चुनाव: अगर बहुमत को लेकर फंसा कहीं पेंच, तो फिर इन 5 राज्यपालों के पाले में होगी गेंद, जानिए इनकी पृष्ठभूमि

पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव के बाद वोटों की गिनती कल यानी 10 मार्च को होगी। लोकतंत्र के लिए यूं तो अच्छा यही होता है कि किसी एक दल या गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिले, लेकिन क्या हो अगर खंडित जनादेश रहा। ऐसे में राज्यपालों की भूमिका अहम हो जाती है।

सोशल मीडिया
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नवजीवन डेस्क

यूपी, उत्तराखंड और पंजाब समेत पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों का फैसला कल यानी 10 मार्च को हो जाएगा। वैसे तो अभी तक आए चुनावी सर्वे किसी न किसी पार्टी के पक्ष में बहुमत का अनुमान लगा रहे हैं, लेकिन क्या होगा अगर खंडित जनादेश यानी हंग असेम्बली की स्थिति बनी? ऐसे में सारा दारोमदार राज्यपाल पर होगा और वही तय करेंगे कि किस पार्टी को सरकार बनाने का न्योता दें।

आइए देखते हैं कि जिन राज्यों में चुनाव हुए हैं, वहां कौन राज्यपाल है और उनकी क्या पृष्ठभूमि है:

उत्तर प्रदेश : आनंदीबेन पटेल

आनंदीबेन पटेल ने जुलाई 2019 में उत्तर प्रदेश में राज्यपाल का कार्यभार संभालना। इससे पहले वे जनवरी 2018 से मध्य प्रदेश की राज्यपाल थीं। और उससे भी पहले गुजरात में 2014 से 2016 तक मुख्यमंत्री थीं। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्हें गुजरात का मुख्यमंत्री बनाया गया था। वे मोदी की गुजरात सरकार में शिक्षा मंत्री भी रहीं।

राजनीतिक हल्कों में आनंदीबेन पटेल को मोदी का नजदीकी और विश्वासपात्र माना जाता है। जब भी मोदी गुजरात से बाहर जाते थे, तो आनंदीबेन को ही नंबर दो माना जाता था। हालांकि केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के साथ उनकी प्रतिद्वंदता जगजाहिर है, और यही कारण है कि उन्हें गुजरात के मुख्यमंत्री का पद छोड़कर विजय रुपाणी के लिए रास्ता खोलना पड़ा था।

अगर पार्टी के अंदरूनी सूत्रों की मानें तो आनंदीबेन पटेल को ही यूपी सीएम योगी आदित्यनाथ और पीएम मोदी के बीच पिछले साल हुए मनमुटाव को सुलटाने का जिम्मा दिया गया था जो उत्तर प्रदेश मंत्रिमंडल में कुछ नियुक्तियों को लेकर पैदा हुए थे।

पंजाब : बनवारी लाल पुरोहित

बनवारी लाल पुरोहित पिछले साल यानी 2021 के सितंबर से पंजाब के राज्यपाल हैं। इससे पहले वे तमिलनाडु के राज्यपाल थे। पुरोहित ने महाराष्ट्र में स्वर्गीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस से अपना राजनितिक सफर शुरु किया था, लेकिन राम मंदिर आंदोलन के दौरान उन्होंने 1991 में बीजेपी का दामन थाम लिया। अयोध्या में उस वर्ष हुई कारसेवा में हिस्सा लेने के लिए उन्हें कांग्रेस से निकाल दिया गया था।

बीजेपी में पुरोहित के पार्टी के कद्दावर नेता प्रमोद महाजन के साथ अनबन हुई, जिसके कारण पुरोहित 1999 में एक बार फिर कांग्रेस में वापस आ गए। लेकिन 2009 के लोकसभा चुनाव से पहले उन्होंने फिर से बीजेपी की सदस्यता लेली। पुरोहित 1996 के बाद कोई चुनाव नहीं जीत सके।

पुरोहित ने उस समय एक विवाद खड़ा कर दिया था जब अप्रैल 2018 में उन्होंने एक महिला पत्रकार को मुश्किल सवाल पूछने के लिए अजीब सा व्यवहार करते हुए उसके गालों को छू लिया था।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पुरोहित के आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के साथ अच्छे रिश्ते हैं, वहीं केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और महाराष्ट्र के पूर्व सीएम देवेंद्र फडणविस के साथ ही उनकी अच्छी बनती है। तमिलनाडु के राज्यपाल रहते हुए मुख्यमंत्री एम के स्टालिन के साथ उनके रिश्ते काफी कड़वे रहे और स्टालिन ने तो उन्हें हटाए जाने की भी मांग की थी।

गोवा : पी एस श्रीधरन पिल्लई

पी एस श्रीधरन पिल्लई को जुलाई 2021 में गोवा का राज्यपाल बनाया गया। इसे पहले वे मिजोरम के राज्यपाल थे। मिजोरम का राज्यपाल बनाए जाने से पहले तक श्रीधरन पिल्लई केरल में बीजेपी के प्रदेशाध्यक्ष थे। वे केरल में 2003 से दो बार पार्टी अध्यक्ष रहे। माना जाता है कि केरल में बीजेपी अध्यक्ष पद पर उन्हें अमित शाह के समर्थन से नियुक्त किया गया था। पिल्लई केरल में हिंदुत्व के प्रमुख चेहरे के तौर पर जाने जाते थे।

केरल के चर्च को बीजेपी के पक्ष में आने के लिए पिल्लई ने प्रदानमंत्री नरेंद्र मोदी से दखल देने की मांग की थी।

मणिपुर : ए ए गणेशन

गणेशन युवावस्था से ही संघ के प्रचारक रहे हैं। उन्हें अगस्त 2021 में मिजोरम का राज्यपाल बनाया गया था। उनसे पहले मिजोरम में नजमा हेपतुल्ला राज्यपाल थीं। 2016 में गणेशन को मध्य प्रदेश से राज्यसभा का सदस्य चुना गया था। गणेशन के उस बयान को लेकर काफी विवाद हुआ था जिसमें उन्होंने कहा था कि भारत के कल्याण के लिए तमिलनाडु का त्याग करने कोई हर्ज नहीं है।

उत्तराखंड : लेफ्टि. जन. गुरमीत सिंह

गुरमीत सिंह भारतीय सेना के डिप्टी चीफ रह चुके हैं। उन्हें भी पिछले साल सितंबर में उत्तराखंड का राज्यपाल नियुक्त किया गया था। उन्हें चीन के मामलों का विशेषज्ञ माना जाता है। वे 2016 में करीब 4 दशक की सेवा के बाद सेना से रिटायर हुए थे। दिसंबर 2021 में उन्होंने कहा था कि वे भारतीय राजनीति में आ रहे इस बदलाव से काफी गौरवान्वित महसूस करते हैं कि देश राष्ट्रीय भावनाओं और राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कड़े फैसले ले रहा है।

अब इन राज्यपालों का इतिहास जानने के बाद याद दिला दें कि नजमा हेपतुल्ला ने मणिपुर का राज्यपाल रहते हुए 2017 में बीजेपी को सरकार बनाने का न्योता दिया था जबकि 60 सदस्यीय विधानसभा में 28 सीटों के साथ कांग्रेस सबसे बड़े दल के रूप में सामने आया था जबकि बीजेपी को सिर्फ 21 सीटें हासिल हुई थीं। नजमा ने ऐसा तब किया था जबकि कांग्रेस के मुखअयमंत्री ओकराम इबोबी सिंह ने सरकार बनाने का दावा भी पेश कर दिया था। लेकिन नजमा ने कहा था कि बीजेपी के पास सरकार बनाने के लिए संख्याबल है।

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