उद्योग जगत को गुलजार होने में लग सकता है लंबा वक्त, फिलहाल तो शहर लौटने से इनकार ही कर रहे मजदूर

पूर्वी उत्तर प्रदेश में सरिया की सबसे बड़ी फैक्ट्री ने बिहार से मजदूरों को वापस बुलाने के लिए एक बस बिहार भेजी। मजदूर बस में बैठ गए। तब ही प्रधान से लेकर उनके परिवार के लोगों ने यह कहते हुए उन्हें रोक लिया कि ‘नून रोटी खाएंगे। शहर वापस नहीं जाएंगे।’ खाली बस बैरंग लौट आई।

फोटो: सोशल मीडिया
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पूर्वी उत्तर प्रदेश में सरिया की सबसे बड़ी फैक्ट्री ने बिहार से मजदूरों को वापस बुलाने के लिए एक बस बिहार भेजी। मजदूर बस में बैठ गए। तब ही प्रधान से लेकर उनके परिवार के लोगों ने यह कहते हुए उन्हें रोक लिया कि ‘नून रोटी खाएंगे। शहर वापस नहीं जाएंगे।’ खाली बस बैरंग लौट आई। दरअसल, फैक्ट्री के एक सेगमेंट में काम करने वाले मजदूरों के लौट जाने से उत्पादन प्रभावित है। कानपुर, मेरठ, बनारस, नोएडा, आगरा से लेकर बरेली तक के उद्यमी ऐसी ही मुश्किल में हैं।

कानपुर और आगरा में लेदर इंडस्ट्री की एक्सपोर्ट यूनिट को खोलने की अनुमति तो मिल गई लेकिन उत्पादन नाममात्र का हो रहा है। उद्यमियों का कहना है कि अधिकतर मजदूर बिहार, झारखंड और पूर्वी यूपी के जिलों से आते हैं। 70 फीसदी से अधिक मजदूर लौट चुके हैं। जब माल ही नहीं बनेगा तो एक्सपोर्ट क्या होगा? मेरठ में स्किल्ड मजदूरों की घर वापसी से खेल उद्योग के उत्पादों के ऑर्डर रद्द हो रहे हैं। यहां के उद्यमी अतुल कुमार का कहना है कि ‘स्किल्ड मजदूरों की वापसी नहीं होने से ऑर्डर जालंधर के उद्योगों को शिफ्ट हो रहे हैं।’ सहारनपुर में भी लकड़ी, होजरी, पेपर मिल आदि की फैक्ट्रियों का बुरा हाल है। आईआईए के बरेली चैप्टर के चेयरमैन पीयूष अग्रवाल आरोप लगाते हैं कि ‘सरकार द्वारा मिल रही सहूलियत का लाभ छोटे उद्यमियों को नहीं मिलने वाला है। छोटे उद्योग बंद होंगे। लाखों का रोजगार छिनेगा।’

मुख्यमंत्री के गृहक्षेत्र- गोरखपुर, में गीडा (गोरखपुर औद्योगिक विकास प्राधिकरण) से लेकर गोरखनाथ इंडस्ट्रियल एरिया के 400 से अधिक फैक्ट्रियों में सालाना 4,000 करोड़ का कारोबार होता है। चैंबर ऑफ इंडस्ट्रीज के अध्यक्ष विष्णु अजीत सरिया बताते हैं कि ‘लॉकडाउन में 500 करोड़ से अधिक का उत्पादन प्रभावित हो चुका है। लॉकडाउन खुल भी जाए तो फैक्ट्रियों को सामान्य स्थिति में आने में कम-से-कम छह महीने लगेंगे। तमाम फैक्ट्रियों में मजदूर ही नहीं है। सिर्फ ब्रेड, सैनिटाइजर, बिस्किट बनाने वाली फैक्ट्रियों में जैसे-तैसे उत्पादन हो रहा है।’ गीडा में सबसे बड़ी सरिया फैक्ट्री में 50 फीसदी क्षमता से भी उत्पादन भी नहीं हो रहा है। धागे की फैक्ट्री के मालिक निखिल कहते हैं कि ‘लॉकडाउन में निर्माण लागत काफी बढ़ गई है। अभी एक ही शिफ्ट में काम हो रहा है लेकिन बिजली का बिल पूरा देना पड़ रहा है। 800 की क्षमता वाली फैक्ट्री में अभी आधे कर्मचारी काम कर रहे हैं।’ रेलवे को माल सप्लाई करने वाली आरके इंजीनियरिंग स्किल्ड मजदूरों के वापस चले जाने से बंद पड़ी है। इसके मालिक आरएन सिंह बताते हैं कि ‘20 अप्रैल को ही अनुमति मिल गई थी लेकिन सुपरवाइजर और मजदूर आजमगढ़ में फंसे हैं।’ फर्नीचर का प्लांट संचालित करने वाले आरिफ साबिर बताते हैं कि ‘पुराने कारीगर अभी वापस नहीं आ रहे हैं। गर्मी का वैवाहिक सीजन लॉकडाउन में बर्बाद हो गया। ठंड की लगन मजदूरों के संकट से बर्बाद होती दिख रही है। लॉकडाउन में करीब 15 करोड़ का कारोबार प्रभावित हुआ है।’

वैसे, कुछ उद्यमी मजदूरों की वापसी का फायदा उठाने कोशिश कर रहे हैं लेकिन पिछले अनुभव उत्साह पैदा करने वाले नहीं हैं। गोरखपुर में कुटीर उद्योग चलाने वाले महेश अग्रवाल लुधियाना से लेकर दिल्ली से आए कारीगरों के भरोसे टोमेटो केचप, नूडल्स, चिली साॅस और मैक्रोनी की फैक्ट्री लगाने की योजना बना रहे हैं। महेश कहते हैं कि ‘ऋण लेकर ऐसे स्किल्ड कारीगरों को रोजगार देंगे जो लुधियाना और दिल्ली में काम कर रहे थे।’ फाजिलनगर निवासी बलदेव टोमेटो केचप के कारीगर हैं। वह कहते हैं कि ‘लुधियाना से कुछ कम वेतन भी मिलेगा तो भी अब यहीं काम करेंगे।’ इसी तरह दिल्ली में नूडल्स की फैक्ट्री में काम करने वाले महराजगंज के सुभाष का कहना है कि ‘गोरखपुर मंडल के करीब 15 कारीगर दिल्ली में साथ काम करते थे। सभी गोरखपुर में काम करने को तैयार हैं।’ नोएडा में गद्दा बनाने वाले वीर सिंह 27 मई को गीडा में नई प्लांट को लेकर भूमि पूजन कर रहे है। फर्नीचर कारोबारी आरिफ साबिर कहते हैं कि ‘जो कारीगर मुंबई और हैदराबाद में काम करते थे, उनमें से कई संपर्क में हैं। अब ऋण लेकर यूनिट का विस्तार करेंगे।’

लेकिन सरकार फिलहाल ऐसा कोई कदम नहीं उठा रही जिससे उद्यमियों का भरोसा बने। चैंबर ऑफ इंडस्ट्रीज के पूर्व अध्यक्ष एसके अग्रवाल का कहना है कि ‘सरकार अभी लॉकडाउन पीरियड का बिजली बिल माफ नहीं कर रही तो और उम्मीद कैसे करें? सस्ती जमीन, सस्ती बिजली और बाजार सरकार मुहैया कराए तो वापस आए मजदूर संपदा बन सकते हैं।’ उद्यमी चंद्रप्रकाश अग्रवाल मानते हैं कि बाहर से आने वाले मजदूर अभी लौटने के बारे में सोच नहीं रहे हैं। ऐसे में, मजदूरों को चार श्रेणियों में बांटना होगाः पहला, जो शायद अब कभी वापस नहीं जाएंगे; दूसरा, जो गांव-कस्बे में ही अपने हुनर के मुताबिक काम शुरू करेंगे; तीसरा, जो अपने आवास के 50 से 100 किलोमीटर के दायरे में रोजगार की तलाश करेंगे; और चैथा, जो थक-हारकर वापस महानगरों को फिर जाएंगे।’ धागा बनाने वाली फैक्ट्री के मालिक निखिल जालान का कहना है कि बड़े शहरों से लौटे मजदूरों में अभी भय है, गुस्सा है। इस गुस्से और कोरोना के खौफ में तीन से छह महीने तक अर्थव्यवस्था बेपटरी रहेगी।’ ऐसे में, दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र विभागाध्यक्ष प्रो.पीसी शुक्ला का मानना है कि उद्यमियों को विशेष पैकेज मिले तो यूपी में निवेश बढ़ेगा।

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