जस्टिस अभय ओका ने निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति समिति पर उठाए सवाल, कहा- राजनीतिक वर्चस्व से मुक्त होनी चाहिए
सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति अभय ओका ने कहा कि एक ऐसी व्यवस्था और कानूनी प्रावधान बनाना बहुत जरूरी है, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति पर राजनीतिक वर्चस्व का असर न पड़े।

उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश अभय ओका ने कहा है कि निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया राजनीतिक वर्चस्व से मुक्त होनी चाहिए। उन्होंने स्वतंत्र संस्थाओं की निष्पक्षता की रक्षा के लिए मजबूत कानूनी तंत्र और ढांचे की आवश्यकता पर भी जोर दिया है।ठाणे में रविवार को आयोजित ‘वाक् स्वातंत्र्य और हम’ विषय पर व्याख्यान को संबोधित करते हुए न्यायमूर्ति ओका ने उच्च-स्तरीय संवैधानिक नियुक्तियों में जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल उठाए।
नियुक्ति पर राजनीतिक वर्चस्व का असर न पड़े
सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति अभय ओका ने कहा कि एक ऐसी व्यवस्था और कानूनी प्रावधान बनाना बहुत जरूरी है, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति पर राजनीतिक वर्चस्व का असर न पड़े। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर ज्ञानेश कुमार जैसे किसी मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उनके पद से हटा दिया जाए, तो आगे क्या होगा।
आडवाणी ने एक ‘कॉलेजियम प्रणाली’ का प्रस्ताव रखा था
न्यायमूर्ति ओका ने दावा किया, “पूर्व उपप्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी ने लगभग 14 साल पहले एक ‘कॉलेजियम प्रणाली’ का प्रस्ताव रखा था। इसमें प्रधानमंत्री, कानून मंत्री, लोकसभा और राज्यसभा में विपक्ष के नेता और भारत के प्रधान न्यायाधीश शामिल होते, ताकि चयन प्रक्रिया पूरी तरह से स्वतंत्र बनी रहे।” उन्होंने दोहराया कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र की नींव हैं।
अभिव्यक्ति की आजादी की रक्षा होनी चाहिए
न्यायमूर्ति अभय ओका ने इस बात पर जोर दिया कि अभिव्यक्ति की आजादी हर नागरिक का मौलिक अधिकार है, जिसके तहत वे अपने विचार और दृष्टिकोण जाहिर कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि किसी तर्क का जवाब तर्क से ही दिया जाना चाहिए, न कि शारीरिक बल से। न्यायमूर्ति ओका ने कहा, “हमारे देश के लोकतंत्र को बचाए रखने के लिए अभिव्यक्ति की आजादी की रक्षा होनी चाहिए, क्योंकि इसके बिना जीवन अपना सार्थक अर्थ खो देता है।”
पर्यावरण के सुनियोजित दोहन पर नाखुशी जताई
उन्होंने “पर्यावरण के सुनियोजित दोहन” पर नाखुशी भी जताई। न्यायमूर्ति ओका ने कहा, “ठाणे और मुंबई में तापमान का 38 से 40 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाना अभूतपूर्व था। पिछले एक दशक में विभिन्न परियोजनाओं के लिए जगह बनाने के मकसद से ठाणे में हजारों पेड़ काट दिए गए, जिसका खामियाजा अब नागरिकों को भुगतना पड़ रहा है।” उन्होंने नेताओं में पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता की कमी पर अफसोस जताते हुए कहा कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना धर्म के खिलाफ जाना नहीं है।
ठाणे के प्रस्तावित मेट्रो परियोजना पर उठाए सवाल
न्यायमूर्ति ओका ने प्राकृतिक जल स्रोतों में मूर्ति विसर्जन जैसी प्रथाओं का उदाहरण देते हुए कहा कि ये वैज्ञानिक जिम्मेदारी के विपरीत हैं। उन्होंने ठाणे की प्रस्तावित सर्कुलर मेट्रो परियोजना का जिक्र करते हुए कहा कि नागरिकों को यह पूछने का अधिकार है कि क्या मेट्रो कॉरिडोर पर 12,000 करोड़ रुपये खर्च करने के बजाय सड़कों को बेहतर बनाकर और ठाणे नगर परिवहन सेवा के बेड़े में विस्तार करके बहुत कम लागत में वही परिणाम हासिल नहीं किए जा सकते थे।
(पीटीआई के इनपुट के साथ)
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