हवा में घुलता जहर: क्या पराली से छुटकारा पाने का है कोई उपाय, क्या कहते हैं किसान और विशेषज्ञ

पंजाब और हरियाणा के गांवों में पराली जलाने का दौर शुरु होने के साथ ही सैकड़ों मील दूर दिल्ली का आकाश धुंधलाना शुरु हो गया है। साथ ही लोगों को सांस लेने में तकलीफ, आंखों में जलन और गले में खराशें पड़ने की शिकायतें भी शुरु हो गई हैं।

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ज़ैनायरा बख्श

पंजाब और हरियाणा के गांवों में पराली जलाने का दौर शुरु होने के साथ ही सैकड़ों मील दूर दिल्ली का आकाश धुंधलाना शुरु हो गया है। साथ ही लोगों को सांस लेने में तकलीफ, आंखों में जलन और गले में खराशें पड़ने की शिकायतें भी शुरु हो गई हैं।

पराली जलाना खेतों में फसल काटे जाने के बाद बची जड़ों को खत्म करने एक तरीका है, ताकि अगली फसल के लिए खेत को तैयार किया जा सके। यह काम सितंबर के आखिरी सप्ताह से शुरु होकर नवंबर माह के अंत तक चलता है। लेकिन इससे उठते धुएं के जलते आबोहवा बहुत खराब हो जाती है।

अभी शुक्रवार को पंजाब के कृषि मंत्री कुलदीप सिंह धालीवाल ने घोषणा की थी कि पंजाब सरकार ने पराली प्रबंधन के लिए किसानों को 1.33 लाख कृषि किट मुहैया कराई हैं। लेकिन उसी दिन पंजाब के अलग-अलग हिस्सों से एक ही दिन में 2,000 से ज्यादा पराली जलाने के मामले सामने आए, जिसके साथ इस तरह के मामलों की संख्या 10,000 पहुंच गई। यह आंकड़ा पराली जलाने की घटनाओं में पिछले साल के मुकाबले 26.5 फीसदी अधिक है।

गौरतलब है कि पंजाब विधानसभा चुनाव के दौरान अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने वादा किया था कि वे पराली जलाने के मुद्दे का समाधान निकालेंगे। यह भी तथ्य है कि दिल्ली जहां उनकी ही पार्टी की सरकार है, इस पराली से उठने वाले धुएं से सर्वाधिक पीड़ित रहती है। पराली जलाए जाने से दिल्ली की आबोहवा बेहद जहरीली हो जाती है और अक्टूबर, नवंबर और दिसंबर माह में तो सांस लेना भी दुश्वार हो जाता है।

ताजा आंकड़े बताते हैं कि दिल्ली में हवा की गुणवत्ता का सूचकांक 400 के आसपास पहुंच गया है जोकि बेहद खरतनाक स्तर माना जाता है। और इसका सबसे बड़ा कारण पराली जलाया जाना ही अब तक साबित हुआ है। अजयपाल सिंह ने बताया कि, “कुछ किसानों ने हमारे गांव में छूट पर मशीनें खरीदी हैं। हमारे गांव में ऐसी 8 मशीने हैं, लेकिन समस्या यह है कि सब्सिडी के बाद भी ज्यादातर किसान इन मशीनों को खरीदने की स्थिति में नहीं हैं।”

इसके अलावा एक समस्या और है। चूंकि अधिकांश खेतों को मुख्य सड़कों से काट दिया गया है, तो मशीनें खेतों तक नहीं पहुंच पा रही हैं, जिससे किसान अपने खेतों को जलाने के लिए मजबूर हैं। अजयपाल सिंह बताते हैं कि, “अब वे (पंजाब सरकार) सख्त नियम बना रहे हैं और हमारे लिए चीजों को मुश्किल बना रहे हैं। जब किसान पराली जलाते हैं, तो सरकार उनकी जमनी पर लाल निशान की एंट्री कर देती है, ऐसा होने के बाद किसान न तो अपनी जमीन बेच सकता है और न ही कोई कर्ज ले सकता है। वे लाइसेंस रद्द भी करते हैं, प्राथमिकी दर्ज करते हैं और जुर्माना भी लगाते हैं।“

सिंह का मानना है कि गिरते जल स्तर के कारण पहले ही पंजाब की खेती समाप्त होने के करीब है, और इसका समाधान यह हो सकता है कि फसलों की किस्मों को बदल दिया जाए "जो उगाने में आसान हों, जिनमें ज्यादा पानी की आवश्यकता न हो, केवल 2-3 महीने के भीतर उगें और बहुत कम उपज दें। इसके अलावा सरकार को हमें ऐसी जमीने देनी चाहिए जहां हम पराली को जमा कर सकें।"


सेंटर फॉर साइंस की एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर अरुमिता चौधरी बताती हैं कि पराली जलाकर खेत खाली करने की समस्या साल दर साल गहराती जा रही हैं। वे कहती हैं कि, “इस का दिल्ली की हवा पर असर इस बात पर निर्भर करता है कि कितनी पराली जलाई गई और हवा का रुख कैसा है। अगर हवा दिल्ली की तरफ चलती है तो दिल्ली के प्रदूषण में इजाफा हो जाता है।” उन्होंने कहा कि, “जब कम पराली जलाई जाती है और हवा का रुख अलग होता है तो दिल्ली की प्रदूषण समस्या में इसका योगदान 4 से 6 फीसदी के बीच रहता है लेकिन अगर ज्यादा पराली जले और हवा भी दिल्ली की तरफ हो तो यह आंकड़ा 30 फीसदी तक पहुंच जाता है।”

 केंद्रीय विज्ञान मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक पिछले साल यानी 2021 में पराली जलाए जाने से प्रदूषण में करीब 25 फीसदी और 2020 में करीब 32 फीसदी इजाफा हुआ था। सीएसई की अरुमिता चौधरी कहती हैं कि हवा में पर्टिकुलेट मैटर के इजाफे के लिए पराली जलाया जाना प्रमुख कारण है। और पर्टिकुलेट मैटर ही वह छोटे कण होते हैं जो सांस के साथ फेफड़ों तक पहुंचते हैं और सांस से संबंधित कई बीमारियों का कारण बनते हैं।

वे बताती है कि इस समस्या के निदान के लिए सरकार को पराली से छुटकारा पाने वाली मशीनों पर सब्सिडी बढ़ानी चाहिए। इसके अलावा अगर इन इलाकों में औद्योगिक इकाइयां हैं तो वे पराली खरीदकर अपने यहां इस्तेमाल कर सकती हैं।

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