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झारखंडः करोड़ों का कंबल घोटाला सामने आने के बाद सवालों के घेरे में बीजेपी की रघुवर सरकार

बहुचर्चित चारा घोटाले की तर्ज पर झारखंड में एक कंबल घोटाला सामने आया है। सीएजी रिपोर्ट के अनुसार रघुवर सरकार में ऐसे ट्रकों से धागे ‘ढोए’ गए जो तकरीबन 250 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ते थे। इस घोटाले के सामने आने से रघुवर सरकार निशाने पर आ गई है।

फोटोः सोशल मीडिया

रवि प्रकाश

एक ट्रक की अधिकतम स्पीड क्या हो सकती है। 20, 25 या फिर 30 किलोमीटर प्रति घंटा। आप इस पर अलग राय रख सकते हैं। संभव है कोई ड्राइवर ट्रक को 40 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से भी चला ले। लेकिन, क्या कोई ट्रक 250 किमी प्रति घंटे से भी अधिक की रफ्तार से चल सकता है? आप इस पर दो राय नहीं होंगे कि ऐसा नहीं हो सकता क्योंकि ऐसा संभव ही नहीं है।

भारत में बनने वाले ट्रकों की तकनीक और क्षमता ट्रकों को इस स्पीड से चलने की इजाजत नहीं देतीं। लेकिन, झारखंड सरकार की संस्था झारक्राफ्ट ने कुछ ट्रकों को इसी स्पीड से चलवाया है। उन ट्रकों में ऊनी धागे लदे थे, जिनसे राज्य में कंबलों की बुनाई की जानी थी। झारक्राफ्ट का दावा है कि इन धागों से बने कंबल बुने भी गए और गरीबों में बांटे भी गए। इस एवज में सरकार की ओर से करोड़ों का भुगतान भी किया गया। लेकिन सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में इन दावों को फर्जी करार दे दिया है। इस रिपोर्ट ने झारखंड में कंबल घोटाले की पुष्टि कर दी है, जिसके बाद इसकी सीबीआई जांच की मांग की जा रही है।

खुद बीजेपी की रघुवर दास सरकार में कैबिनेट मंत्री सरयू राय ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर कहा है कि यह घोटाला बहुचर्चित चारा घोटाले की तर्ज पर हुआ है और सरकार को अपनी साख बचाने के लिए सीबीआई से इसकी जांच का आदेश देना चाहिए। वहीं, विपक्ष ने मुख्यमंत्री रघुवर दास केइस्तीफे की मांग की है। गौरतलब है कि चारा घोटाले में स्कूटर से चारा ढोया गया था और झारखंड में हुए इस कंबल घोटाले में बिजली की रफ्तार से चलते ट्रकों से धागे धोए गए।

यह इत्तेफाक ही है कि सीएजी की रिपोर्ट तब सामने आई, जब झारखंड में सत्ता पर काबिज बीजेपी की रघुवर दास सरकार अपनी चौथी सालगिरह मनाने की तैयारियों में लगी थी। 28 दिसंबर को इस सरकार की चौथी सालगिरह से ठीक एक दिन पहले सीएजी ने अपनी रिपोर्ट सार्वजनिक की। 27 दिसंबर को विधानसभा के शीतकालीन सत्र का आखिरी दिन था। लिहाजा, सीएजी की यह चर्चित रिपोर्ट उसी दिन सदन के पटल पर भी रखी गई। अव्वल तो यह कि सीएजी रिपोर्ट के हवाले से यहां हुए कंबल घोटाले की खबर जिन अखबारों में छपी, सरकार ने उन्हीं अखबारों के पहले पन्ने पर भ्रष्टाचार मुक्त शासन के अपने दावे से संबंधित विज्ञापन भी प्रकाशित करवाए थे। सीएजी ने कंबल घोटाले के साथ ही कुछ और गड़बड़ियां भी पकड़ी हैं, जिनसे राज्य में हुई वित्तीय अनियमितताओं और अपव्यय की पुष्टि होती है।

हालांकि, सरकार ने इस गड़बड़ी के उजागर होने से पहले ही 28 सदस्यीय समिति बनाकर इसकी जांच के आदेश दे दिए थे। लेकिन, अभी तक इसकी रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई है। जांच कमेटी बनने के कुछ ही दिन बाद झारक्राफ्ट के तत्कालीन प्रबंध निदेशक (एमडी) मंजूनाथ भजंत्रि ने इन गड़बड़ियों की मुख्य आरोपी तत्कालीन सीईओ रेणु गोपीनाथ परिक्कर का अधिकार सीज कर दिया। इसके बाद परिक्कर ने मंजूनाथ भजंत्रि के पूर्ववर्ती एमडी के रविकुमार पर कई संगीन आरोप लगाते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। तब वरिष्ठ आईएएस अधिकारी के. रविकुमार (वर्तमान उद्योग सचिव) ने परिक्कर के खिलाफ मानहानि का मामला दर्ज करवा दिया, लेकिन सरकार ने उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। अब उद्योग सचिव का तर्क है कि अभी इस मामले की जांच चल रही है, ऐसे में इस दौरान कोई कार्रवाई कैसे की जा सकती है। हमें जांच पूरी होने तक इंतजार करना चाहिए।

कैसे हुआ पूरा घोटाला

झारखंड सरकार ने साल 2017-18 के दौरान गरीबों के बीच बांटने के लिए करीब 10 लाख कंबल बनाने का जिम्मा झारक्राफ्ट को सौंपा था। तब मुख्यमंत्री रघुवर दास ने कहा था कि “हर साल यह काम टेंडर कर निजी कंपनियों को दिया जाता था, लेकिन इस बार हम लोग कंबल बुनाई का काम राज्य की सखि मंडलों और बुनकर समितियों को देंगे ताकि वे आर्थिक तौर पर मजबूत हो सकें। यह काम झारक्राफ्ट के जरिये होगा। सरकार इन कंबलों को खरीदेगी और इन्हें गरीबों में बांटा जाएगा। लिहाजा, इसके लिए टेंडर की जरूरत नहीं।

इसके बाद झारक्राफ्ट ने कंबल बुनाई के लिए पानीपत से 18.81 लाख किलो ऊनी धागा ट्रकों से मंगाने और उसकी बुनाई के बाद फिनिशिंग टच के लिए कंबलों को पानीपत भेजने के लिए कुछ कंपनियों से करार किया। एजी की रिपोर्ट कहती है कि झारक्राफ्ट ने जिन ट्रकों से धागा मंगवाने और फिर उन्हें फिनिशिंग के लिए पानीपत भेजने का दावा किया है, वे जांच में फर्जी पाए गए हैं। एजी ने इन ट्रकों के पानीपत से झारखंड आने के दौरान विभिन्न टोल प्लाजा से उनके गुजरने के दावे का जब एनएचएआई (नेशनल हाईवे आथरिटी आफ इंडिया) के दस्तावेजों से मिलान किया, तो वे दावे फर्जी पाए गए। दरअसल, उन तारीखों पर वे ट्रक इन टोल प्लाजा से गुजरे ही नहीं। झारक्राफ्ट ने 144 ट्रकों के 320 फेरे लगाने का तारीखवार दस्तावेज सौंपा था। इनमें से 318 ट्रिप फर्जी पाए गए। पानीपत से 19.93 लाख किलो ऊनी धागा मंगवाने के दावे की जांच के क्रम में एजी ने पाया कि इनमें से 18.81 लाख किलो धागा मंगाया ही नहीं गया और इसके एवज में करीब 14 करोड़ का भुगतान कर दिया गया। ऐसे कुछ और भुगतान भी फर्जी दस्तावेजों के आधार पर किए गए। एक-एक सखि मंडल से एक दिन में तीन-तीन लाख पीस कंबलों की बुनाई के दावे किए गए, जो संभव ही नहीं थे।

बिल बनाने की हड़बड़ी में की गईं कई गड़बड़ियां

पानीपत से झारखंड आने के क्रम में कुछ वैसे ट्रकों का जिक्र है, जिन्होंने यह दूरी सिर्फ 24 घंटे या उससे भी कम समय में तय कर ली। इसी तरह कुछ ट्रकों ने एक ही वक्त पर दो अलग-अलग रूटों पर सफर किया। ऑडिट में यह गड़बड़ी भी पकड़ी गई, क्योंकि उस स्पीड पर ट्रक का चलना संभव ही नहीं। दरअसल, झारक्राफ्ट ने एनुअल वूलन मिल्स और उन्नति इंटरनेशनल नामक कंपनियों से धागे की सप्लाई और हरियाणा की ही ट्रांसपोर्ट कंपनियों से माल ढुलाई के लिए ट्रकों का करार किया था। इस कंपनी ने एक ही नंबर के ट्रक को एक ही वक्त में दो अलग-अलग रूटों में चलना दिखाया। ऐसा तभी संभव होता जब कोई ट्रक 250 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चले। इस तरह की कई और गड़बड़ियां भी की गई हैं।

कौन हैं रेणु परिक्कर

मूलतः केरल की रहने वाली रेणु परिक्कर को रघुवर दास का करीबी माना जाता है। उनकी पढ़ाई-लिखाई जमशेदपुर में हुई है, जो मुख्यमंत्री का विधानसभा क्षेत्र है। झारखंड में रघुवर दास के सत्ता में आने के बाद रेणु सक्रिय हो गईं और सरकार ने बगैर वांक्षित योग्यता के उन्हें झारक्राफ्ट का सीईओ बना दिया। इसके साथ ही उन्हें लघु उद्यमी बोर्ड का सदस्य भी बना दिया गया। कहा यह भी जाता है कि वह बीजेपी की सदस्य भी हैं और उनकी नियुक्ति के लिए राजनीतिक लॉबी काम कर रही थी।

झारखंड प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डॉ. अजय कुमार ने इस घोटाले के लिए मुख्यमंत्री को दोषी करार दिया है। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि सरकार इस मामले की सीबीआई जांच कराने से क्यों कतरा रही है?

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