क्या सच से डर गई सत्ता? आखिर एक जनरल की रहस्यमयी किताब पर क्यों बांध दी ज़ंजीरें!

जनरल नरवणे के ‘अनछपे’ संस्मरण पर हुए हंगामे और विवाद के बाद वही हुआ जिससे सरकार बचना चाहती थी। किताब के बारे में लोगों में उत्सुकता बढ़ी, इसकी पीडीएफ बड़े पैमाने पर साझा की गई और चीन का मुकाबला करने में भारत की कथित डरपोक हरकत पर तीखी बहस शुरू हो गई।

एआई निर्मित सांकेतिक तस्वीर
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ए जे प्रबल

क्या रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने राहुल गांधी को पूर्व सेनाध्यक्ष एम एम नरवणे की पुस्तक पर ‘कारवां’ पत्रिका में छपे एक लेख के जिक्र के साथ उसकी ‘पांच लाइनें’ पढ़ने से रोककर सेल्फ-गोल कर लिया? अगर सरकार ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ के तथ्यों को छिपाना चाहती थी, तो वह इससे बुरा कुछ भी नहीं कर सकती थी। विवाद के बाद से हजारों लोग इस ‘अनछपी’ किताब की पीडीएफ फाइल साझा कर चुके हैं। 

9 फरवरी को पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया ने बयान जारी किया कि उस किताब का प्रकाशन अधिकार सिर्फ उसके पास है और ‘किताब की कोई भी प्रति, चाहे प्रिंट हो या डिजिटल, पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया ने प्रकाशित, बांटी, बेची या किसी और तरह से जनता के लिए उपलब्ध नहीं कराई है’। रात दस बजे नरवणे ने इसे एक्स पर साझा किया। 

10 फरवरी को राहुल गांधी किताब की हार्डबाउंड कॉपी लेकर संसद पहुंचे। शाम करीब 5 बजे, जनरल नरवणे ने प्रकाशक का बयान फिर पोस्ट किया, इस बार कमेंट के साथ: ‘यह है किताब की स्थिति’। 10 फरवरी को ही दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने किताब के गैर-कानूनी ऑनलाइन सर्कुलेशन के खिलाफ एफआईआर दर्ज की। पुलिस ने कहा, ‘पता चला कि यही शीर्षक वाली और पेंगुइन की टाइपसेट किताब की पीडीएफ कुछ वेबसाइट पर उपलब्ध है और कुछ ऑनलाइन मार्केटिंग प्लेटफॉर्म ने तैयार किताब का कवर ऐसे दिखाया है जैसे वह खरीदने के लिए उपलब्ध हो।’

मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया कि एफआईआर में कॉपीराइट एक्ट के अलावा आईटी एक्ट के उल्लंघन का आरोप है, जो बिना इजाजत संवेदनशील या अश्लील सामग्री का ऑनलाइन प्रसार रोकता है।

न सिर्फ भारतीय सेना के हर दूसरे ऑफिसर को वाट्सएप फॉरवर्ड के जरिये इसकी कॉपी मिल चुकी है, बल्कि अब तक तो विदेश भी पहुंच गई होगी। इससे हुए नुकसान के लिए प्रकाशक को जिम्मेदार लोगों पर केस करने और मुआवजा मांगने का हक है। हालांकि, इतने सारे ‘गुनहगारों’ पर केस करना और बकाया वसूलना लगभग नामुमकिन है।

नरवणे ने पहले जो दो पोस्ट किए थे, उनसे ‘अनछपे संस्मरण का रहस्य’ और बढ़ा गया। इनमें से एक दिसंबर 2023 का है। इसमें नरवणे ने अमेज़न पर लिस्टेड किताब के प्रचार विवरण, जैकेट कवर, और आईएसबीएन नंबर पोस्ट किए थे, और कैप्शन था: ‘किताब अब उपलब्ध है’। उसके बाद के एक अन्य पोस्ट में, जिसकी ‘नवजीवन’ ने अलग से पड़ताल नहीं की, वह प्रकाशक के एक पोस्ट का जवाब देते लग रहे थे, जिसमें लिखा था, ‘लोगों का रिस्पॉंस दिल छू लेने वाला है’। दोनों पोस्ट से संकेत मिलता है कि किताब प्रिंट हो चुकी थी और बाजार के लिए उपलब्ध थी।

इस विवाद पर एक ऑनलाइन रिपोर्ट में, ‘इंडिया टुडे’ ने दावा किया कि उसने पड़ताल की है कि ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ की प्रतियां सच में वितरक और बुकस्टोर तक पहुंच गई थीं। हालांकि रिपोर्ट कुछ ही घंटों में हटा दी गई।


सवाल है कि क्या प्रकाशक रक्षा मंत्रालय से हरी झंडी मिले बिना हार्डबाउंड किताब में पैसा लगाने का जोखिम उठाते? कई इंटरव्यू में जनरल नरवणे ने कहा कि प्रकाशक ने इसे मंजूरी के लिए भेजा था। 

खास बात यह है कि रक्षा मंत्रालय ने दिसंबर 2023 में न्यूज एजेंसी पीटीआई द्वारा जारी सारांश पर कोई आपत्ति नहीं जताई थी। न ही मंत्रालय ने लेखक या प्रकाशक से कम से कम 2 फरवरी 2026 तक कहा कि मंजूरी नहीं दी गई है।

सरकार ने अब तक न तो किताब पर रोक लगाई है और न सरकारी गोपनीयता अधिनियम लागू किया है। न रक्षामंत्री और न उनके मंत्रालय ने बताया है कि किताब में ‘तथ्यों से जुड़ी गलतियां’ क्या हैं या इन कथित गलतियों पर संसद में चर्चा क्यों नहीं होनी चाहिए।

उन गलतियों को बताना और पांडुलिपि को सुधार के लिए प्रकाशक को वापस करना एक आसान काम होना चाहिए था। मंत्रालय ने 2024 के बाद पूर्व सैन्य अधिकारियों की 34 किताबों को मंजूरी दी- अक्सर लेखकों और प्रकाशक से बातचीत करके संपादकीय बदलावों के बाद। पता नहीं, नरवणे की किताब 2023 से क्यों लटकी हुई है।

किताब पढ़ने वाले पूर्व सैन्य अधिकारियों का मानना है कि यह किताब मौजूदा राजनीतिक नेतृत्व की बहुत तारीफ करती है। यहां तक कि ‘कारवां’ (फरवरी 2026) में भी लिखा है कि जनरल नरवणे ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की दिल खोलकर तारीफ की है। फिर मंजूरी क्यों नहीं दी गई? क्या पीएम के अलावा दूसरे लोग नाराज हो गए?

ये पूर्व सैन्य अधिकारी कुछ ऐसे संदर्भ बताते हैं जो शायद राजनीतिक व्यवस्था को रास नहीं आए हों। सेना प्रमुख बनने के बाद मानेकशॉ सेंटर में मीडिया से पहली बातचीत में नरवणे ने कहा था कि सेना की वफादारी भारत के संविधान के प्रति है। यह इस भावना को दूर करने के लिए था कि सेना का राजनीतिकरण किया जा रहा है।

अपनी किताब में उन्होंने लद्दाख में स्थानीय कमांडरों की कम तैयारी और खराब कम्युनिकेशन के लिए भी खिंचाई की। वह बताते हैं कि 15-16 जून 2020 को गलवान में हुई झड़प (जिसमें 20 भारतीय सैनिक शहीद हुए) से पूरे एक महीने पहले चीनी सैनिकों ने भारतीय इलाके में टेंट लगाए थे। कमांडरों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया, उन्हें लगा कि जैसे बर्फ पिघलेगी और पानी का स्तर बढ़ेगा, टेंट डूब जाएंगे। नरवणे ने विदेश मंत्रालय की भी आलोचना की कि उसने लद्दाख में चीनियों के साथ बातचीत कर रहे आर्मी कमांडरों को मीटिंग के मिनट्स रखने की इजाजत नहीं दी। इससे ऐसी गलतफहमियां हुईं जिनसे बचा जा सकता था, क्योंकि चीनी अक्सर भारत की ‘विचार करने की सहमति’ को सहमति मान लेते थे।


रणनीतिक मामलों के विश्लेषक सुशांत सिंह ने अपने लेख में प्रधानमंत्री, रक्षामंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के सेना प्रमुख पर दारोमदार छोड़ने की कड़ी आलोचना की। एक तनाव वाले वक्त जब चीनी टैंक बढ़ते आ रहे थे, जनरल नरवणे से कहा गया कि उन्हें जो ठीक लगे, करें। कुछ वेटरन का मानना ​​है कि इस निर्देश ने सेना प्रमुख को पूरी छूट दे दी थी। हालांकि, सिंह बताते हैं कि कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्योरिटी (सीसीएस) ने सेना प्रमुख को बिना ऊपर से मंजूरी के एलएसी पर गोली चलाने से मना किया था।

पुस्तक में नरवणे लिखते हैं, ‘पाकिस्तान के साथ नियंत्रण रेखा पर तोपों की लड़ाई आम बात थी। डिविजनल और कोर कमांडरों को दिए अधिकार के अनुसार अगर स्थिति ऐसी हो तो वे कमान श्रृंखला में किसी भी ऊंचे अधिकारी से पूछे बिना तोपखाने के इस्तेमाल को आजाद हैं। लेकिन यहां बात अलग थी। मेरी स्थिति गंभीर थी, मैं कमांड और सीसीएस के बीच फंसा था। कमांड सभी संभव साधनों से गोलीबारी शुरू करना चाहता था और सीसीएस ने मुझे स्पष्ट आदेश नहीं दिया था।’

‘अनछपी’ किताब का एक और हिस्सा, जिसे कई सूत्रों ने उद्धृत किया है, कहता है: ‘हम हर तरह से तैयार थे, लेकिन क्या मैं सच में जंग शुरू करना चाहता था? देश बुरी हालत में था, कोविड महामारी से जूझ रहा था। अर्थव्यवस्था लड़खड़ा रही थी, वैश्विक सप्लाई चेन टूट गई थी। ऐसे में क्या हम लंबे समय तक स्पेयर पार्ट्स वगैरह की लगातार सप्लाई पक्का कर पाएंगे? विश्व स्तर पर हमारे समर्थक कौन थे, और फिर चीन और पाकिस्तान से एकजुट खतरे का क्या?’

जैसा कि सिंह अपने लेख में कहते हैं, जंग शुरू करने का फैसला सेना नहीं लेती। यह राजनीतिक नेतृत्व और सीसीएस का काम है, जो साफ पीछे हट गए, और दारोमदार सेना प्रमुख पर डाल दिया। 

क्या यह किताब को रोकने के लिए काफी है? क्या सरकार ने किताब को प्रकाशित न होने देकर कोई गलती की? क्या विपक्ष के नेता को किताब से कोट करने से रोकना एक सियासी गलती थी?

इस विवाद ने ठीक वही कर दिया जिससे सरकार बचना चाहती थी। इसने किताब के बारे में लोगों की उत्सुकता बढ़ा दी और चीन का मुकाबला करने में भारत की कथित डरपोक हरकत पर तीखी बहस शुरू कर दी। 18 जून 2020 को मोदी ने ऑल-पार्टी मीटिंग में कहा था, ‘ना कोई घुसा था, ना कोई घुसा है’। नरवणे की किताब में इस पर भी सवाल उठाया गया है। क्या यही वजह है कि इसे प्रकाशित करने की मंजूरी नहीं दी गई? 

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