आंदोलनकारी किसानों के लिए मददगार बना किसान मॉल, सरकार ने मुंह फेरा तो खालसा एड ने थामा हाथ

दिल्ली की ठंड में जिस तरह लोगों को यहां मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है, ऐसे में ये सरकार का काम था कि वह इनका ख्याल रखती। लेकिन अफसोस की बात है कि सरकार अपनी जिद पर अड़ी है और उसमें इतनी भी मानवीयता नहीं कि आंदोलन कर रहे किसानों की जरूरत का इंतजाम करे।

फोटोः विपिन
फोटोः विपिन

जब कोई समाज की चिंता करता है तो समाज को उसकी चिंता करनी चाहिए। दिल्ली की सीमाओं पर पंजाब के किसानों की अगुवाई में पूरे देश के किसानों के लिए चलाए जा रहे आंदोलन में भी यही हो रहा है। यहां डटे किसानों में बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जिनके पास दिल्ली की ठंड को झेलने वाले कपड़े तो दूर, रोज काम में आने वाले सामान भी नहीं हैं।

ऐसे में सिखों के अंतरराष्ट्रीय स्तर के गैर-सरकारी संगठन ‘खालसा एड’ ने किसान समाज के कल के लिए आंदोलन करने वाले इन लोगों की बुनियादी जरूरतों के सामान मुफ्त उपलब्ध कराने का बीड़ा उठाया। इसके लिए कुछ दिन पहले संगठन ने टिकरी सीमा पर ‘किसान मॉल’ खोला और फिर सिंघु बॉर्डर पर।

कैसे करता है काम

संगठन के कार्यकर्ता किसानों की भीड़ के बीच जाकर देखते हैं कि किन लोगों को मदद की जरूरत है। ऐसे लोगों की पहचान करके उन्हें टोकन दिया जाता है जो उन्हें दिखाकर किसान मॉल से मुफ्त में अपनी जरूरत के सामान ले सकते हैं। मदद के हाथ गैर-जरूरी लोगों के काम न आएं या इसका दोहराव न हो, इसके लिए लोगों के नाम, मोबाइल नंबर से उनका रजिस्ट्रेशन किया जाता है। जिनके पास आधार नंबर होता है, उनके रजिस्ट्रेशन में इसका भी जिक्र कर दिया जाता है। मॉल में जूता, कंबल-शॉल, मफलर, जुराब से लेकर टूथ पेस्ट-टूथ ब्रश, साबुन, वैस्लीन, कंघे वगैरह दिए जाते हैं।

टिकरी सीमा पर स्थित किसान मॉल में सेवा देने वाले एक व्यक्ति ने बताया कि रोजाना लगभग 500 लोगों को टोकन दिया जाता है। जब ये लोग टोकन लेकर मॉल आते हैं तो खालसा एड के कार्यकर्ता उस किसान की जरूरत के सामान को थैले में रखकर उन्हें दे देते हैं। यहां किसानों के लिए फुट मसाज सेंटर भी बनाया गया है, जहां किसान अपनी थकावट दूर कर सकते हैं। इसके अलावा मॉल के बाहर खालसा एड लोगों को भोजन भी उपलब्ध कराता है, जहां लोगों की भीड़ देखी जा सकती है।

टिकरी बॉर्डर पर किसान मॉल के कारण आंदोनकारियों को पहुंच रही सीधी मदद के सफल प्रयोग के बाद संगठन ने सिंघु बॉर्डर पर भी ऐसा ही एक मॉल खोला है। एक किसान ने कहा कि “पंजाब के लोगों में सेवाभाव का संस्कार है और किसान मॉल उसी भाव के कारण खोला गया है। दिल्ली की ठंड में जिस तरह लोगों को यहां मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है, ऐसे में यह तो सरकार का काम था कि वह इनका ख्याल रखती। लेकिन अफसोस की बात है कि सरकार अपनी जिद पर अड़ी है और उसमें इतनी भी मानवीयता नहीं कि आंदोलन कर रहे किसानों की जरूरत का इंतजाम करे।”

कोसोवो त्रासदी की प्रेरणा

खालसा एड ब्रिटेन स्थित गैरसरकारी संगठन है और इसकी स्थापना रविंदर (रवि) सिंह ने 1999 में की। इसे खोलने की वजह बनी कोसोवो की त्रासदी जिसके बारे में जानकर रविंदर अंदर तक हिल गए और खुद उनके शब्दों में “सरबत दा भल्ला” यानी सबकी भलाई की सिख परंपरा से प्रेरित होकर उन्होंने बड़ी ही मुश्किल हालात में जी रहे कोसोवो के लोगों की मदद के लिए एक औपचारिक मंच तैयार करने का फैसला किया और इस तरह ‘खालसा एड’ का पंजीकरण हुआ।

शुरू में तो रविंदर ने जान-पहचान के लोगों और अखबार वालों को फोन करके अपनी योजना के बारे में बताया और उनसे मदद की अपील की। आखिर वह दो हफ्ते के भीतर मदद से भरे दो ट्रक और एक वैन रवाना कर सके। 1999 के बाद से खालसा एड यमन, ग्रीस से लेकर खाड़ी के देशों और हाल के समय में म्यांमार से विस्थापित रोहिंग्या मुसलमानों तक की मदद कर चुका है। दुनिया के किसी भी कोने में किसी भी तरह की प्राकृतिक आपदा के कारण मानवीय संकट पैदा हुआ हो, खालसा एड ने वहां के प्रभावित लोगों को मदद पहुंचाने की भरसक कोशिश की।

इसी तरह साल 2018 में जब केरल 90 साल के सबसे विनाशकारी बाढ़ से जूझ रहा था और पूरे राज्य में लोगों की बुनियादी जरूरतें पूरा करने में भी दिक्कतें पेश आ रही थीं तो संगठन ने लोगों को जरूरत के सामान उपलब्ध कराए और 15 हजार लोगों के लिए रोजाना गर्म और ताजा खाने का इंतजाम किया। कुल मिलाकर कहा जाए तो ये किसान मॉल सिख परंपरा के सेवाभाव और उस सेवा को बेहतर तरीके से कैसे सीधे जरूरतमंद तक पहुंचाई जाए, इस प्रयोग का खूबसूरत मिश्रण है।

इस बीच, केंद्र सरकार किसानों के आंदोलन को तरह-तरह से बदनाम करने में लगी हुई है। कभी इसे खालिस्तान से जोड़ दिया जाता है, कभी इसे बिचौलियों या आढ़तियों का आंदोलन करार दिया जाता है तो कभी विपक्षी दलों पर आरोप मढ़ दिया जाता है कि उसने इन आंदोलनकारियों को भड़का दिया है। लेकिन इन सबमें वह सबसे बड़े इस सवाल को नजरअंदाज कर दे रही है कि क्या इन किसानों में सोचने-समझने की इतनी भी क्षमता नहीं कि वे अपना अच्छा-बुरा समझ सकें?

कानून बनाने वालों ने कभी खेती-किसानी की हो या नहीं, यह तो वे ही बेहतर जानते होंगे लेकिन जिन्हें बदनाम करने की कोशिश की जा रही है, उन्होंने जमीन को अपने पसीने से सींचा है। उनका मिट्टी के साथ पुराना पारंपरिक रिश्ता रहा है। जिन लोगों को इतना पता हो कि उनके मंच का इस्तेमाल किसी भी पार्टी को नहीं करने देना है, उनके लिए बरगला दिए जाने की बात कहां तक सही हो सकती है, यह आसानी से समझी जा सकती है।

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Published: 02 Jan 2021, 8:21 PM
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