करतारपुर कॉरिडोर उम्मीद की किरण ही नहीं, नए रिश्तों की गर्माहट से चमकता सूर्य भी है

करतारपुर कॉरिडोर खुलने से दोनों तरफ एक नई उम्मीद बंधी है। उम्मीद नए रिश्तों की, नए नातों। और ये उम्मीदें सिर्फ किरण नहीं बल्कि रिश्तों की गर्माहट से दमकते सूर्य की तरह हैं। भारत-पाक सीमा से लौटकर आए अमरीक की यह खास रिपोर्ट:

फोटो : सोशल मीडिया
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अमरीक

करतारपुर कॉरिडोर वह काम कर रहा है जो भारत और पाकिस्तान की हुकूमतें तमाम कोशिशों के बावजूद नहीं कर पाईं। 9 नवंबर के बाद भारतीय पंजाब से श्रद्धालु लगातार जत्थों के रूप में पाकिस्तान स्थित श्रीकरतारपुर साहिब गुरुद्वारे दर्शनार्थ जा रहे हैं और बेहद सुखद अनुभवों के साथ अभिभूत होकर आ रहे हैं। लौटने वाले हर आदमी की जुबान पर यही बात है कि पाकिस्तान और हिंदुस्तान के आम लोगों में कतई कोई फर्क नहीं- न भाषा, न बोली, न अपनेपन और न मेहमाननवाजी में। भारत-पाक सीमा (डेरा बाबा नानक) पर नवजीवन को बेशुमार ऐसे लोग मिले जिनका कहना था कि उन्हें एक पल के लिए भी नहीं लगा कि वे किसी पराये या ‘शाश्वत दुश्मन’ करार दे दिए गए देश की धरती पर हैं।

कॉरिडोर शुरू होने के दूसरे दिन दर्शन करके आईं चंडीगढ़ की सुखमनप्रीत कौर कहती हैंः मीडिया को पाकिस्तान का सुखद और नया चेहरा देखना हो तो एक बार करतारपुर जरूर जाना चाहिए। वहां एकदम अलग अनुभव होगा। जाने से लेकर वापसी तक कितने ही पाकिस्तानियों से मुलाकात होगी। क्षण भर के लिए भी नहीं लगेगा कि आप किसी ‘खूंखार’ और खतरनाक बताए जा रहे मुल्क की धरती पर हैं। उनके पति डॉ. शरणदीप सिंह बाजवा कहते हैंः पाकिस्तान को लेकर बहुत भ्रांतियां थीं, वहां जाकर काफी कुछ टूट गईं। राजनीति की पैंतरेबाजियां और सीमाओं के तनाव अपनी जगह हैं लेकिन पाकिस्तान का यह कदम अपनी जगह है कि सिख श्रद्धालु इतनी सहजता और तमाम सुविधाओं के साथ अपने परमपिता के खुले दीदार कर रहे हैं।

1947 के हौलनाक बंटवारे के जख्मों पर करतारपुर कॉरिडोर के जरिये मरहम लगाने की कहानियां भी यहां मिल रही हैं और उस झूठ का पर्दाफाश होता भी दिखाई दे रहा है कि हर भारतीय के लिए पाकिस्तान का हर शख्स गद्दार है तथा आम भारतीय के लिए भी पाकिस्तानी ऐसी ही राय रखते हैं। पहले पंजाबी, फिर हिंदी और उसके बाद उर्दू में बात की जाती है। महसूस नहीं होता कि आप हिंदुस्तान में हैं या पाकिस्तान में। अमृतसर के मनोहर सिंह कहते हैंः काश, यह आलम सदा कायम रहे, सदियों तक कोई झगड़ा फसाद हो ही ना!


भारत-पाक सीमा के दौरे के दौरान नवजीवन ने पाया कि इन दिनों इस बॉरर्डर पर महाकुंभ मेले सरीखा माहौल है। जितने लोगों को प्रतिदिन रजिस्ट्रेशन करके पाकिस्तान जाने की अनुमति मिली हुई है, उससे कहीं बड़ी तादाद में लोग डेरा बाबा नानक पहुंचकर पड़ाव डाल रहे हैं। आए दिन हजारों की संख्या में पंजाब और देश के अन्य हिस्सों से हजारों लोग डेरा बाबा नानक और बटाला आ रहे हैं। ज्यादातर के पास पासपोर्ट तो छोड़िए, अपरिहार्य पहचान पत्र तक नहीं हैं। पाकिस्तान जाकर श्रीगुरुनानक देव की सरजमीं को सजदा करने का जुनून और ख्वाब जरूर साथ है।

सहारनपुर की प्रीतम कौर सपरिवार, करतारपुर साहिब के दीदार की अभिलाषा के साथ डेरा बाबा नानक में रुकी हुई हैं। वह बताती हैं कि उन्होंने सुना था कि बगैर पासपोर्ट वहां जाया जा सकता है लेकिन यहां आकर पता चला कि जरूरी कागजात चाहिए जो उनके पास हैं नहीं। वह अपने परिवार के साथ इस आस से यहां टिकी हैं कि संभव है, दोनों देशों की सरकारें ऐसी कोई घोषणा आने वाले दिनों में कर दें कि बगैर औपचारिकता के करतारपुर जाया जा सकता है।

ऐसे बहुतेरे लोग हैं। इनमें से कई वहां लगी दूरबीनों के जरिये करतारपुर गुरुद्वारे के दर्शन कर रहे हैं। कई लोग ऐसे भी हैं, विभाजन से पहले जिनके पूर्वज पाकिस्तान में रहते थे और वे एक नजर उनकी जन्मभूमि देखना चाहते हैं। मानसा के सुरजीत सिंह कहते हैंः यह क्या कम है कि हम दूर से ही सही, पुरखों की जमीन देख रहे हैं। कॉरिडोर बनने से पहले कोई सीमा के पास भी नहीं फटकने देता था। मैं कई बार यहां आया हूं। हर बार नाकाम लौटा। अब ऐसा संभव हो रहा है तो कम नहीं।

जालंधर के सोहनलाल पाहवा का खानदान आजादी से पहले करतारपुर के पास काला घोड़ा में रहता था। वह इसी मकसद से करतारपुर गए कि पुरखों की सरजमीं को भी दूर से निहार आएं। वह कहते हैं कि विभाजन के बाद अन्य शरणार्थियों के साथ-साथ उनमें भी पाकिस्तान के प्रति नफरत भरा मलाल था जो कम हो चला है।

बाबा बकाला में श्रद्धालुओं के लिए विशेष रूप से बनाए गए एक अतिथि गृह में मलेरकोटला से आए बशीर अहमद के परिवार से मुलाकात होती है। श्रीकरतारपुर साहिब के लिए उनका रजिस्ट्रेशन हो चुका है। वह बताते हैं कि उनका परिवार मरदाना को अपना मुर्शिद मानता है। इसीलिए वे वहां जा रहे हैं। फिर करतारपुर साहिब में गुरु नानक की मजार भी है। उसका सजदा भी करना है। बशीर के समधी नजाकत हुसैन का परिवार भी इसी मकसद से उनके साथ है। तो कई मुस्लिम भी श्रीकरतारपुर साहिब जा रहे हैं। इसी परिवार के बुजुर्ग आजी अली कहते हैंः हमारे पाकिस्तान जाने पर किसी को अचरज नहीं होना चाहिए। गुरु नानक देव मुसलमानों के बहुत बड़े पीर का दर्जा रखते हैं। पाकिस्तान में पीर के तौर पर उनका बड़ा मुकाम है और लाखों मुस्लिम उनकी सदा करते हैं।


करतारपुर जाने वाले प्रोफेसर मनजीत सिंह के मुताबिक, यह ऐतिहासिक घटना है। ऐसे में यह सवाल मौजूं है कि क्या इस कॉरिडोर के जरिये भारत-पाक संबंधों के नए रास्ते नहीं खुल सकते? इस कॉरिडोर पर विशाल उत्सव-जैसे माहौल की खबरें सूबे के कोने-कोने तक फैली हुईं हैं। इनसे भारत-पाकिस्तान के बीच व्यापार करने वाले व्यापारियों और उद्योगपतियों को उम्मीद बंधी है कि यह घटनाक्रम सब कुछ यथाशीघ्र सामान्य कर देगा और उनके बंद व्यापार को संजीवनी मिलेगी।

दोनों देशों के बीच बिगड़े संबंधों ने आर्थिक रूप से उनकी कमर तोड़ दी है। उनके कर्मचारी भी भुखमरी के कगार पर हैं। अमृतसर मर्चेंट के मालिक दर्शन लाल बजाज के अनुसार, जबसे दोनों देशों में व्यापार बंद हुआ है, अरबों का नुकसान दोनों ओर हो रहा है। करतारपुर कॉरिडोर की सफलता ने उम्मीद जताई है कि हमारे भी दिन जल्दी बदलेंगे। सरकारें चाहें तो क्या नहीं हो सकता। पंजाब के तमाम बड़े शहरों के कारोबारियों की पाकिस्तान से बड़े पैमाने पर व्यापारिक सांझ रही है जिस पर बिगड़े माहौल के चलते अनिश्चितता की चादर बिछी हुई है। यह उम्मीद की बड़ी किरण है। बल्कि सूरज की मानिंद!

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