कैलाश मानसरोवर यात्रा: राहुल गांधी ने साझा किया कैलाश पर्वत की छाया में चलने का विनयशील अनुभव

कैलाश मानसरोवर तीर्थ यात्रा जारी है। श्रद्धालु दुर्गम पहाड़ी रास्तों से होते हुए जब कैलाश पर्वत और मानसरोवर झील के पास पहुंचते हैं तो उन्हें अलौकिक आनंद की अनुभूति होती है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी इस तीर्थ यात्रा पर हैं।

नवजीवन डेस्क

कैलाश मानसरोवर तीर्थ यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण भाग कैलाश पर्वत की परिक्रमा होता है। कैलाश पर्वत करीब 50 किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है। परिक्रमा का मार्ग 15500 से 19500 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। मानसरोवर से 45 किलोमीटर दूर तारचेन कैलास परिक्रमा का आधार शिविर है। कैलास की परिक्रमा कैलाश की सबसे निचली चोटी तारचेन से शुरू होती है और सबसे ऊंची चोटी डेशफू गोम्पा पर पूरी होती है। तारचेन से यात्री यमद्वार पहुंचते हैं। ब्रह्मपुत्र नदी को पार करके कठिन रास्ते से होते हुये यात्री डेरापुफ पहुंचते हैं। जहां ठीक सामने कैलास के दर्शन होते हैं।

कैलाश मानसरोवर तीर्थ यात्रा पर गए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कैलाश पर्वत की तस्वीर पोस्ट करते हुए लिखा है कि विशाल कैलाश पर्वत की छाया में चलने का अनुभव अद्धितीय है।

इस चोटी को 'हिमरत्न' भी कहा जाता है। इस परिक्रमा के बाद श्रद्धालु सबसे कठिन और दिल साढ़े 19 हज़ार फ़ुट खड़ी ऊंचाई पर स्थित ड्रोल्मा जाते हैं। यहीं शिव और पार्वती की पूजा-अर्चना करके धर्म पताका फहराई जाती है। इससे पहले कांग्रेस अध्यक्ष ने राक्षसताल की तस्वीर पोस्ट करते हुए लिखा कि इसकी सुंदरता अद्भुत है।

राक्षस ताल लगभग 225 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र, 84 किलोमीटर परिधि तथा 150 फुट गहराई में फैला है। प्रचलित है कि राक्षसों के राजा रावण ने यहां पर शिव की आराधना की थी। इसलिए इसे राक्षस ताल या रावणहृद भी कहते हैं। एक छोटी नदी गंगा-चू, मानसरोवर और राक्षस ताल झीलों को जोडती है।

मानसरोवर झील लगभग 320 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैली हुई है। इसके उत्तर में कैलाश पर्वत तथा पश्चिम में रक्षातल झील है। पुराणों के अनुसार विश्व में सर्वाधिक समुद्रतल से 17 हज़ार फुट की उंचाई पर स्थित 120 किलोमीटर की परिधि तथा 300 फुट गहरे मीठे पानी की मानसरोवर झील की उत्पत्ति भगीरथ की तपस्या से भगवान शिव के प्रसन्न होने पर हुई थी। ऐसी अद्भुत प्राकृतिक झील इतनी ऊंचाई पर किसी भी देश में नहीं है। पुराणों के अनुसार शंकर भगवान द्वारा प्रकट किये गये जल के वेग से जो झील बनी, कालांतर में उसी का नाम 'मानसरोवर' हुआ। ऐसा माना जाता है कि महाराज मांधाता ने मानसरोवर झील की खोज की और कई वर्षों तक इसके किनारे तपस्या की थी, जो कि इन पर्वतों की तलहटी में स्थित है।

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