आसान नहीं भारत में महिला होना, अगर वह सत्ता में बैठे पुरुषों से टकरा गई, तब तो उसकी खैर नहीं!
महिलाओं के मामले में नौवें सबसे खतरनाक देश का तमगा पा चुके भारत में अपराधियों का इस तरह बेखौफ हो जाना चिंता में डालने वाला है और एक नया चलन भी।

दिसंबर 2025 के आखिरी हफ्ते में मध्य प्रदेश के सतना से एक दिल दहला देने वाला वीडियो सामने आया। बलात्कार का आरोपी अशोक सिंह, जो एक बीजेपी पार्षद का पति है, एक महिला से कहते सुनाई दे रहा है: “मेरा क्या होगा? कुछ नहीं होने वाला। जहां चाहो कर लो शिकायत।”
महिला ने छह महीने बाद शिकायत दर्ज कराई और बताया कि उसने न सिर्फ बलात्कार किया, उसका वीडियो भी बनाया और उसका इस्तेमाल उसे खमोश रहने के लिए ब्लैकमेल करने में किया। जब उसने 20 दिसंबर को दोबारा उससे संपर्क करना चाहा, तो उसने उसे बेनकाब करने की धमकी दी और वैसा ही किया भी। पुलिस ने मामला तो दर्ज कर लिया, लेकिन अशोक सिंह को अभी तक गिरफ्तार नहीं किया गया है।
महिलाओं के मामले में नौवें सबसे खतरनाक देश का तमगा पा चुके भारत में अपराधियों का इस तरह बेखौफ हो जाना चिंता में डालने वाला है और एक नया चलन भी। भारत, जहां हर रोज बलात्कार की 88 घटनाएं दर्ज होती हैं (असल संख्या तो कम-से-कम तीन गुना ज्यादा है) और सत्ता में बैठे लोग न सिर्फ महिलाओं के साथ शारीरिक हिंसा करते हैं, बल्कि खुलेआम उनका बखान भी करने से बाज नहीं आते।
23 दिसंबर 2025 को जब उन्नाव बलात्कार कांड के आरोपी कुलदीप सिंह सेंगर की कारावास की सजा दिल्ली उच्च न्यायालय ने निलंबित कर दी, तो जनता में आक्रोश फैल गया। सड़कों और सोशल मीडिया पर ‘कार्यकर्ता जेल में, बलात्कारी जमानत पर’ के नारे गूंजने लगे। 2017 में अपने बलात्कारी को बेनकाब करने का साहस दिखाने वाली पीड़ित ने इसबार भी वही किया जो वह वर्षों से करती आ रही है: संघर्ष। कड़ाके की ठंड में उसके साथ विरोध प्रदर्शन करने वाली महिला कार्यकर्ताओं को पुलिस ने जबरन हटा दिया। पीड़िता नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से मिली और उसे मीडिया एवं जनता दोनों का जैसा समर्थन मिला, उसके बाद सर्वोच्च न्यायालय की अवकाशकालीन पीठ ने 29 दिसंबर को आदेश पर रोक लगा दी। सेंगर अब आगे की सुनवाई तक जेल में ही रहेगा। लेकिन, जैसा कि पीड़िता के वकील महमूद प्राचा कहते हैं, “हमें बस सांस लेने का एक अवसर मिला है, लेकिन यह जीत नहीं है।”
उन्नाव बलात्कार मामला कोई सामान्य मुकदमा नहीं था। पीड़िता के लगातार सार्वजनिक विरोध प्रदर्शनों के बाद ही इस मामले को दर्ज किया गया, जिसमें लखनऊ में मुख्यमंत्री के आवास के बाहर उसके द्वारा आत्मदाह का प्रयास भी शामिल था। सेंगर को 2018 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद ही गिरफ्तार किया गया था, जिसमें कोर्ट ने टिप्पणी की थी, “इस मामले का सबसे परेशान करने वाला पहलू यह है कि कानून-व्यवस्था तंत्र और सरकारी अधिकारी सीधे तौर पर कुलदीप सिंह के साथ मिले हुए थे और उसके प्रभाव में थे।”
पीड़िता और उसके परिवार को इस ताकतवर विधायक को बलात्कारी बताने के कारण भीषण विरोध और मुश्किलों का सामना करना पड़ा। उसके पिता पर पुलिसकर्मियों ने घातक हमला किया (चिकित्सा रिपोर्ट के अनुसार 48 चोटें आईं), 2018 में उन्हें झूठे मामले में फंसाया गया और पुलिस हिरासत में ही उनकी मृत्यु हो गई। इस हमले के चश्मदीद एक किराना दुकान मालिक मोहम्मद यूनुस की भी रहस्यमय हालात में मृत्यु हो गई। 2021 में एक ट्रक ने उस वाहन को टक्कर मार दी जिसमें बलात्कार पीड़िता अदालत में अपना बयान देने जा रही थी। इस ‘दुर्घटना’ में उसके वकील और दो मौसियों की मौत हो गई। बुरी तरह घायल पीड़िता को लखनऊ ले जाया गया और बाद में इलाज के लिए दिल्ली के एम्स में भर्ती कराया गया।
नौकरी का लालच देकर सेंगर के घर ले जाई गई वह 16 वर्षीय लड़की, जिसके साथ सेंगर ने बलात्कार किया था, अब शादीशुदा है और उसके दो बच्चे हैं। एक ऐसे मामले में जब पूरा तंत्र पूरी तरह शक्तिशाली लोगों के पक्ष में खड़ा दिख रहा हो, इस पीड़िता का साहस और दृढ़ता असाधारण उदाहरण है।
अंकिता भंडारी का ही मामला लीजिए। 19 वर्षीय अंकिता की हत्या पुलकित आर्य (और दो अन्य साथियों) ने 2022 में इसलिए कर दी थी क्योंकि उसने ऋषिकेश के उस रिसॉर्ट में एक वीआईपी अतिथि को ‘अतिरिक्त सेवाएं’ देने से इनकार कर दिया था, जहां वह रिसेप्शनिस्ट के रूप में काम करती थी। इस घटना के बाद अंकिता अचानक लापता हो गई और छह दिन बाद 24 सितंबर को उसका क्षत-विक्षत शव ऋषिकेश के पास एक बांध से बरामद किया गया। रिसॉर्ट का मालिक एक भाजपा नेता विनोद आर्य था, जिसे बाद में पार्टी से निकाल दिया गया। हत्यारों को गिरफ्तार कर लिया गया और वे जेल में हैं। लेकिन इस मामले में उस ‘वीआईपी’ की पहचान कभी उजागर नहीं की गई।
हालांकि, साल बीतते-बीतते दिसंबर के आखिरी सप्ताह में कुछ नए आरोप सामने आए। बीजेपी के पूर्व विधायक सुरेश राठौर की पत्नी उर्मिला सनावर ने दावा किया कि भंडारी से यौन संबंध बनाने की मांग करने वाला वीआईपी एक वरिष्ठ नेता था, जिसका उपनाम ‘गट्टू’ था। उन्होंने एक ऑडियो क्लिप भी जारी की, जिसमें राठौर कथित तौर पर उसकी पहचान भाजपा महासचिव और उत्तराखंड के पार्टी प्रभारी दुष्यंत गौतम के रूप में करते सुनाई पड़ते हैं।
हालांकि गौतम ने इन आरोपों से इनकार किया है। उधर, राठौर ने अपने बयान से पलटते हुए सनावर पर बीजेपी को बदनाम करने का आरोप लगाया है। इसके बाद पुलिस ने सनावर और राठौर के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है। स्थानीय पुलिस की गंभीर लापरवाही के पुख्ता सबूत पेश किए जाने के बावजूद, सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई जांच की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। इन सबूतों में महत्वपूर्ण सीसीटीवी फुटेज जमा न करना, रिसॉर्ट स्टाफ के कॉल रिकॉर्ड जब्त न करना और पीड़िता के लापता होने की रात ही उसके कमरे को बुलडोजर से ध्वस्त कर देना आदि शामिल हैं।
गौतम ने फेसबुक पर खासी आस्था वाले अंदाज में लिखा: ‘अपने 27 साल के सामाजिक जीवन में, महिलाओं के प्रति मेरे सम्मान या पार्टी में मेरे आचरण पर सवाल उठाने वाली कोई घटना कभी नहीं हुई।’ अलग बात है कि महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का आरोप है कि उनके खिलाफ छेड़छाड़ की कम-से-कम सात शिकायतें दर्ज हैं।
दावों-प्रतिदावों के ताजा दौर में उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और लोकसभा सांसद त्रिवेंद्र सिंह रावत जहां एक ओर यह ऐलान करते दिखे कि कोई कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, उसे बख्शा नहीं जाएगा, वहीं कांग्रेस नेता मुमताज पटेल ने महिला सशक्तिकरण को लेकर सरकार के खोखले दावों पर हैरानी जताई, जबकि महिलाएं एक के बाद एक अत्याचारों का शिकार हो रही हैं। उन्होंने कहा, “बीजेपी से जुड़े लोग इतना बेखौफ होकर इसीलिए काम करते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि सरकार का संरक्षण उनके साथ है।”
इस सबमें शायद सर्वाधिक दिल दहला देने वाली आवाज अंकिता की मां सोनी देवी की है, जिन्होंने अदालतों में सबूत पेश करने और न्याय दिलाने की गुहार लगाई है।
दिसंबर में राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो (एनसीआरबी) की महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर 2023 की रिपोर्ट भी जारी हुई। इसके अनुसार 2023 में महिलाओं पर हमले के 83,891 मामले और बलात्कार के 29,670 मामले दर्ज किए गए। रिपोर्ट में बलात्कारियों द्वारा मार दी गई पीड़िताओं और सामूहिक बलात्कार की शिकार पीड़िताओं को अलग-अलग सूचीबद्ध नहीं किया गया है। हालांकि रिपोर्ट में महिलाओं के खिलाफ अपराधों में मामूली वृद्धि का दावा किया गया है: 2022 में 4.45 लाख से बढ़कर 2023 में 4.48 लाख, लेकिन महिलाओं की वास्तविक स्थिति इससे बिल्कुल अलग है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा महिलाओं की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता बताने के सार्वजनिक बयानों के बावजूद, उनकी सरकार व्यवस्थागत समस्याओं का समाधान करने में विफल रही है। हिंसा को सामान्य बात मान लिया गया है, वैवाहिक बलात्कार को अपराध की मान्यता नहीं दी जाती। केन्द्र सरकार द्वारा कानून व्यवस्था को राज्य का विषय बताकर मामला सुलझाने की कोशिश के बावजूद, यह देखना रोचक है कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान (ये सभी भाजपा शासित राज्य हैं) में महिलाओं के खिलाफ अपराध की दर चौंकाने वाली रूप से कहीं ज्यादा बनी हुई है।
मार्च 2025 में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने स्वीकार किया कि वहां हर रोज बलात्कार के 20 मामले दर्ज किए जा रहे थे। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की महिलाओं से जुड़े बलात्कार के मामलों में 11.86 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी। इंदौर में बलात्कार के मामलों में 103 प्रतिशत की वृद्धि हुई; भोपाल में 59 प्रतिशत की वृद्धि हुई।
उत्तर प्रदेश में लगातार तीसरे वर्ष बलात्कार और हत्याओं की संख्या सबसे ज्यादा दर्ज की गई। 2023 में, राज्य में महिलाओं के अपहरण और अगवा किए जाने की कुल घटनाओं में से 15 प्रतिशत घटनाएं दर्ज की गईं, जिसमें राजधानी लखनऊ ने रिपोर्ट किए गए मामलों की संख्या में गाजियाबाद और कानपुर को पीछे छोड़ दिया।
कानपुर स्थित गैर सरकारी संगठन महिला मंच चलाने वाली नीलम चतुर्वेदी कहती हैं, “उत्तर प्रदेश में बलात्कार कोई नई बात नहीं है, और दलित महिलाओं के खिलाफ अपराध आम हैं। लेकिन जिस बात को समझ पाना वाकई बहुत मुश्किल है, वह है बलात्कार के समय सामने आने वाली क्रूरता और दरिंदगी की घटनाओं में भारी वृद्धि।”
सामाजिक कार्यकर्ता और माकपा पोलित ब्यूरो सदस्य सुभाषिनी अली स्पष्ट शब्दों में कहती हैं, “महिलाओं की बात करें तो उन्नाव, हाथरस, मेरठ और बरेली समेत उत्तर प्रदेश के अधिकांश हिस्से कत्लगाह बन चुके हैं।”
भारत में महिला होना वैसे भी मुश्किल है। सत्ता में बैठे पुरुषों से टकराने पर तो और भी ज्यादा मुश्किल हो जाता है।
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