जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ जांच रिपोर्ट संसद में पेश की गई, क्या शुरू हो पाएगी महाभियोग की प्रक्रिया?
आवास के स्टोर रूम में नोटों की अधजली गड्डियां मिलने पर उठे विवाद के बाद न्यायमूर्ति वर्मा ने इस्तीफा दे दिया था, जिससे उन्हें पद से हटाने की प्रक्रिया लगभग निष्प्रभावी हो गई है। हालांकि, उनके इस्तीफे को अभी तक कानून मंत्रालय ने अधिसूचित नहीं किया है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश यशवंत वर्मा के खिलाफ लगाए गए आरोपों की जांच करने वाली समिति की रिपोर्ट बुधवार को संसद के दोनों सदनों लोकसभा और राज्यसभा में पेश की गई। न्यायमूर्ति वर्मा के आधिकारिक आवास से कथित तौर पर नोटों की अधजली गड्डियां मिलने के मामले में उन्हें पद से हटाने की कार्यवाही शुरू की गई थी।
दोनों सदन के पटल पर रखी गई रिपोर्ट
राज्यसभा के महासचिव पी सी मोदी ने जांच समिति की दो खंडों वाली रिपोर्ट सदन के पटल पर रखी। इसके साथ ही जांच के दौरान दर्ज किए गए मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्य भी पेश किए गए। लोकसभा महासचिव उत्पल कुमार सिंह ने भी जांच समिति की दो खंडों वाली रिपोर्ट लोकसभा के पटल पर रखी। लोकसभा की बुधवार की कार्यसूची के अनुसार, निचले सदन के महासचिव भी रिपोर्ट के दोनों खंडों और मौखिक साक्ष्यों को सदन के पटल पर रखेंगे।
विवाद के बाद जस्टिस वर्मा ने इस्तीफा दिया
तीन सदस्यीय जांच समिति ने मई में अपनी रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को सौंपी थी।बिरला ने 12 अगस्त 2025 को, न्यायमूर्ति यशंत वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास से कथित रूप से बड़ी मात्रा में नकदी मिलने के मामले की जांच के लिए इस समिति का गठन किया था।
दिल्ली हाईकोर्ट के तत्कालीन न्यायमूर्ति वर्मा के सरकारी आवास में 14 मार्च 2025 की रात आग लग गई थी। आग बुझाने पहुंचे दमकलकर्मियों को कथित तौर पर एक स्टोर रूम में नोटों की अधजली गड्डियां मिली थीं। लंबे विवाद के बाद न्यायमूर्ति वर्मा ने इस्तीफा दे दिया और उन्हें पद से हटाने की प्रक्रिया लगभग निष्प्रभावी हो गई है। हालांकि, उनके इस्तीफे को अभी तक कानून मंत्रालय ने अधिसूचित नहीं किया है।
महाभियोग की कार्यवाही पर सवाल
विवाद के बाद न्यायमूर्ति वर्मा को उनके मूल न्यायालय इलाहाबाद उच्च न्यायालय भेज दिया गया था जो घटना के समय दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश थे। तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना द्वारा गठित आंतरिक समिति इस निष्कर्ष पर पहुंची थी कि न्यायमूर्ति वर्मा का उस विशेष स्टोर रूम पर सक्रिय या मौन नियंत्रण था, जहां कथित तौर पर नकदी रखी गई थी।
जुलाई 2025 में 200 से अधिक सांसदों ने न्यायमूर्ति वर्मा को पद से हटाने के लिए उनपर महाभियोग चलाने के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए थे। इसके बाद अगस्त में बिरला ने आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय न्यायाधीश जांच समिति का गठन किया था। हालांकि, संसद द्वारा पद से हटाए जाने की आशंका के मद्देनजर न्यायमूर्ति वर्मा ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश पद से इस्तीफा दे दिया, जिससे उनके खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही निष्प्रभावी हो गई।
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सरकार ने इस्तीफे को अब तक अधिसूचित नहीं किया
उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति और हटाने की प्रक्रिया से जुड़े जानकारों के अनुसार, शीर्ष अदालत के एक फैसले के मुताबिक, कोई न्यायाधीश राष्ट्रपति को इस्तीफा सौंपते हैं और उसकी प्रति सार्वजनिक कर दी जाती है तो माना जाता है कि न्यायाधीश ने इस्तीफा दे दिया है।
उन्होंने बताया कि न्यायाधीश का इस्तीफा राष्ट्रपति की स्वीकृति पर निर्भर नहीं होता। प्रक्रिया के तहत राष्ट्रपति औपचारिक रूप से इस्तीफा स्वीकार करते हैं, जिसके बाद कानून मंत्रालय का न्याय विभाग इसकी अधिसूचना जारी करता है। हालांकि, जस्टिस वर्मा के मामले में सरकार ने उनके इस्तीफे को अभी तक अधिसूचित नहीं किया है।
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