लखीमपुर कांड ने BJP की मानसिकता को उजागर किया, मोदी सरकार की 'बेचो-बेचो' नीति ने देश को संकट में डाला: सोनिया गांधी

सोनिया गांधी ने बैठक में कहा कि हाल के दिनों में लखीमपुर खीरी की घटना ने झकझोर कर रख दिया है और इससे साफ हो गया है कि बीजेपी किसान आंदोलन को किस तरह देखती है, जबकि किसान अपनी आजीविका बचाने का संघर्ष कर रहे हैं।

फोटो: @INCIndia
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नवजीवन डेस्क

आप सभी का स्वागत है। संसद सत्र समाप्त होने के बाद से ही मैं इस बैठक का इंतजार कर रही थी। अब चूंकि आप सभी लोगों ने वैक्सीन लगवा ली है तो ऐसे में तय किया गया कि हम लोग मिल बैठकर चर्चा करें। मैं इस मौके पर डॉ मनमोहन सिंह के जल्द स्वस्थ्य होने की कामना करती हूं।

हम ऐसे मौके पर मिल रहे हैं जब देश भर में किसानों और किसान संगठनों का आंदोलन जारी है। लगभग एक साल से किसान उन तीन काले कानूनों के खिलाफ संघर्षरत हैं जिन्हें जबरदस्ती संसद पर थोपा गया। हमने इन्हें रोकने की कोशिश की लेकिन मोदी सरकार ने इन कानूनों को जबरदस्ती पास कराया ताकि निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाया जा सके। इसके फौरन बाद ही किसानों ने आंदोलन शुरु कर दिया था और तब से अब तक उन्होंने काफी कुछ सहा है।

हाल के दिनों में लखीमपुर खीरी की घटना ने झकझोर कर रख दिया है और इससे साफ हो गया है कि बीजेपी किसान आंदोलन को किस तरह देखती है, जबकि किसान अपनी आजीविका बचाने का संघर्ष कर रहे हैं।

लखीमपुर कांड ने BJP की मानसिकता को उजागर किया, मोदी सरकार की 'बेचो-बेचो' नीति ने देश को संकट में डाला: सोनिया गांधी
लखीमपुर कांड ने BJP की मानसिकता को उजागर किया, मोदी सरकार की 'बेचो-बेचो' नीति ने देश को संकट में डाला: सोनिया गांधी
लखीमपुर कांड ने BJP की मानसिकता को उजागर किया, मोदी सरकार की 'बेचो-बेचो' नीति ने देश को संकट में डाला: सोनिया गांधी
लखीमपुर कांड ने BJP की मानसिकता को उजागर किया, मोदी सरकार की 'बेचो-बेचो' नीति ने देश को संकट में डाला: सोनिया गांधी
लखीमपुर कांड ने BJP की मानसिकता को उजागर किया, मोदी सरकार की 'बेचो-बेचो' नीति ने देश को संकट में डाला: सोनिया गांधी
लखीमपुर कांड ने BJP की मानसिकता को उजागर किया, मोदी सरकार की 'बेचो-बेचो' नीति ने देश को संकट में डाला: सोनिया गांधी
लखीमपुर कांड ने BJP की मानसिकता को उजागर किया, मोदी सरकार की 'बेचो-बेचो' नीति ने देश को संकट में डाला: सोनिया गांधी

देश की अर्थव्यवस्था भी चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रही है और चिंता की बात यह है कि इसके बावजूद सरकार यह प्रचार करने में जुटी है कि सबकुछ ठीक है। लेकिन हमें पता है कि आर्थिक स्थिति दुरुस्त करने के लिए सरकार बरसों के अथक परिश्रम से बनाई गई राष्ट्रीय संपत्तियों को बेच रही है। ध्यान रखना होगा कि सरकारी कंपनियां और संपत्तियां न सिर्फ देश का सामरिक और आर्थिक उद्देश्य पूरा करती हैं बल्कि सामाजिक लक्ष्य हासिल करने में भी इनका योगदान रहता है। मसलन अनुसूचित जाति/जनजातियों के सशक्तीकरण और पिछड़े क्षेत्रों के विकास में इन कंपनियों का बड़ा योगदान रहा है, लेकिन मोदी सरकार की ‘बेचो-बेचो’ नीति ने इस सबको पीछे धकेल दिया है। इस दौरान आवश्यक वस्तुओं के दाम, भोजन और तेल के दाम बेतहाशा तेजी से बढ़े हैं। क्यो कोई कल्पना कर सकता था कि देश में पेट्रोल-डीजल 100 रुपए प्रति लीटर के दाम पर बकेगा, गैस का सिलेंडर 900 से 1000 रुपए का होगा, खाने का तेल 200 रुपए लीटर होगा। इस सबसे देश के आम लोगों की जिंदगी दूभर हो गई है।


हमारी पिछली बैठक के बाद से केंद्र सरकार की वैक्सीन नीति में बदलाव आया है। अब इन्हें राज्यों की मांग के अनुरूप किया जा रहा है। यह शायद पहला मौका था जब केंद्र ने असलियत में राज्यों की बात सुनी और इससे देश को फायदा हुआ है। हालांकि केंद्र और राज्यों के रिश्तों का संघवाद सिर्फ एक नारा बन कर रह गया है और केंद्र सरकार कोई मौका नहीं छोड़ती जब गैर-बीजेपी शासित राज्यों के साथ भेदभाव न किया जाए।

हाल के दिनों में जम्मू-कश्मीर में अल्पसंख्यकों की हत्याओं में अनायास वृद्धि हुई है और उन्हें निशाना बनाया जा रहा है। इस कृत्य की सख्त से सख्त शब्दों में निंदा की जानी चाहिए। मैं इसकी सख्त निंदा करती हूं। जम्मू-कश्मीर दो साल से केंद्र शासित प्रदेश है और वहां हो रही हत्याओं के लिए जिम्मेदार लोगों को सजा लाने की जिम्मेदारी पूरी तरह केंद्र सरकार पर है। साथ ही जम्मू-कश्मीर में सामाजिक शांति और भाइचारे के साथ ही लोगों में विश्वास पैदा कनरे की जिम्मेदारी भी केंद्र सरकारी की ही है।

पड़ोसी देशों के साथ भारत रिश्तों पर हमेशा से एक आम सहमति रही है। लेकिन मोदी सरकार द्वारा अहम मुद्दों पर विपक्ष से विचार-विमर्श न करने की नीति के चलते इसे नुकसान हुआ है।

आज की तारीख में भारत की विदेश नीति चुनावी लामबंदी और ध्रुवीकरण का एक साधन बन गई है। हम अपनी सीमाओं और अन्य मोर्चों पर गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। प्रधानमंत्री ने पिछले साल विपक्षी नेताओं से कहा था कि चीन ने हमारे क्षेत्र पर कोई कब्जा नहीं किया है और तब से इस विषय पर उनकी चुप्पी देश को महंगी पड़ रही है।

विधानसभा चुनावों की बात करें तो कांग्रेस पार्टी ने सभी चुनावी राज्यों में तैयारियां तेज कर दी है। इसमें संदेह नहीं कि हमारे सामने कई चुनौतियां हैं, लेकिन अगर हम एकजुट हैं, हम अनुशासित हैं और सिर्फ पार्टी के हितों को ध्यान में रखते हैं तो मुझे भरोसा है कि हम चुनावों में अच्छा प्रदर्शन करेंगे। इस मुद्दे पर चुनावी राज्यों के महासचिव और प्रभारी और अधिक प्रकाश डालेंगे।

अंत में मैं पार्टी के संगठनात्मक चुनावों की बात करूंगी। कांग्रेस पार्टी का संगठन पार्टी को नए सिरे से तैयार करना चाहता है। लेकिन इसके लिए पार्टी के हितों को ऊपर रखते हुए एकजुट और आत्मनियंत्रण रखते हुए अनुशासित होने की जरूरत है। मैं इस बात से भलिभांति परिचित हूं कि मैं पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष हूं। मुझे इस पद पर कार्यसमिति ने जिम्मेदारी सौंपी थी। उसके बाद से हमने एक मार्ग बनाया था ताकि पार्टी अध्यक्ष के पद का 30 जून 2021 तक चुनाव हो सके। लेकिन कोविड की दूसरी लहर के चलते यह नहीं हो पाया और समयसीमा को बढ़ाना पड़ा।

आज हम इस बैठक में इस मुद्दे पर स्पष्ट रूप से तय करेंगे कि संगठन चुनाव कब कराए जाएं। इस बारे में पार्टी के संगठन महासचिव वेणुगोपाल जी बताएंगे।।

बीते दो साल के दौरान कांग्रेस के साथियों ने, खासतौर से युवा साथियों ने पार्टी के कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया है और पार्टी की नीतियों को जन-जन तक पहुंचाया है। वह किसान आंदोलन का मुद्दों हो, कोरोना महामारी में लोगों को राहत पहुंचाने की बात हो, युवाओं और महिलाओं से जुड़े मुद्दे उठाना हो, दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों पर अत्याचार हो, महंगाई और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को को ख्तम करने के फैसले हों, सब पर पार्टी ने एकजुट होकर आवाज उठाई है।

आपको याद होगा कि मैं अहम मुद्दों पर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी और राहुल जी के साथ लगातार चर्चा करती रही हैं और समय-समय पर राष्ट्रीय मुद्दों पर बयानजारी करती रही हैं। हमने राष्ट्रीय मुद्दों और संसद में साझा नीति को लेकर साझा बयान भी जारी किए हैं।

मुझे खुलकर बात करना हमेशा सही लगा है, ऐसे में मीडिया के जरिए मुझसे बात करने की जरूरत नहीं है। इसलिए आइए हम लोग खुलकर और ईमानदारी से चर्चा करें। लेकिन इस कमरे से बाहर जो कुछ जाएगा वह एक संयुक्त फैसला होना चाहिए।

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