्थायी जीत के लिए एक चौतरफा रणनीति की जरूरत है। एक तरफ जहां ड्रग तस्करों को सख्त से सख्त कानूनी सजा मिलनी चाहिए, वहीं दूसरी तरफ नशे के शिकार युवाओं को अपराधी मानने के बजाय सही इलाज, काउंसलिंग और सामाजिक पुनर्वास की व्यवस्था मिलनी चाहिए। स्कूलों, कॉलेजों, पंचायतों और सामाजिक संगठनों को इस बुराई को रोकने के लिए पहली कतार में खड़ा होना होगा। नार्कोटिक्स के इस धंधे में जिस तरह से सोशल मीडिया और एन्क्रिप्टेड ऐप्स का इस्तेमाल हो रहा है, उसे देखते हुए पुलिस को अपनी साइबर जांच क्षमताओं को कई गुना मजबूत करना होगा। अंततः इस अभियान की सफलता सिर्फ जब्ती से नहीं, बल्कि समाज में कम होती नशे की लत, पुनर्वास के बेहतर नतीजों और अपराधियों के नेटवर्क के खात्मे से मापी जाएगी।
यूडीएफ सरकार ने इस मुद्दे को एजेंडे में शीर्ष पर रखा है, जो एक बड़ा राजनीतिक संदेश देता है। 'ऑपरेशन तूफान' भले देर से शुरू हुआ हो, लेकिन यह समस्या की गंभीरता को स्वीकार करने की दिशा में एक जरूरी कदम है। इसकी अंतिम सफलता अखबारों की सुर्खियां बटोरने वाले छापों से नहीं, बल्कि सरकार की मजबूत इच्छाशक्ति, विभागों के आपसी तालमेल और उन जमीनी नीतियों से तय होगी, जो समाज से उस खाली जगह को ही खत्म कर दें जहां ये ड्रग्स नेटवर्क फलते-फूलते हैं।
(अमल चंद्रा नीति विश्लेषक और स्तंभकार हैं।)
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