कैलाश जी ने मोदी सरकार का काम कर दिया आसान, अब पोहे खाने के स्टाइल से होगी नागरिकता की पहचान!

बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने नागरिकता की पहचान को लेकर अजीब बयान दिया है। उन्होंने इंदौर में एक सभा को संबोधित करते हुए कहा कि मजदूरों के पोहा खाने के स्टाइल से मैं समझ गया कि वह बांग्लादेशी हैं।

फोटो: सोशल मीडिया
फोटो: सोशल मीडिया
user

मृणाल पाण्डे

बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने नागरिकता की पहचान को लेकर अजीब बयान दिया है। उन्होंने इंदौर में एक सभा को संबोधित करते हुए कहा कि मजदूरों के पोहा खाने के स्टाइल से मैं समझ गया कि वह बांग्लादेशी हैं।

दरअसल बाहरिया विधर्मी लोग इन दिनों कई कारणों से निशाने में हैं । खासकर बांग्लादेश से आए गैर हिंदू शरणार्थी । बीजेपी के मध्यप्रदेश के वरिष्ठ, बलिष्ठ नेता कैलश विजयवर्गीय ने हाल में कहा कि उनके मकान में निर्माण का काम कर रहे भाडे के मजदूरों को पोहे फांकते देखकर उनको यकीन हो गया है कि वे ज़रूर बांग्लादेशी होंगे । अब यह तो भगवान जाने कि इस बात का उन्होंने सत्यापन कराया कि नहीं, पर पोहे फांकनेवाले बांग्लादेशी नहीं हो सकते । ना जी ना । भोजन के सभी जानकार और शौकीनों को पता है कि बंगाली और बांग्लादेशी पोहा (यानी खास तरह के धान को रोलिंग मिल में दबा कर या ओखली में पीट कर बनाया गया चिवड़ा, जिसे कोई कोई चिडवा भी कहते हैं) नहीं खाते । उनका प्रिय नाश्ता तो है चावल को भून कर बनाये गये करारे मुरमुरे या मूड़ी। उन मुरमुरों में मूंगफली, चटनी, उबले आलू हरी मिर्च, प्याज़ तथा सरसों का तेल मिला कर बनाये अपने प्रिय व्यंजन को सारे धर्म जाति के बंगाली झालमूड़ी कहते हैं । यह व्यंजन आज भी बंगाल से बांग्लादेश तक गली गली कागज़ी ठोंगे या पत्ते के बने दोनों में खूब बिकता है ।

उधर उत्तर प्रदेश तथा बिहार में भी चावल के इसी गोलमटोल करारे स्वरूप को लैया या मुरमुरे के नाम से नमक मिर्च डाल कर या गुड में पाग कर उसके लड्डू या पट्टी बना कर मज़े मज़े से बेचा खाया जाता है। चावल से ही बननेवाले किंतु आकार में चपटे पोहे रिश्ते में इन मुरमुरों के कज़िन हैं जो दक्षिण भारत में भी अवल या अवलक्की नाम से खूब बनते और खाये हैं । बहुत सर खुजला कर भी समझ में नहीं आता कि स्वघोषित रूप से खानपान के शौकीन कैलाश जी से मुरमुरों और पोहे के बीच यह भारी गलती कैसे हुई होगी, जबकि पोहे तो खुद श्री विजयवर्गीय के गृहप्रदेश के अतिपरिचित खाद्यों में से एक हैं ।

मध्यप्रदेश, राजस्थान या महाराष्ट्र में पोहे का मतलब होता है, हल्के भिगोए गए चावलों के चिवडे का बना एक हल्का स्वादिष्ट व्यंजन जो सुबह नाश्ते में या दिन में कभी भी चाय काफी के साथ शौक से खाया जाता है। बिहार में सुगंधित लाल चावल का खास चिवडा दही में भिंगो कर खाते खिलाते हैं। अभी मकरसक्रांति में खासतौर से बिहार के सभी बड़े बड़े नेताओं को पंगत में बैठ कर अक्रॉस पार्टी लाइन इसका स्वाद लेते पाया गया। कैलाश जी को शायद पता न हो कि छतीसगढ़ (पहले मध्यप्रदेश) के राजनांद गांव और महाराष्ट्र के चंद्रनगर जिलों में तो पोहा एवं मुरमुरा की इतनी मांग है कि वहां इनके निर्माताओं के उत्पादक संघ भी मौजूद हैं।

बहरहाल चूंकि सी.ए.ए जनता के रोके नहीं रोका जा रहा, और नागरिक रजिस्टर पर भी काम जारी है, यह जनहित में बताया गया है कि भारतीय संविधान की शक्ल आगे जैसी भी बने, पोहे और मुरमुरे में बुनियादी फर्क बना रहेगा और उनका भक्षण कतई धर्म या जाति या संप्रदाय पर नहीं सीधे भूख और चटपटे खाने के आकर्षण से ही जोड़ा जायेगा। यानी मध्यप्रदेश में रामनारायण और अब्दुल्ला जो पोहे खाते हैं, खाते रहेंगे। और बंगाल के कुंडू, मुंडू, चटर्जी मुखर्जी से ले कर महाराष्ट्र का ठाकरे, पवार या ईसाई गोंज़ालवेज़ और पारसी बाटलीवाला जो सागर तट पर भेलपूरी या झालमूड़ी का आनंद लेते हैं, या हर जाति के लोग जगन्नाथ मंदिर में दंडवत कर मूड़ी का जो प्रसाद पाते हैं पाते रहेंगे। हां विजयवर्गीय जी अपने शक की बिना पर, कथित तौर से बांग्लादेशी मजदूरों के बनाए उस गृहविशेष का त्याग करेंगे या नहीं, यह बात वे ही बता सकते हैं ।

Published: 24 Jan 2020, 8:30 PM
लोकप्रिय