जेएनयू: असहमति जताने का अधिकार फिर हासिल करने का संघर्ष

देखना जरूरी कि जेएनयू के विद्यार्थियों ने पिछले 10 साल में क्या-क्या खो दिया है?

 दिल्ली स्थित जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में छात्र असहमति के अधिकार के लिए संघर्ष कर रहे हैं
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नंदलाल शर्मा

जेएनयू में स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज (एसआईएस) की बिल्डिंग के खंभों से बंधा एक बैनर हवा में लहरा रहा हैः 'एसआईएस इज ऑन स्ट्राइक अगेंस्ट चीफ प्रॉक्टर (सीपीओ) मैनुअल' (सीपीओ मैनुअल के खिलाफ एसआईएस हड़ताल पर है)। इसके सामने स्कूल ऑफ लैंग्वेज और एसआईएस के बीच के लॉन में एक टेन्ट लगा है जिसमें बिछे गद्दे और रजाइयों के साथ एक गैस सिलिंडर और चूल्हे पर रखा पतीला भी दिखता है। अलग-अलग छात्र संगठनों की पारंपरिक डफली भी दिखती हैं, जो जेएनयू के स्टूडेंट्स यूनियन की पहचान बन चुकी है।

बात 22 फरवरी की है। पूर्व प्रोफेसर आनंद कुमार 1974 में जेएनयू स्टूडेंट्स यूनियन के अध्यक्ष थे। उनका 'आउट ऑफ बाउंडस - क्लासरूम' के तहत लेक्चर होने वाला था। इसके साथ ही, निलंबित छात्र शाम को निकलने वाले जुलूस की तैयारी में जुटे थे। यह प्रतिरोध अन्य बातों के अलावा जेएनयू कुलगुरु (कुलपति को कुलगुरु ही कहा जाने लगा है) शांतिश्री डी पंडित की 16 फरवरी के पॉडकास्ट में की गई उस टिप्पणी के खिलाफ भी है जिसमें उन्होंने दलितों पर स्थायी भाव से 'विक्टिम कार्ड खेलने' का आरोप लगाया। (उन्होंने दलितों और अश्वेतों के लिए सकारात्मक कार्रवाई की तुलना 'अस्थायी प्रकार के नशे' से भी की।)

मैं कुछ छात्रों से बात कर ही रहा था कि अचानक एक सुरक्षा गार्ड वहां पहुंच गया। उसने मुझसे पूछा किः क्या आपके पास रिकॉर्डिंग करने की अनुमति है? आपको किसने बुलाया है? आप यहां क्या करने आए हैं? उसने तस्वीरें लेने की अनुमति लेने के लिए मुख्य द्वार के पास स्थित नियंत्रण कक्ष में जाने को कहा।

नियंत्रण कक्ष में मुझे बताया गया कि मैं उस छात्र को साथ लाऊं जो मेरी ओर से अनुमति ले सके और अगले दिन वापस आऊं। (अनुमति 24 घंटे पहले लेनी होती है) गार्डों ने मुझसे कहा, 'अगर आप ऐसा नहीं कर सकते, तो चले जाइए। अगर आप खुद नहीं जाते, तो हमें आपको निकालना पड़ेगा।'

मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं। इसलिए मैंने छात्रों से ही पूछा। उन्होंने कहा कि अनदेखा कीजिए। वे यही करते हैं। और इसी का खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ता है। मेरे पास कैंपस से निकल जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।

उसी रात अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) का जेएनयूएसयू और अन्य भाग लेने वाले वामपंथी छात्र संगठनों के साथ हिंसक टकराव हुआ। 23 फरवरी को, जेएनयू प्रशासन ने 'विश्वविद्यालय के नियमों और विनियमों तथा बीएनएस के तहत कड़ी कार्रवाई करने' का बयान जारी किया। इसके बाद छात्र नेताओं के खिलाफ दंगा और आपराधिक साजिश के मामले दर्ज किए गए।


कैंपस में फेसियल रिकॉग्निशन टेक्नोलॉजी (एफआरटी) लगाए जाने के खिलाफ नवंबर 2025 में हुए प्रदर्शन में कथित भूमिका को लेकर यूनियन की अध्यक्ष अदिति मिश्रा, उपाध्यक्ष के. गोपिका, महासचिव सुनील यादव और संयुक्त सचिव दानिश अली के साथ पूर्व अध्यक्ष नीतीश कुमार को प्रॉक्टोरियल जांच के बाद निलंबित कर दिया गया है। इन लोगों पर डॉ. बी. आर. आम्बेडकर सेंट्रल लाइब्रेरी में एफआरटी-आधारित एक्सेस गेट्स और सीसीटीवी कैमरों को नुकसान पहुंचाने के आरोप हैं।

चीफ प्रॉक्टर द्वारा 2 फरवरी को जारी आदेश के अनुसार, नीतीश कुमार और अन्य को पुस्तकालय में लगभग 20 लाख रुपये की लागत से लगाए गए एफआरटी-आधारित एक्सेस गेट्स को 21 नवंबर 2025 को नुकसान पहुंचाने का दोषी पाया गया है। नीतीश के साथ अदिति मिश्रा, गोपिका बाबू, सुनील यादव और दानिश अली पर 20-20 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है। 8 छात्र ऐसे भी हैं, जिन पर ताली बजाने और नारे लगाने के लिए 19-19 हजार रुपये के जुर्माने लगाए गए हैं।

संयुक्त सचिव दानिश कहती हैं कि यह सब इसलिए हुआ कि जेएनयू में मजबूत स्टूडेंट्स यूनियन है। उन्होंने कहा कि 'हमारी लड़ाई सिर्फ निलंबन के खिलाफ नहीं है बल्कि छात्रों के अधिकारों की रक्षा के लिए भी है। प्रशासन से सवाल पूछने वाला कोई छात्र यूनियन किसी सत्ता को पसंद नहीं। सीपीओ (चीफ प्रॉक्टर ऑफिस) मैनुअल के जरिये प्रतिरोध की आवाज उठाने वाले छात्रों को वर्षों से दंडित किया जा रहा है और हम इसका विरोध कर रहे।'

15 पेज का 2023 का यह मैनुअल ऑनलाइन उपलब्ध है। इसमें तीन श्रेणियां हैं। लेकिन इसमें सबसे महत्वपूर्ण बातें हैं कि जेएनयू में किसी भी शैक्षणिक एवं प्रशासनिक परिसर के 100 मीटर के दायरे के भीतर भूख हड़ताल, धरना, सामूहिक वार्ता (ग्रुप बार्गेनिंग) या किसी अन्य प्रकार का विरोध प्रदर्शन करना या ऐसे परिसरों के प्रवेश या निकास मार्ग को अवरुद्ध करने पर 20 हजार रुपये तक का जुर्माना, दो सेमेस्टर के लिए हॉस्टल से निष्कासन के साथ, रस्टीकेशन (निलंबन) और जेएनयू कैंपस से पूरे दो सेमेस्टर के लिए निष्कासन की हैं। इसमें धार्मिक, सांप्रदायिक, जातिवादी या 'राष्ट्र-विरोधी' टिप्पणियों वाले पोस्टर लगाने/पैम्फलेट बांटने या चिपकाने पर 10 हजार रुपये के जुर्माने का प्रावधान है। इसी तरह, सुरक्षाकर्मियों द्वारा साक्ष्य संग्रह के समय (कैमरा, फोन आदि-जैसे) इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को बाधित करना या उन्हें क्षति पहुंचाने के लिए भी सजा का प्रावधान है।

कुलपति शांतिश्री पंडित का कहना है कि यह नियमावली 1969 से अस्तित्व में है और इसमें कोई मौलिक परिवर्तन नहीं हुआ है। लेकिन नवीनतम नियमावली से पहले भी असहमति जताने वालों को दंडित किया जाता था। पुराने मामलों को फिर से खोला जाता था। छात्रावासों में पानी जैसे बुनियादी अधिकारों की मांग करने पर छात्रों को निलंबित या जुर्माना लगाया जाता था।


छात्रावास निवासी एक दिव्यांग को 'आउट ऑफ बाउंड्स' घोषित कर दिया गया। 'आउट ऑफ बाउंड्स' का मतलब है कि संबंधित विद्यार्थी को होस्टल का अपना कमरा खाली करना पड़ेगा और तकनीकी रूप से उसे कैंपस में प्रवेश करने से रोक दिया जाएगा। जिन विद्यार्थियों के साथ इस बार इस किस्म की कार्रवाई की गई है, वे यहीं बने हुए हैं, एक बड़े संघर्ष की तैयारी में- जेएनयू ने पिछले एक दशक में जो कुछ खोया है, उसे वापस पाने के लिए।

पूर्व अध्यक्ष आनंद कुमार कहते हैं कि उन्होंने इससे अधिक दमनकारी सीपीओ के बारे में कभी नहीं सुना लेकिन पूर्व अध्यक्ष नीतीश कुमार का आरोप है कि यह सब 2016 में शुरू हुआ जब एम. जगदेश कुमार को ’'जेएनयू को बर्बाद करने के लिए' वाइस चांसलर बनाया गया। उनके ही कार्यकाल में 2016 में पहली बार जेएनयू प्रशासन ने अपने स्टूडेंट्स के खिलाफ खुद एफआईआर करवाई। फैकल्टी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और बीजेपी से जुड़े लोगों को नियुक्ति दी गई। फिर, जेएनयू प्रवेश परीक्षा के पैटर्न को बदला गया और उसे एनटीए (नेशनल टेस्ट एजेंसी) को सौंप दिया गया। जीएस-कैश (जेंडर सेंसिटाइजेशन कमिटी अगेंस्ट सेक्सुअल हैरेसमेंट) को खत्म कर उसकी जगह आईसीसी (इंटरनल कम्प्लेंट्स कमिटी) को लागू किया गया। छात्र संघ को एकेडमिक काउंसिल में मिलने वाला प्रतिनिधित्व छीन लिया गया। छात्र संघ को मिलने वाला फंड बंद कर दिया गया।

छात्र संघ ने 15 से ज्यादा मांगें की हैं। इनमें वाइस चांसलर के इस्तीफे के साथ छात्रों का निलंबन खत्म करने, रोहित एक्ट लागू करने, यूजीसी गाइडलाइंस लागू करने, सिद्धांत फाउंडेशन को हटाने, शिक्षकों के प्रमोशन, खाली पदों पर नियुक्तियां करने और लाइब्रेरियन मनोरमा त्रिपाठी को हटाने जैसी बातें शामिल हैं। छात्र संघ का कहना है कि स्कूल ऑफ लैंग्वेजेज में सिद्धांत फाउंडेशन रिकॉर्डेड वीडियो के जरिये छात्रों को पढ़ा रहा है। यह शिक्षा के निजीकरण का सबसे बड़ा उदाहरण है, जबकि जेएनयू में फैकल्टी मौजूद है। 26 फरवरी को भी इन्हीं मांगों के समर्थन में मार्च निकाला गया था। लेकिन पुलिस ने 14 लोगों को गिरफ्तार कर लिया। कोर्ट ने अगले दिन जमानत तो दी, पर सशर्त, जिस वजह से उनकी रिहाई लटक गई।

9 फरवरी 2016 के बाद जेएनयू में बहुत कुछ बदल गया है। संसद पर हमले के दोषी अफज़ल गुरु को फांसी दिए जाने की उस दिन तीसरी बरसी थी। छात्रों की ओर से कश्मीर को लेकर कार्यक्रम का आयोजन था। यह कोई पहली बार नहीं था। बाद में, कुछ वीडियो क्लिप सामने आए जिनमें कथित तौर पर देश-विरोधी नारे लगाए जा रहे थे। इस पर जेएनयूएसयू के तत्कालीन अध्यक्ष कन्हैया कुमार और उमर खालिद जैसे छात्र नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। मेन स्ट्रीम टीवी चैनलों पर जेएनयू को 'टुकड़े-टुकड़े गैंग' का अड्डा कहा जाने लगा।


चार साल बाद 5 जनवरी 2020 को जेएनयू में फीस वृद्धि और नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर डंडों, रॉड और पत्थरों से लैस नकाबपोश भीड़ ने धावा बोल दिया। विद्यार्थियों और शिक्षकों के साथ दुर्व्यवहार किया गया। इंटरनेट और बिजली कनेक्शन काट दिए गए। पुलिस मूकदर्शक बनी रही। इस दौरान गायब हुए छात्र नजीब का आज तक पता नहीं चल पाया है। उमर खालिद अब भी जेल में हैं।

चाहे वह रोहित वेमुला, पायल तड़वी की सांस्थानिक हत्या हो या दर्शन सोलंकी, मुत्थु या फिर सेंथिल की मौत का मामला हो - इन सभी विद्यार्थियों को व्यवस्थागत उत्पीड़न का शिकार होना पड़ा है। उनके सपनों को कुचला गया और किसी भी कैंपस में उन्हें न्याय नहीं मिला। कोई कमिटी नहीं थी, जो उनके उत्पीड़न को रोक सके, उनकी बात को सुन सके। इसके बावजूद, जेएनयू की कुलपति का कहना है कि यूजीसी के नियमों की आवश्यकता नहीं है, हालांकि ये दिशानिर्देश सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद तैयार किए गए थे। उसी जेएनयू में आज ऐसी कोई संस्था नहीं है जहां विद्यार्थी जातिगत उत्पीड़न की शिकायत कर सकें। सवाल यह भी है कि क्या वह शिकायत करेगा तो उसे न्याय मिल पाएगा?

दानिश कहती हैं कि जेएनयू में लाइब्रेरी की डेस्क और दीवारों पर जातिगत गालियां लिखे जाने का मामला ज्यादा पुराना नहीं है। सवाल यह है कि क्या कुलपति को यह दिखता नहीं है? क्या वह रोहित वेमुला और पायल तड़वी की मां के संघर्षों का अपमान नहीं कर रही हैं, जिन्होंने अपने बच्चों की मौत के बाद यूजीसी गाइडलाइंस के लिए एक लंबा संघर्ष किया है। क्या कुलपति का बयान उनका मजाक नहीं उड़ाता है?

जातिवाद सिर्फ दीवारों पर नारे लिखने तक सीमित नहीं है बल्कि इंटरव्यू या वायवा में नॉट फाउंड सूटेबल (एनएफएस)-जैसी बातों के जरिये न केवल दलितों और आदिवासियों बल्कि ओबीसी के साथ भी भेदभाव किया जाता है। नीतीश अपना उदाहरण देते हैंः 'चुनाव के वक्त कमिटी बनाने के लिए जीबीएम (जनरल बॉडी मीटिंग) होती है। स्कूल ऑफ सोशल साइंसेस के जीबीएम में एबीवीपी के लोगों ने मुझे घेरा और एक घंटे तक गालियां दी कि तुम अहीर हो; जैसे लालू को दिखाए थे, वैसे ही दिखा देंगे; तुम एक ब्राह्मण का हाथ नहीं छुड़ा पाए न; तुम्हें 90 का दशक याद दिला देंगे; हम रणवीर सेना के लोग हैं; तुम मेरिट खराब कर रहे हो, रिजर्वेशन से आए हो।' वह कहते हैं कि संभव है, ऐसे ओबीसी बहुल गांव बहुतायत में हों, जहां दलितों पर अत्याचार होते हों, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उनके खिलाफ यूनिवर्सिटी कैंपस में अत्याचार नहीं हो रहा हो।

छात्र संघ अब रोहित एक्ट लागू करने की मांग जोरों से उठा रहा है। संघ का कहना है कि जातिवादी सोच रखने वालीं शांतिश्री पंडित जेएनयू का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं, छात्र संघ जेएनयू का प्रतिनिधित्व करता है। जेएनयू पब्लिक एजुकेशन और सोशल जस्टिस का रोल मॉडल है। छात्र संघ का कहना है कि 'हमारी लड़ाई यहां से शुरू होती है।'

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