खट्टर सरकार की 'CM विंडो' चेहरा बचाने का जरिया बनी! विभागों के खिलाफ 6 साल में 15 लाख शिकायतें, लेकिन दोषी महज 937

सरकार बड़ी होशियारी से यह बात भी छिपा गई है कि दोषी पाए जाने वाले अधिकारी या कर्मचारी किस स्‍तर के हैं। दोषी पाए गए लोगों के खिलाफ क्‍या एक्‍शन लिया गया है। सरकार ने सिर्फ यह कह कर अपना पल्‍ला छुड़ा लिया है कि संबंधित अधिनियम, नियम और सेवा नियम में दिए गए प्रावधान के अनुसार कार्रवाई की गई है।

फोटो: सोशल मीडिया
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धीरेंद्र अवस्थी

हरियाणा में बीजेपी की मनोहर लाल सरकार की बहुप्रचारित ‘सीएम विंडो’ क्‍या शिकायतों के निवारण की जगह सरकार का चेहरा बचाने का जरिया बन गई है? दोषी पाए गए अधिकारियों या कर्मियों के आंकड़े तो कम से कम इसी बात की तस्‍दीक कर रहे हैं। साल 2014 से 2021 तक तकरीबन छह वर्ष में प्रदेश में चंडीगढ़ मुख्‍यालय सहित 22 जिलों से सीएम विंडो पर मिली आठ लाख से अधिक शिकायतें और सरकार के 56 विभागों से मिली करीब सात लाख शिकायतों में महज 937 अधिकारियों या कर्मचारियों को ही दोषी पाया जाना गंभीर सवाल खड़े करता है। इन पर भी एक्‍शन के नाम पर क्‍या किया गया यह सवाल अनुत्‍तरित है। वह भी तब जब सरकार के ही शब्‍दों में तकरीबन 36 हजार शिकायतें उच्‍च प्राथमिकता वाली बताई गई हैं।

हरियाणा सरकार द्वारा वर्ष 2014 में मुख्‍यमंत्री मनोहर लाल से सीधे ऑनलाइन शिकायत दर्ज कर समाधान की इच्‍छा रखने वालों के लिए आरंभ की गई ‘सीएम विंडो’ के आंकड़े संतुष्टि से ज्‍यादा सवाल खड़े करते हैं वह भी गंभीर प्रकृति के। राज्‍य सरकार के 56 विभागों और प्रदेश मुख्‍यालय और 22 जिलों के करीब छह साल और दो महीने के आंकड़े परत-दर-परत खंगालने के बाद सवाल कम होने की जगह बढ़ते जाते हैं। जिलावार हम शुरू करें तो 25 दिसंबर 2014 से 28 फरवरी 2021 तक चंडीगढ़ मुख्‍यालय और प्रदेश के 22 जिलों में कुल 8,12,994 शिकायतें सीएम विंडो पर दर्ज की गई हैं, जिसमें सबसे अधिक शिकायतें वर्ष 2018 में 1,54,502 मिली हैं।


वहीं, विभागवार देखें तो इसी अवधि के दौरान राज्‍य सरकार के 56 विभागों में 6,96,226 शिकायतें मिली हैं। यहां भी वर्ष 2018 में सर्वाधिक 134810 शिकायतें दर्ज की गई हैं। मतलब सरकार को 15 लाख से अधिक शिकायतें करीब छह साल और दो महीने की अवधि में सीएम विंडो के जरिये मिली हैं। इसमें भी इसी अवधि के दौरान मिली 35,941 शिकायतें उच्‍च प्राथमिकता वाली बताई गई हैं। सर्वाधिक शिकायतों वाला विभाग पुलिस का है। इसमें 2014 के एक हफ्ते में 722, 2015 में 29051, 2016 में 26987, 2017 में 39371, 2018 में 42605, 2019 में 39697, 2020 में 13039 और 2021 के दो महीने में 4153 कंप्‍लेंट दर्ज की गई हैं। इस तरह करीब छह साल में पुलिस विभाग में 1,95,625 शिकायतें दर्ज की गई हैं। दूसरा सर्वाधिक शिकायतों वाला विभाग ग्रामीण विकास एवं पंचायत है। यहां वर्ष 2014 के एक हफ्ते में 492, 2015 में 17429, 2016 में 13272, 2017 में 18123, 2018 में 16678, 2019 में 12581, 2020 में 4974 और 2021 के दो महीने में 1495 शिकायतें दर्ज की गई हैं। सब मिलाकर करीब छह वर्ष में इस विभाग में 85,044 शिकायतें मिली हैं। अब इससे आगे शुरू होती है असली कहानी। सर्वाधिक शिकायतों वाले पुलिस विभाग में तकरीबन छह साल में मिली दो लाख शिकायतों में महज 20 लोग दोषी पाए गए हैं। उसमें भी यमुनानगर में 2017 में महज एक व्‍यक्ति दोषी पाया जाता है। मतलब करीब पांच वर्षों के दौरान 2014, 15, 16, 18, 19, 20 और 2021 में एक भी व्‍यक्ति को किसी भी मामले में दोषी नहीं पाया गया है। यही कहानी हर जिले की है।

फरीदाबाद में महज 2016 में दो लोग दोषी पाए जाते हैं, जबकि करनाल में 2019 में सिर्फ एक व्‍यक्ति, सोनीपत में तीन वर्ष में सात लोग, भिवानी में 2018 में महज दो लोग, पानीपत में 2020 में एक व्‍यक्ति, हिसार में चार वर्षों में चार व्‍यक्ति और रेवाड़ी में महज 2017 में दो लोगों को दोषी पाया जाता है। सरकार की यह उपलब्धि सिर्फ आठ जिलों की है। मतलब छह साल में 22 में से 14 जिलों में पुलिस विभाग का एक भी व्‍यक्ति किसी भी मामले में दोषी नहीं पाया गया है। क्‍या राज्‍य का पुलिस सिस्‍टम इतना आदर्श है? फिर तो सरकार को इसके लिए तमगा मिल जाना चाहिए था। दूसरे सर्वाधिक शिकायतों वाले विभाग ग्रामीण विकास एवं पंचायत में भी तकरीबन छह वर्ष की अवधि के दौरान सिर्फ 16 जिलों में 228 लोग सरकार को दोषी मिले। छह जिलों में यहां भी किसी भी मामले में एक भी दोषी नहीं पाया गया। यह वह विभाग हैं, जहां भ्रष्‍टाचार के चर्चे आम हैं। सरकार के आंकड़ों की जितनी पर्तें खोलते जाओ उतनी ही हैरानी बढ़ती जाती है। सरकार के नगर एवं ग्राम आयोजना (हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण) विभाग में सिर्फ नूंह, पंचकूला और पानीपत में छह वर्ष में सिर्फ चार लोग दोषी पाए गए हैं। बहुप्रचारित नवीन एवं नवीकरणीय उर्जा विभाग में छह साल में सिर्फ पानीपत में एक व्‍यक्ति दोषी मिला है। देश में सर्वाधिक बेरोजगारी (सीएमआईई के मुताबिक करीब 28 फीसदी) वाले प्रदेश के रोजगार विभाग में छह साल में सिर्फ रेवाड़ी और महेंद्रगढ़ में दो लोगों को दोषी पाया गया है। तकनीकी शिक्षा में तीन जिलों झज्‍जर, भिवानी और पलवल में सिर्फ तीन लोगों को और सिंचाई विभाग में दो जिलों हिसार और रोहतक में महज दो लोगों को दोषी पाया गया है। केंद्र की मोदी सरकार के पसंदीदा विभाग कौशल विकास और औद्योगिक प्रशिक्षण में पांच जिलों सोनीपत, जींद, हिसार, फतेहाबाद और भिवानी में छह लोगों को दोषी पाया गया है। हर विभाग की यही कहानी है।


राज्‍य सरकार का एक भी विभाग ऐसा नहीं है, जिसमें छह वर्ष की इतनी लंबी अवधि में भी प्रदेश के सभी जिलों में कोई दोष पाया गया हो। क्‍या सरकार की यह कहानी किसी के भी गले उतरती है? सरकार बड़ी होशियारी से यह बात भी छिपा गई है कि दोषी पाए जाने वाले अधिकारी या कर्मचारी किस स्‍तर के हैं। दोषी पाए गए लोगों के खिलाफ क्‍या एक्‍शन लिया गया है। सरकार ने सिर्फ यह कह कर अपना पल्‍ला छुड़ा लिया है कि संबंधित अधिनियम, नियम और सेवा नियम में दिए गए प्रावधान के अनुसार सक्षम अधिकारी की ओर से कार्यवाही की गई है। राज्‍य सरकार के 56 विभागों और प्रदेश मुख्‍यालय सहित 22 जिलों को मिलाकर मिली तकरीबन 15 लाख शिकायतों में से भ्रष्‍टाचार से जुड़ी कितनी शिकायतें थीं, यह बात भी सरकार ने नहीं बताई है। हां, उच्‍च प्राथमिकता वाली बताई गई तकरीबन 36 हजार शिकायतों को हम गंभीर भ्रष्‍टाचार से जुड़ी मान लें तो भी बात बेहद सीरियस हो जाती है। इन उच्‍च प्राथमिकता वाली शिकायतों में अंबाला में 1084, भिवानी में 1965, फरीदाबाद में 3649, नूंह में 1088, फतेहाबाद में 713, पलवल में 1560, गुरुग्राम में 1255, हिसार में 4267, झज्‍जर में 1251, जींद में 2746, कैथल में 1792, करनाल में 1409, कुरुक्षेत्र में 1129, महेंद्रगढ़ में 1002, पंचकूला में 940, चंडीगढ़ में 162, चरखीदादरी में 567, पानीपत में 1047, रेवाड़ी मे 1479, रोहतक में 1784, सिरसा में 2191, सोनीपत में 1540 और यमुनानगर में 1321 शिकायतें दर्ज की गई हैं। इसमें अगर चंडीगढ़ मुख्‍यालय को छोड़ दें तो कहीं भी पांच सौ से कम शिकायतें नहीं दर्ज हुई हैं। इसके बावजूद छह साल से अधिक की अवधि में भी महज 937 लोगों का दोषी पाया जाना सरकार की नीयत पर शक और गहरा कर देता है। खुद मुख्‍यमंत्री मनोहर लाल की ओर से पिछले विधानसभा सत्र में लिखित तौर पर सदन के पटल पर रखे गए यह आंकड़े इस बात की तस्‍दीक कर रहे हैं कि सरकार कुछ बताकर बहुत कुछ छिपाना चाह रही है। सरकार से सवाल पूछने वाले विधायक जगबीर सिंह मलिक का कहना है कि न तो सरकार ने यह बताया कि इसमें भ्रष्‍टाचार के कितने मामले हैं और न ही यह बताना मुनासिब समझा कि दोषी पाए गए अधिकारी कौन हैं और किस स्‍तर के हैं। दोषी पाए गए अधिकारियों के खिलाफ क्‍या कार्यवाही की गई, यह भी नहीं बताया। आखिर सरकार छिपाना क्‍या चाह रही है।

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