केरल: सुदूर दक्षिण की बदली हवा का सबब क्या है?

केरल के सामाजिक विकास में वामपंथ की भूमिका निस्संदेह बड़ी रही है, लेकिन महज विरासत के सहारे कब तक जिया जा सकता है। यूडीएफ के पास भी जीत पर इतराने का पूरा कारण है, लेकिन इस जीत से लोगों की जैसी उम्मीदें जुड़ी हैं।

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के ए शाजी

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4 मई को केरल ने जो फैसला सुनाया, वह महज बदलाव का वोट नहीं था। न ही यह कोरी सत्ता-विरोधी भावना की अभिव्यक्ति थी, जैसा कई टिप्पणीकारों की बातों ने आपको सोचने पर मजबूर किया होगा। यह बीजेपी की विभाजनकारी राजनीति का भी एक तरह से नकार था, जिसने सांप्रदायिक आधार पर वोट बांटने की कोशिश में कोई कसर नहीं छोड़ी। हालांकि पार्टी फिर भी 11.4 प्रतिशत वोट पाने में कामयाब रही, जो संकेत है कि बुराई की जड़ें शायद यहां भी जमने लगी हैं। उसकी यह सफलता तीन सीटों से आगे नहीं बढ़ी, लेकिन केरलवासियों के लिए यह तीन सीटें भी बहुत ज्यादा हैं।

कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) ने 140 सदस्यों वाली विधानसभा में 102 सीटों पर निर्णायक जीत हासिल की, जबकि सीपीएम के नेतृत्व वाले लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) को भारी नुकसान उठाना पड़ा। यह गिरावट काफी हद तक निवर्तमान मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के काम करने के तौर-तरीके पर फैसला भी है। उनकी व्यक्ति-पूजा वाली छवि, अपने हाथों में सत्ता का अत्यधिक केन्द्रीकरण और सत्ता में बने रहने के लिए बीजेपी से भी तालमेल बिठाने की कोशिशें!

अनायास नहीं था कि विजयन को ‘वाम गढ़’ माने जाने वाले धर्मदम में बढ़त बनाने के लिए वोटों की गिनती के सात दौर तक इंतजार करना पड़ा, और उनकी जीत का अंतिम अंतर 2021 वाले 50,000 से ज्यादा वोटों के मुकाबले काफी कम रहा। उनके तेरह कैबिनेट मंत्री चुनाव हार गए।

केरल में गुटबाजी कांग्रेस के लिए लंबे समय से बड़ी मुसीबत बनी हुई थी, जो गाहे-बगाहे खुलकर भी सामने आ जाती थी। निजी महत्वाकांक्षाएं तो नतीजों के बाद भी उभरीं, लेकिन यह भी कि चुनावों से पहले पार्टी एकजुट रही। हमेशा से मुश्किल रहा उम्मीदवारों का चयन बेहद आसानी से निपट गया। न कोई सार्वजनिक कहा-सुनी उभरी, न विरोधी गुट की सूचियां लहराईं, और न आखिरी समय में कोई बगावत दिखी।

यह संयोग की एकता नहीं थी; इसे बड़ी सावधानी से बनाए रखा गया। पार्टी महासचिव (संगठन) के.सी. वेणुगोपाल और रमेश चेन्निथला ने असंतोष संभाले रखने में अहम भूमिका निभाई। दावेदारों से संवाद बनाकर हर संभव कोशिश की, कि शिकायतें पार्टी के भीतर ही सुलझ जाएं। उनका जोर एकदम स्पष्ट रहा: ‘जीतने की क्षमता को गुटों के दावों पर तरजीह दी जाएगी’, और यह संदेश सभी तक पहुंचा।

यही दुर्लभ संगठनिक अनुशासन चुनावी अनुशासन में तब्दील हुआ। यूडीएफ एक सुव्यवस्थित राजनीतिक इकाई की तरह नजर आया, न कि किसी एक बैनर तले जुटा कोई बेतरतीब समूह। इस एकता का ही असर था कि गठबंधन अपना ध्यान खुद पर केन्द्रित करने के बजाय मतदाताओं पर केन्द्रित कर सका , जो ऐसे मुकाबले में बेहद अहम होता है और जिसके बेहद कड़ा होने की उम्मीद पहले से थी।

अभियान के स्तर पर देखें तो पिछली विधानसभा में विपक्ष के नेता रहे वी.डी. सतीशन नई रणनीति की मुख्य आवाज थे। उनका संदेश नपा-तुला, सुसंगत और शासन-प्रशासन से जुड़े मुद्दों पर आधारित था। नतीजों के बाद उन्होंने कहा, “यह जनादेश लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली और जवाबदेही बहाल करने के लिए है।”


कांग्रेस ने 2016 में 22 और 2021 में 21 से बढ़कर इस बार 63 तक पहुंचकर न सिर्फ अपनी सीटें बढ़ाईं, बल्कि वोट शेयर भी (2021 के 25.1 प्रतिशत से बढ़कर 28.8 प्रतिशत) बढ़ा है। इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) जैसे सहयोगी दलों ने भी अपने मजबूत गढ़ बरकरार रखे। मध्य केरल में कई निर्वाचन क्षेत्र यूडीएफ के पाले में लौटे। पारंपरिक रूप से वामपंथियों का गढ़ रहे मालाबार में जीत का अंतर काफी कम रहा  और कई सीटों पर उलटफेर हुआ। आर्थिक चिंताओं और शासन-संबंधी मसलों के चलते, शहरी और अर्ध-शहरी निर्वाचन क्षेत्रों में भी उलटफेर दिखा।

सबसे अहम बात कि मुस्लिम और ईसाई वोटर यूडीएफ के पीछे एकजुट दिखे; यानी उसके वादों पर ज्यादा भरोसा किया। आईयूएमएल के राष्ट्रीय महासचिव पी.के. कुन्हालीकुट्टी बोले ‘बदलाव चुनाव नतीजों के लिए बहुत जरूरी था’। उन्होंने कहा, “लोग ऐसी सरकार चाहते थे जो विविधता का सम्मान करे और उनकी बात सुने। यूडीएफ वह भरोसा फिर से बनाने में सफल रहा।”

मालाबार में आईयूएमएल के लगातार अच्छे प्रदर्शन ने यूडीएफ की जीत की जमीन तैयार कर दी। भाजपा की तरफ से चर्च के कुछ वर्गों तक पहुंच बनाने की कोशिश, जिसका मकसद बने-बनाए सामाजिक समीकरणों को बिगाड़ना था, उसका वोटों पर कोई असर नहीं पड़ा।

वामपंथ का बिखराव

यूडीएफ को वामपंथी तंत्र से मतदाताओं की नाराजगी का भी लाभ मिला। सीपीएम कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच स्थानीय असंतोष ने एलडीएफ को संगठनात्मक रूप से और कमजोर किया। लेकिन एलडीएफ की हार को, उसके शासन-प्रशासन के स्वरूप की पड़ताल से ही समझा जा सकता है।

पिनाराई विजयन के नेतृत्व में, सरकार ने दृढ़ता और प्रशासनिक नियंत्रण का प्रदर्शन किया। शुरुआती दिनों में, इसे ताकत और कार्यकुशलता के रूप में देखा गया; लेकिन वक्त के साथ यह कुछ और ही लगने लगा- यानी सत्ता का केन्द्रीकरण और फैसले लेने की प्रक्रिया का एक जगह सिमटना। आंतरिक मतभेद या असहमति के अवसर कम हुए। वामपंथी खोमे के भीतरी आलोचकों में ही उस अहंकारी नेतृत्व की चर्चा होने लगी, जो विमर्श को हतोत्साहित करता था।

केरल में वामपंथ ने ऐतिहासिक रूप से सामूहिक नेतृत्व और वैचारिक जुड़ाव को अपना मूल सिद्धांत बनाया था। लेकिन विजयन ने राजनीतिक संस्कृति ऐसी बदली कि आम सहमति से शासन के बजाय, आदेशों के जरिये शासन की रीति चल पड़ी। एक कैडर-आधारित आंदोलन के लिए, यह परिवर्तन बेहद आमूलचूल था। 

एलडीएफ का प्रचार ‘कल्याण और बुनियादी ढांचा क्षेत्र में पिछली उपलब्धियों’ पर कुछ ज्यादा ही निर्भर रहा। यह उपलब्धियां निस्संदेह अहम हैं, लेकिन केरल में इन्हें कब तक भुनाते; यहां के मतदाता, हिन्दी भाषी राज्यों की तुलना में, बेहतर बुनियादी मानव विकास संकेतकों के आदी हैं। एलडीएफ का चुनाव प्रचार बेरोजगारी, बढ़ती महंगाई जैसी चिंताओं के मामले में कमजोर साबित हुआ। सीपीआई के प्रदेश सचिव बिनॉय विश्वम आत्म-मंथन की जरूरत स्वीकार करते हुए कहते हैं: “पड़ताल करनी होगी कि हम लोगों से जुड़ने में कहां फेल हुए।”


सिल्वरलाइन प्रोजेक्ट (के-रेल नाम से चर्चित), एक प्रस्तावित 530 किमी लंबी सेमी-हाई-स्पीड रेलवे लाइन, जो राज्य की राजधानी तिरुवनंतपुरम को दक्षिण में और कासरगोड को उत्तर में जोड़ती है, चुनाव के दौरान एक और बड़ा मुद्दा बन गया। एलडीएफ ने इसे भले ही एक बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट के तौर पर पेश किया, लेकिन इसके कारण हुए विस्थापन, इसकी आर्थिक व्यवहार्यता और पर्यावरण पर पड़ने वाले असर को लेकर काफी चिंताएं थीं। कई जिलों में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए और सरकार ने जैसा रुख अपनाया, माना गया कि उसे परवाह ही नहीं है।

यूडीएफ इस बहस को अपने फायदे के हिसाब से मोड़ने में कामयाब रहा। उसने ऐसे विकास की वकालत की जो टिकाऊ हो और लोगों पर जबरदस्ती थोपा न जाए। यह बात किसानों से लेकर मध्यमवर्गीय परिवारों, मतदाताओं के एक बड़े तबके को पसंद आई। विरोध प्रदर्शनों के दौरान- चाहे वे सिल्वरलाइन जैसी बड़ी परियोजनाओं को लेकर हों या स्थानीय मुद्दों पर, पुलिसिया कार्रवाई और सरकार द्वारा उसे बिना सोचे-समझे सही ठहराने की प्रवृत्ति एक असहिष्णु राज्य प्रशासन की धारणा को मजबूती देने वाली साबित हुई।

चुनाव पूर्व ही जनता का बदलता मिजाज भांप चुके एलडीएफ ने जोरदार प्रचार अभियान चलाकर मतदाताओं की संभावित नाराजगी टालने की कोशिश तो की, लेकिन यह जोरदार अभियान भी सरकारी दावों और रोजमर्रा की असलियत के बीच की खाई और बढ़ाने वाला ही साबित हुआ।

केरल के सामाजिक विकास में वामपंथ की भूमिका निस्संदेह बड़ी रही है, लेकिन यह भी सच है कि उसके पास अपने पुनरुद्धार का कोई सीधा रोडमैप नहीं है; तो विरासत के सहारे आखिर कब तक जिया जा सकता है। यूडीएफ  के पास अपनी जीत पर इतराने का पूरा कारण है, लेकिन इस जनादेश के साथ लोगों की उम्मीदें भी बहुत ज्यादा जुड़ी हुई हैं, और केवल सुशासन ही उनकी राजनीतिक पूंजी में इजाफा कर सकता है।

केरल के इस फैसले की अहमियत राज्य की सीमाओं से कहीं आगे तक है। इसमें बेहद मुश्किल दौर से गुजर रहे विपक्ष के लिए कई सबक हैं। यूडीएफ का चुनाव प्रचार एकजुट, अनुशासित और अंदरूनी तौर पर सुसंगत था; अगुवाई करने वाले लोगों का आपसी तालमेल शानदार और संदेश भी स्पष्ट था। आपसी मतभेद सधे हुए तरीके से सुलझाए गए। हर नेता का सुर एक ही रहा और चुनाव प्रचार लक्ष्य केन्द्रित। जब आप ऐसे हालात में लड़ रहे हों, जहां पीछे हटने का कोई रास्ता न हो, तो यह ‘सभी’ बातें बेहद जरूरी भी तो हो जाती हैं।

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