सरकार चाहे तो भी नहीं शुरु हो सकते उद्योग-धंधे, लॉकडाउन के झटके से हो चुके हैं कंगाल!

मध्यम और लघु उद्योगों की सरकार से मांग है कि उन्हें आर्थिक पैकेज दिया जाए क्योंकि अचानक लॉकडाउन से उन पर मुसीबतों का पहाड़ टूटा है। दिल्ली-एनसीआर के साथ कोलकाता, सूरत, वड़ोदरा, बेंगलुरू, पुणे, तमिलनाडु समेत हिंदी बेल्ट के कई शहरों में उद्योग की कमर टूट गई।

फोटोः सोशल मीडिया
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उमाकांत लखेड़ा

केंद्र सरकार की ओर से लॉकडाउन में छोटे और मंझोले उद्योगों को कुछ शर्तों के साथ उत्पादन शुरू करने की छूट के बावजूद चौतरफा संकट के कारण ज्यादातर छोटे उद्योगों ने उत्पादन शुरू करने से हाथ खड़े कर दिए हैं। मध्यम और लघु उद्योगों ने केंद्र सरकार से एक स्वर में मांग की है कि उन्हें आर्थिक पैकेज दिया जाए क्योंकि 24 मार्च को पूरे देश में बिना पूर्व सूचना के लॉकडाउन घोषित होते ही उन पर सबसे ज्यादा मुसीबतों का पहाड़ टूटा है। दिल्ली-एनसीआर ही नहीं कोलकाता, सूरत, वड़ोदरा, बेंगलुरू, पुणे और तमिलनाडु समेत हिंदी बेल्ट के कई शहरों में छोटे से लेकर मझोले उद्योगों की कमर टूट गई है।

एमएसएमई क्षेत्र की पहली और बड़ी चिंता केंद्रीय गृह मंत्रालय के 15 अप्रैल के उस आदेश से शुरू हुई, जिसमें कहा गया कि किसी भी फैक्टरी में कोई कोरोना संक्रमित रोगी पाया गया तो ऐसे फैक्टरी मालिकों या संचालकों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होगी। भारतीय उद्योग परिसंघों से जुड़े शीर्ष लोगों ने कहा है कि उन्होंने अपनी इन चिंताओं के बारे में वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी को पत्र लिखकर छोटे, मध्यम उद्योगों पर व्याप्त संकट से अवगत कराया है।

इस बीच मध्यम और लघु उद्योग मंत्री नितिन गडकरी के साथ शुक्रवार को एक अहम वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में इन मुद्दों को सामूहिक तौर पर उठाने का फैसला किया गया है। जिसमें एमएसएमई सेक्टर की समस्याओं और बंद पड़ी छोटी-बड़ी उद्योग ईकाइयों को चालू करने के उपायों पर विचार किया जाना है। मध्यम-छोटी फैक्टरियां चलाने वालों की सबसे बड़ी चिंता यह भी है कि उद्योग क्षेत्रों से बड़ी तादाद में कुशल और अकुशल श्रमिक अपने गांवों की ओर पलायन कर गए हैं।

एक फैक्टरी संचालक ने बताया कि उसके यहां बिहार, पूर्वी यूपी और झारखंड के श्रमिक काम करते थे। दो-चार को छोड़ बाकी लोग किसी न किसी तरह दिल्ली-एनसीआर छोड़ चुके हैं। वे तब तक वापस नहीं आने वाले, जब तक रेल और सड़क यातायात नहीं खुलता। दूसरी समस्या यह कि वे आएंगे तो भी काम करने के पहले पैसा मांगेंगे, क्योंकि वे जहां किराये पर रहते थे, वहां से जा चुके हैं। एक और समस्या यह है कि कच्चा माल नहीं होगा तो हम फैक्टरी खोलकर करेंगे भी क्या। कच्चे माल के लिए हमारे पास न नकदी है और न ही बैंक हमें इन हालात में मदद करने को तैयार हैं।


छोटे मध्यम उद्योगों की चिंता पीएम मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के गृह प्रदेश गुजरात से भी गंभीरता से प्रकट की गई है। वड़ोदरा के उद्योगों की स्थानीय एसोसिएशन ने बाकायदा वहां की जिलाधिकारी को लिखित तौर पर कह दिया है कि फैक्टरी यूनिटें खोलने के एवज में उन पर जिस तरह की शर्तें लादी जा रही हैं, उनके चलते वे कारखाने नहीं खोल सकते। वड़ोदरा की कम से 4 दवा फैक्टरियों ने रविवार से ही गृह मंत्रालय के कड़े प्रावधानों के डर से अपनी उत्पादन यूनिटों पर ही ताले लगा दिए। गुजरात समेत देश की फैक्टरियों की चिंता हाल में मैसूर की एक फार्मास्यूटिकल्स यूनिट ने बढ़ा दी है, जहां मार्च के अंत में कोरोना टेस्ट किट बनाने वाली टीम के करीब 10 कर्मचारी ही संक्रमित पाए गए।

ऐसोचैम के मध्यम और लघु उद्योग समूह के चेयरमैन मंगूरिष पाई पर्रिकर कहते हैं, "जो फैक्टरियां खोली जा रही हैं, उनमें कोरोना से बचाव के लिए सरकार के दिशानिर्देशों का पूरी तरह पालन किया जा रहा है। कोई भी फैक्टरी संचालक यह कतई नहीं चाहेगा कि उसकी यूनिट में कोई संक्रमित कर्मचारी काम करता हुआ पाया जाए। असल में मजदूर 8-10 घंटे की ड्यूटी करने के बाद बाकी 16 घंटे कहां जा रहा है और किस-किस से मिल रहा है, उसके अचानक संक्रमित पाए जाने पर उसका ठीकरा फैक्टरी प्रबंधन पर थोपना कतई न्याय संगत नहीं होगा।"

देशभर में मध्यम और छोटे उद्योगों का कहना है कि उन पर मुश्किलों का पहाड़ ही टूट गया है। गुडगांव, मनेसर, फरीदाबाद और नोएडा में कई फैक्टरी मालिक सरकार की शर्तों के तहत अपनी यूनिटें खोलने को तैयार हैं, लेकिन उनके सामने सबसे बड़ी समस्या श्रमिकों और स्टाफ की कमी का संकट है। उद्योग विहार गुड़गांव में एक नामी ब्रांड के शू फैक्टरी संचालक का कहना है कि सबसे बड़ी मुश्किल तो यह है कि 24-25 मार्च तक उत्पादित माल की बहुत बड़ी मात्रा फैक्टरियों में ही डंप पड़ी है। सबसे पहले उसे ठिकाने लगाना होगा। दूसरा यह कि कच्चा माल ट्रकों में जहां का तहां फंसा है। फिर तैयार माल को लेकर जो दर्जनों ट्रक देश के विभिन्न प्रदेशों की ओर रवाना हुए थे उनके जहां के तहां फंसने से उनके सामने नकदी का संकट खड़ा हो गया है। इनमें से काफी तो शूज और संबधित माल आगामी शैक्षिक सत्र के लिए स्कूली बच्चों की जरूरत का था।

भारतीय उद्योग परिसंघ के एक और पदाधिकारी ने तमिलनाडु के कोयंबटूर से फोन पर कहा, "उद्योग-धंधों के सामने संसाधनों और नकदी का बहुत बड़ा सकट खड़ा हो गया है। सरकार को चाहिए कि सबसे पहले उद्योगों खास तौर पर छोटे उद्योगों के लिए राहत पैकेज घोषित हो। केंद्र और राज्य सरकारों ने इस बाबत कोई ठोस फैसला जल्द नहीं उठाया तो देश के करोड़ों लोगों को रोजगार देने वाला यह क्षेत्र रसातल में समा जाएगा।"

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