यूक्रेन से वापस लौटे छात्रों ने सुनाई रोंगटे खड़े कर देने वाली दास्तां, 'बम फट रहे थे और दूतावास से कोई मदद नहीं मिली...'

“वे सिर्फ एडवाइजरी जारी कर रहे थे और हमें बॉर्डर जाने को कह रहे थे। आखिर हम कैसे बॉर्डर पहुंच जाते? हर कुछ घंटों के बाद हमें गोलाबारी की आवाज़े सुनाई दे रही थीं, और हमें अपनी जान का हर दम खतरा महसूस हो रहा था।”

फोटो ऐशलिन मैथ्यू
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ऐशलिन मैथ्यू

बेचैन चेहरे, फिक्रमंद परिवार और राहत के कुछ पल, अगर यूक्रेन से वापस लौटे छात्रों को हवाई अड्डे से निकलते देखें तो, उदासी और राहत भरे चेहरों का एक सैलाब सा नजर आता है। दिल्ली में इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के टर्मिनल-3 पर जब बेचैन परिवारों ने गेट के इस तरफ से अपने बच्चों को बाहर आते देखा तो मानों एक पल को वे उस चिंता, उस फिक्र से बेखबर हो गए जो यूक्रेन से पल-पल आती खबरों से पैदा हो रही हैं।

बुधवार (2 मार्चो को) को जो छात्र वापस लौटे, उनमें से ज्यादातर यूक्रेन के सीमावर्ती इलाकों में स्थित मेडिकल कॉलेजों में पढ़ाई कर रहे थे। इसीलिए उन्हें मोलोदोवा बॉर्डर पार कर रोमानिया में दाखिल होने में कुछ आसानी हुई। रोमानिया से ही इन लोगों ने भारत के लिए उड़ान भरी। दोपहर करीब 12.30 बजे आए 200 छात्रों में से अधिकतर ने अपनी वापसी के लिए 26 फरवरी को कॉलेज छोड़ दिया था, लेकिन वे 28 फरवरी तक बॉर्डर पार नहीं कर पाए थे।

यूक्रेन से वापस लौटे छात्रों ने सुनाई रोंगटे खड़े कर देने  वाली दास्तां, 'बम फट रहे थे और दूतावास से कोई मदद नहीं मिली...'

इन्हीं में 19 साल का ऋषित भी था जिसने इवानो-फ्रैंक्विस्क नेशनल मेडिकल यूनिवर्सिटी से अभी सिर्फ दो सेमेस्टर ही पूरे किए थे। उसका कहना था कि उन्होंने यूक्रेन में भारतीय दूतावास से कोई मदद नहीं मिली। उसने बताया, “वे सिर्फ एडवाइजरी जारी कर रहे थे और हमें बॉर्डर जाने को कह रहे थे। आखिर हम कैसे बॉर्डर पहुंच जाते? हर कुछ घंटों के बाद हमें गोलाबारी की आवाज़े सुनाई दे रही थीं, और हमें अपनी जान का हर दम खतरा महसूस हो रहा था।”

बहुत से छात्रों ने स्थानीय लोगों की मदद लेकर बसों का इंतजाम किया और रोमानिया बॉर्डर पहुंचे। छात्रों ने बताया कि उनके सीनियर्स ने करीब 8 बसों का इंतजाम किया था जिसमें करीब 1000 छात्र बॉर्डर तक पहुंच पाए। रक्षित ने बताया कि, “हम सबको रोमानिया बॉर्डर तक पहुंचने के लिए बसों का किराया चुकाना पड़ा। वहां से हमें एक और बस का इंतजाम कर एयरपोर्ट जाना पड़ा। भारतीय दूतावास के लोग रोमानिया बॉर्डर पर थे ही नहीं। हम मे से कई की तो पिटाई भी की गई, और कई बार हमें ऐसा भी लगा कि शायद हम जिंदा वापस नहीं जा पाएंगे। मैं खुश हूं कि किसी तरह अपने घर पहुंच गया हूं।” रक्षित हिमाचल प्रदेश का रहने वाला है और अब दिल्ली से हिमाचल के लिए रवाना हो रहा है।


यूक्रेन से वापस लौटे छात्रों ने सुनाई रोंगटे खड़े कर देने  वाली दास्तां, 'बम फट रहे थे और दूतावास से कोई मदद नहीं मिली...'

छात्रों ने बताया कि बहुत सी यूनिवर्सिटीज ने फरवरी के आखिर सप्ताह तक ऑनलाइन क्लास शुरू करने का ऐलान किया। इसके अलावा भारतीय दूतावासा ने भी 20 फरवरी तक कोई सख्त एडवाइजरी जारी नहीं की थी कि भारतीय छात्र यूक्रेन से जाने वाली कमर्शियर चार्टर फ्लाइट्ससे वापस चले जाएं। 22 फरवरी को भारतीय दूसतावास ने छात्रों को संबोधित एक एडवाइजरी जारी की कि छात्र यूनिवर्सिटी के निर्देशों का इंतजार न करें और यूक्रेन छोड़ दें। 24 फरवरी को यूक्रेन ने अपने एयरस्पेस को बंद र दिया और तब तक रूसी फौजों ने हमला शुरु कर दिया था। इसके चलते एयर इंडिया की एक फ्लाइट वापस भी चली गई।

रक्षित के कॉलेज ने बताया है कि अगले सेमेस्टर के लिए क्लासेस अब ऑनलाइन होंगी और हो सकता है कि सितंबर 2022 में फिर से यूनिवर्सिटी खुल जाए। रक्षित को उम्मीद है कि हालात बदलेंगे और वह फिर से यूनिवर्सिटी जा सकेगा। लेकिन रक्षित के माता-पिता अब उसे वापस नहीं भेजना चाहते। रक्षित की मां संदेश सिरोही ने कहा कि वेअब कहीं और बेटे की उच्च शिक्षा के विकल्प देखेंगी। उन्होने कहा, “बीते कुछ दिन हमने जिस तरह गुजारे हैं उसके बाद तो हमें नहीं लगता कि इसे अब वापस भेजेंगे।”

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मोहम्मद अदनान ओडेसा नेशनल मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस चौथे साल का छात्र है। उसका कहना है कि यूक्रेन में भारतीय दूतावास किसी भी किस्म की मदद करने में नाकाम रहा। उसने बताया कि हम लगातार दूतावास को फोन कर रहे थे लेकिन वहां से कोई जवाब नहीं मिल रहा था। अदनान को भी अपने ही दम पर बस का इंतजाम कर मोलोदोवा बॉर्डर पहुंचना पड़ा, जहां से दूसरी बस पकड़कर हवाई अड्डे पहुंचा। उसने बताया कि छात्रों ने आपस में पैसे जमा कर बस का किराया चुकाया।

अदनान ने बताया, “हम सिर्फ इसलिए जिंदा वापस आ गए क्योंकि यूक्रेन और रोमानिया दोनों ही देशों में कुछ अजनबी लोगों ने हमारी मदद की। बहुत से लोगों ने हमें भोजन दिया, पानी दिया और अपने टॉयलेट इस्तेमाल करने की छूट दी। कई लोगों ने तो हमें अपने घर में सोने भी दिया। हमारे कुछ साथियों के परिवार इन देशों में थे, खासतौर से भारतीय मूल के लोगों ने बहुत मदद की।” अदनान उत्तर प्रदेश के बिजनौर का रहने वाला है और दिल्ली से घर के लिए रवाना हुआ है।

अदनान ने बताया कि उन्होंने 25 फरवरी को ओडेसा से मोलोदोवा का सफर शुरु किया। चूंकि बॉर्डर सिर्फ 80 किलोमीटर दूर है इसलिए वह उसी दिन वहां पहुंच गए। और फिर वे 27 फरवरी को रोमानिया में दाखिल हुए। तब से वे रोमानिया एयरपोर्ट के पास ही डेरा डाले हुए थे।


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फिरदौस और जोहरा पर मुसीबतों का पहाड़ 23 फरवरी को टूटा। उन्होंने बताया कि, “23 फरवरी को जब हम जागे तो चारों तरफ धुआं फैला हुआ था। कोई दो किलोमीटर दूर ही बमबारी हुई थी। हमें समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें। यूनिर्सिटी ने बताया कि वे वे 25 फरवरी को बसों का इंतजाम करेंगे, लेकिन फिर यह भी नहीं हो पाया। इसके बाद हमने अपने तौर पर रोमानिया बॉर्डर पहुंचने के लिए बसों का इंतजाम किया। हम सबको बस के लिए 1800 रुपए प्रति छात्र चुकाने पड़े।“

जो भी छात्र वापस आ रहे हैं उनमें से अधिकतर ने अपना सामान और बहुत से डॉक्यूमेट वहीं छोड़ दिए हैं क्योंकि उन्हें बमबारी से बचते हुए बॉर्डर पहुंचना था। फिरदौस आलम नाम की छात्रा ने बताया कि हालांकि उन्होंने बस को बॉर्डर तक के लिए बुक किया था, लेकिन सिर्फ 15 किलोमीटर के बाद ही बस रुक गई। उसने बताया, “हमें पैदल चलना पड़ा। और कोई 4 घंटे में हम बॉर्डर पहुंच पाए। कई दिनों तक घर वालों से बात नहीं हो पाई क्योंकि बॉर्डर पार करते समय वहां इंटरनेट सुविधा नहीं थी। हमें मौत का डर तो था लेकिन हमें पता था कि हमें हिम्मत से काम लेते हुए बॉर्डर पार करना है।”

यूक्रेन में करीब 18000 भारतीय छात्र पढ़ते हैं। विदेशमंत्री एस जयशंकर के मुताबिक भारत ने ऑपरेशन गंगा के तहत 15 फ्लाइट चलाई हैं और रोमानिया और पोलैंड से अभ तक 2300 से ज्यादा छात्रों को वापस लाया जा सका है।

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