कैराना उपचुनाव: संयुक्त विपक्ष से पिछड़ने के बाद बीजेपी हताश, ध्रुवीकरण की कोशिशें भी नहीं हो रही कामयाब 

2014 में यहां 73 फीसदी वोटिंग हुई थी। इसमें से 50.54 फीसदी वोटों के साथ बीजेपी के हुकुम सिंह ने जीत हासिल की थी। लेकिन 2014 में वोटों का बिखराव हुआ था क्योंकि सभी दलों ने अपने उम्मीदवार मैदान में उतारे थे। इस बार मुकाबला वन-टू-वन है। एक तरफ संयुक्त विपक्ष के समर्थक हैं तो दूसरी तरफ बीजेपी के।

फोटो: सोशल मीडिया
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आस मोहम्मद कैफ

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उत्तर प्रदेश की कैराना लोकसभा सीट पर उपचुनाव की तारीख नजदीक आने के साथ ही, नित नए समीकरण, संयोग और मुद्दे सामने आ रहे हैं। इस दौरान संयुक्त विपक्ष आपसी गिले शिकवे दूर कर चुका है, तो बीजेपी अपने लिए जीत का राहें तलाश रही है, और उसकी तलाश सिर्फ एक ही जगह जाकर खत्म होती है, वह है वोटरों का सांप्रदायिक ध्रुवीकरण। लेकिन कैराना उपचुनाव इस मायने में हमेशा याद किया जाएगा कि यहां सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का फायदा बीजेपी को नहीं बल्कि विपक्ष को होगा, क्योंकि इस चुनाव में सभी दलों ने मिलकर एक ही उम्मीदवार मैदान में उतारा है।

सबसे पहले बात करते हैं संयुक्त विपक्ष के आपसी मतभेदों की। चर्चा थी कि संयुक्त विपक्ष की उम्मीदवार तबस्सुम हसन से कांग्रेस नेता इमरान मसूद नाराज़ हैं। लेकिन समाजवादी पार्टी के चुनाव प्रभारी बलराम यादव ने मध्यस्थता कर गिले शिकवे दूर करा दिए। बलराम यादव अपने साथ तबस्सुम हसन के पुत्र नाहिद हसन को इमरान मसूद के घर लेकर गए और दोनों ने एक-दूसरे से गले मिलकर गिले-शिकवे दूर कर लिए।

इसके बाद मुद्दा आता है, मतदान प्रतिशत का। कैराना में करीब 16 लाख वोटर हैं। इनमें से 5 लाख के करीब मुस्लिम मतदाता है। 2014 में यहां 73 फीसदी वोटिंग हुई थी। इसमें से 50.54 फीसदी वोटों के साथ बीजेपी के हुकुम सिंह ने जीत हासिल की थी। लेकिन 2014 में वोटों का बिखराव हुआ था क्योंकि सभी दलों ने अपने उम्मीदवार मैदान में उतारे थे। इस बार मुकाबला वन-टू-वन है। एक तरफ संयुक्त विपक्ष के समर्थक हैं तो दूसरी तरफ बीजेपी के। मुसलमानों, गूर्जरों, दलितों और कुछ हद तक कश्यपों को संयुक्त विपक्ष की तरफ माना जा रहा है। साथ ही जाटों के भी बीजेपी से नाराज होने की चर्चा है। दूसरी तरफ प्रजापति, सैनी, पाल जैसे अन्य पिछड़े हिन्दु मतों का झुकाव बीजेपी की ओर है।

कैराना उपचुनाव: संयुक्त विपक्ष से पिछड़ने के बाद बीजेपी हताश, ध्रुवीकरण की कोशिशें भी नहीं हो रही कामयाब 

ऐसे हालात में बीजेपी को हार का खतरा नजर ने लगा है और उसने अब अपनी सारी ताकत जाटों को मनाने में लगा दी है। साथ ही इलाके में हुई सांप्रदायिक और जातीय हिंसा के बहाने ध्रुवीकरण की कोशिशें भी शुरु हो गई हैं। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक इस बार के चुनाव में अगर वोटों का ध्रुवीकरण हुआ तो इससे बीजेपी को नुकसान ही होगा, क्योंकि सामने सिर्फ एक ही उम्मीदवार है।

लेकिन संयुक्त विपक्ष भी तपती गर्मी और रमज़ान में मतदान होने को लेकर चिंतित है। उसे लगता है कि गर्मी और रोजे की वजह से मुस्लिम मतदाताओं के वोटिंग प्रतिशत में गिरावट आ सकती है, और इसका फायदा बीजेपी को मिल सकता है। इसके लिए बाकायदा मस्जिदों में मुसलमानों से वोटिंग में हिस्सा लेने की अपील की जा रही है।

इस दौरान कैराना के वोटरों को प्रभावित करने के लिए इस इलाके से सटे बागपत में मतदान से ठीक एक दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली रखी गई है। बहाना तो ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेसवे के उद्घाटन का है, लेकिन एक तीर से दो निशाने लगाते हुए बीजेपी इस मौके को चुनाव में भुनाने की जुगत में है। विपक्ष ने इस मामले में चुनाव आयोग से शिकायक भी की है, ताकि ऐन चुनाव से एक दिन पहले होने वाली इस रैली को रोका जा सके।

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