क्या अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला बहुसंख्यक वर्चस्व के नए दौर की शुरुआत है?

क्या सुप्रीम कोर्ट का फैसला वाकई ऐसा है जिसे न किसी की जीत, न किसी की हार माना जाए। गौर से देखें तो सामने आता है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला अंतर्विरोधों से भरा पड़ा है। इतना ही नहीं यह फैसला इंसाफ कम और समझौता ज्यादा नजर आता है।

फोटो: सोशल मीडिया
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तसलीम खान

सुप्रीम कोर्ट ने अपनी समझ से अयोध्या विवाद का पटाक्षेप कर दिया। सबने मिलकर इस फैसले का स्वागत किया और देश में शांति और भाईचार बनाए रखने की अपील की। एकाध को छोड़ दें तो सब कह रहे हैं कि यह न किसी की जीत है और न किसी की हार।

क्या सुप्रीम कोर्ट का फैसला वाकई ऐसा है जिसे न किसी की जीत, न किसी की हार माना जाए। गौर से देखें तो सामने आता है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला अंतर्विरोधों से भरा पड़ा है। इतना ही नहीं यह फैसला इंसाफ कम और समझौता ज्यादा नजर आता है। मसलन कोर्ट ने खुद कहा कि फैसले का आधार आस्था और विश्वास नहीं, बल्कि कानून और संविधान है। लेकिन साथ ही कोर्ट यह भी कहता है कि हिंदुओं की राम में आस्था और अयोध्या में उनके पैदा होने पर कोई विवाद ही नहीं है। यानी कोर्ट मानता है कि राम हिंदुओं के देव हैं और वे अयोध्या में ही पैदा हुए।

सुप्रीम कोर्ट अपने फैसले में यह तो कहता है कि बाबरी मस्जिद को गिराया जाना अपराध था, लेकिन इस अपराध के दोषियों को सजा देने और फिर इस गैरकानूनी और आपराधिक गलती को दुरुस्त करने के लिए कुछ नहीं कहता। उलटा बाबरी मस्जिद को ही बनवास दे दिया जाता है। कोर्ट के फैसले के इस विरोधाभास को किसी भी तर्क पर खरा नहीं कहा जा सकता।

कोर्ट यह तो मानता है कि मीर बाकी ने इस मस्जिद का निर्माण कराया था, लेकिन पुरातत्व विभाग के हवाले से यह भी कह देता है कि मस्जिद खाली जगह पर नहीं बनाई गई थी और उसके नीचे कोई ढांचा था, जो इस्लामिक नहीं था। तो क्या कोर्ट ने मान लिया कि अगर ढांचा इस्लामिक नहीं था तो हिंदुओं का था, मंदिर का था। वह ढांचा जैन समुदाय का भी हो सकता है, बौद्ध का हो सकता है। कोर्ट इस बात को नजरंदाज़ कर देता है कि पुरातत्व विभाग ने मस्जिद के अंदर किसी मंदिर के होने की बात नहीं कही थी।

फिर अचानक कोर्ट को बाबरी मस्जिद एक विवादित ढांचा लगती है, जबकि वह मानता है कि वहां 1949 में ही मूर्तियां रखी गईं। इतना ही नहीं इन मूर्तियों को कोर्ट इस हद तक रामलला विराजमान मानता है कि उन्हें ही इस मामले का मुख्य पक्षकार मानते हुए उनके हक में फैसला सुना देता है। कोर्ट के इन्हीं तर्कों को देखें तो वह भी यह मान रहा है कि बाबरी मस्जिद का अस्तितिव पहले था और मूर्तियां बहुत बाद में 400 साल बाद वहां रखी गईं। यहां कोर्ट इस बात को भी अनदेखा कर देता है कि 400 साल पुरानी कोई भी इमारत ऐतिहासिक महत्व की हो जाती है और उसे पुरातात्विक लिहाज से अहम माना जाता है। लेकिन कोर्ट ने तो इसी इमारत को देश निकाला दे दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या की विवाद जमीन से मुसलमानों को बेदखल कर दिया, फिर भी उसका पलड़ा एक तरफ ही झुका हुआ दिखा। मसलन कोर्ट ने सरकार को कहा कि वह ट्रस्ट बनाए और मंदिर निर्माण कराए। जबकि मस्जिद को 5 एकड़ जमीन का टुकड़ा देकर विदा कर दिया गया। यहां ध्यान देना होगा कि गिरी मस्जिद थी और अगर कोई निर्माण होना था तो मस्जिद का, और इसकी जिम्मेदारी भी सरकार पर ही जाती थी।

इस मामले में एक और रोचक तथ्य है जो अचंभित करता है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने से कोई दो-तीन सप्ताह पहले से ही संघ की तरफ से शांति और भाईचारे की अपील शुरु कर दी गई थी। केंद्र सरकार ने भी सभी राज्य सरकारों को शांति व्यवस्था सुनिश्चित करने के कड़े निर्देश जारी कर दिए थे। लगभग हर राज्य में जिलाधिकारोयं ने शांति समितियों की बैठकें शुरु कर दी थीं और इनमें मुस्लिम चेहरों को खासतौर से प्रचारित किया जा रहा था।

तो क्या सवाल नहीं खड़ा होता कि जो संगठन खुद को कानून और संविधान से ऊपर मानता रहा हो, वह एकाएक कोर्ट के फैसले का सम्मान करने की अपील क्यों करने लगा? क्या संघ को ऐसा ही फैसला आने की भनक लग गई थी? उम्मीद है ऐसा न हुआ हो, लेकिन रत्ती भर भी ऐसी गुंजाइश दिखती है तो अदालत पवित्रता पर सवाल खड़ा होता है।

संघ ने इस फैसले पर जिस किस्म की प्रतिक्रिया दी है उससे यह तो स्पष्ट हो गया है कि व्यवस्था और सत्ता पर उसकी पकड़ इतनी तो हो गई है कि उसे अपनी मांगे मनवाने और एजेंडा लागू करने के लिए आंदोलन की आवश्यकता नहीं है। इसे बहुसंख्यक वर्चस्व का नया दौर ही कहा जा सकता है। अब उसके सामने अगला लक्ष्य संविधान बदलना भर रह गया है, जिसके बाद भारत के हिंदू राष्ट्र होने का उसका सपना पूरा हो जाएगा।

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