जंग खत्म करने के लिए ईरान का अमेरिका से बातचीत करने से साफ इनकार, इस्लामी देशों को लिखा लंबा पत्र
ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमले के 18वें दिन हो गए हैं और अभी भी तेहरान तथा ईरान के अन्य शहरी इलाकों पर बमबारी जारी है। इस बीच ईरान ने अमेरिका के साथ किसी भी बातचीत से इनकार कर दिया है।

ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अरागची ने इस बात से साफ इनकार किया है कि अमेरिका-इज़रायल के साथ जारी जंग को खत्म करने के लिए पर्दे के पीछे कोई बात चल रही है। उन्होंने कहा, "मिस्टर विटकॉफ़ से मेरी आखिरी बातचीत तब हुई थी, जब उनके बॉस ने ईरान पर एक और गैर-कानूनी फौजी हमले के ज़रिए डिप्लोमेसी को खत्म करने का फ़ैसला नहीं किया था। इसके उलट किया गया कोई भी दावा, तेल कारोबारियों और आम लोगों को गुमराह करने के लिए ही किया गया लगता है।"
इससे पहले, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान ने फ़्रांस के राष्ट्रपति से कहा था, "युद्ध खत्म करने की बात करना तब तक बेमानी है, जब तक हम यह सुनिश्चित नहीं कर लेते कि भविष्य में हमारी धरती पर अब और कोई हमला नहीं होगा।"
अरागची ने इससे पहले अमेरिकी मीडिया चैनल सीबीएस से कहा था, “ईरान ने न तो युद्धविराम की मांग की है और न ही बातचीत की। ऐसे दावे भ्रमित करने वाले हैं। हमारी सेना तब तक गोलीबारी करती रहेगी, जब तक अमेरिकी राष्ट्रपति को यह एहसास नहीं हो जाता कि वह अमेरिकियों और ईरानियों, दोनों पर जो अवैध युद्ध थोप रहे हैं, वह गलत है और इसे दोबारा कभी नहीं दोहराया जाना चाहिए... पीड़ितों को भी मुआवज़ा मिलना चाहिए... अमेरिका ने हमारी बिना शर्त हथियार डालने की तलाश में यह युद्ध शुरू किया था, और अब वह दूसरे देशों से होर्मुज़ जलडमरूमध्य (स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़) खोलने की भीख मांग रहा है।”
भले ही राष्ट्रपति ट्रंप और अमेरिकी अधिकारियों ने दावा किया हो कि ईरानी अधिकारी समझौते के लिए संपर्क कर रहे हैं, लेकिन तेहरान की तरफ से इस पर सार्वजनिक प्रतिक्रिया काफी ठंडी रही है। ईरानी संसद के स्पीकर, मोहम्मद बाकर ग़ालिबफ़ ने ट्रंप का मज़ाक उड़ाते हुए कहा, "उन्होंने दावा किया है कि पिछले दो हफ़्तों में उन्होंने हमें नौ बार 'हराया' है। यह तो बहुत ही मज़ेदार है!" ईरानी अधिकारियों के हवाले से कहा गया है कि वे विटकॉफ़ के बातचीत करने के निजी अनुरोधों को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं। उनका कहना है कि मध्य-पूर्व के लिए ट्रंप के विशेष दूत, ईरान के विदेश मंत्री को टेक्स्ट मैसेज भेजकर बातचीत शुरू करने का आग्रह कर रहे हैं।
तेहरान का कहना है कि युद्ध तभी समाप्त होगा जब ईरान को यह विश्वास हो जाएगा कि उसने एक लंबे समय तक काम करने वाली प्रतिरोधक क्षमता (डिटरेंस) स्थापित कर ली है। ईरानी नेताओं ने यह भी स्पष्ट किया है कि अमेरिका से बातचीत करना बेमानी है, क्योंकि उसे अमेरिका पर भरोसा नहीं है। तेहरान का कहना है कि पिछले वर्ष और इस वर्ष, दोनों ही समय वे विटकॉफ़ और ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर से बातचीत कर रहे थे, इसके बावजूद ईरान पर इज़राइल और अमेरिका ने हमला कर दिया।
ईरान ने बातचीत शुरू होने से पहले कुछ शर्तें रखी हैं: मध्य पूर्व से सभी अमेरिकी सेनाओं की 30 दिनों के भीतर पूरी तरह वापसी, ईरान पर लगे सभी प्रतिबंधों को तुरंत हटाना, युद्ध से हुए नुकसान की भरपाई और मुआवजे के तौर पर 500 अरब डॉलर का भुगतान। कुछ रिपोर्टों के अनुसार, इन शर्तों को पूरा करने की समय सीमा 10 अप्रैल 2026 तय की गई है। यदि ये शर्तें पूरी नहीं होती हैं, तो ईरान ने धमकी दी है कि वह होर्मुज जलडमरूमध्य (स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़) को सभी समुद्री यातायात के लिए बंद कर देगा, परमाणु हथियारों के विकास और तैनाती को आगे बढ़ाएगा, और चीन तथा रूस को अपनी धरती पर सैन्य अड्डे बनाने की अनुमति देने का भी संकेत दिया है।
अराघची ने खाड़ी देशों के लिए भी एक संदेश दिया। “रिपोर्ट्स का दावा है कि कुछ पड़ोसी देश, जो अमेरिकी सेनाओं को अपने यहां पनाह देते हैं और ईरान पर हमलों की इजाज़त देते हैं, वे इज़राइल और अमेरिका द्वारा ईरानियों के नरसंहार को भी सक्रिय रूप से बढ़ावा दे रहे हैं। उनके रुख को तुरंत स्पष्ट किया जाना चाहिए।” एक्स पर यह पोस्ट, सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव अली लारीजानी द्वारा ‘दुनिया भर के मुसलमानों’ और ‘इस्लामी सरकारों’ को लिखे गए एक पत्र के बाद आई थी। इस पत्र की सामग्री को भारत स्थित ईरानी दूतावास ने साझा किया है।
“…आप जानते हैं कि—कुछ मामलों को छोड़कर, और वह भी केवल राजनीतिक स्तर पर—किसी भी इस्लामी सरकार ने ईरान की मदद नहीं की। फिर भी, ईरानी लोगों ने दृढ़ संकल्प के साथ उस दुष्ट शत्रु को इस प्रकार कुचल दिया कि आज शत्रु को यह समझ नहीं आ रहा कि वह इस रणनीतिक गतिरोध से कैसे बाहर निकले… ईरान, बड़े और छोटे शैतानों (अमेरिका और इज़राइल) के विरुद्ध प्रतिरोध के मार्ग पर निरंतर आगे बढ़ता रहेगा।”
“…क्या इस्लामी सरकारों का आचरण पैगंबर (स.अ.व.) के इस कथन के विपरीत नहीं है, जिन्होंने कहा था: “यदि तुम किसी मुसलमान की पुकार का जवाब नहीं देते, तो तुम मुसलमान नहीं हो।” यह किस तरह का इस्लाम है?... कुछ देशों ने तो इससे भी आगे बढ़कर यह घोषणा कर दी है कि चूंकि ईरान ने अमेरिकी ठिकानों और उन देशों में संयुक्त राज्य अमेरिका तथा इज़राइल के हितों को निशाना बनाया, इसलिए ईरान उनका दुश्मन बन गया है। क्या ईरान को तब भी चुप बैठे रहना चाहिए, जबकि आपके ही देशों में स्थित अमेरिकी ठिकानों से उस पर हमले किए जा रहे हों?”
पत्र का अंत इस संदेश के साथ होता है, “आप भली-भांति जानते हैं कि अमेरिका आपके प्रति कोई वफ़ादारी नहीं दिखाएगा, और यह कि इज़राइल आपका दुश्मन है। एक पल रुककर अपने बारे में और इस क्षेत्र के भविष्य के बारे में सोचिए। ईरान आपका भला चाहता है और आप पर अपना वर्चस्व जमाने का उसका कोई इरादा नहीं है।”
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