भूखे-प्यासे पैदल चलते मजदूरों को देखिए और देश में चुनाव का समय याद कीजिए, शायद हमें ही कुछ शर्म आ जाए!

भारत में चुनावों के दौरान रैलियों और रोड शो के लिए सैकड़ों बसों का इंतेजाम किया जाता है। हजारों लोगों को टोपी और खाना दिया जाता है। ऐसी राजनीति वाले देश में हजारों मजदूर बेबस होकर पैदल घर लौट रहे हैं और उनकी कोई सुनने वाला नहीं है, इसे ही विडंबना कहेंगे।

फोटोः सोशल मीडिया
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DW

भारत में मई 2019 के लोकसभा चुनावों में ऐसे कई रोड शो और रैलियां हुईं, जिनमें भीड़ दिखाने के लिए तमाम कोनों से लोगों को बसों में भर-भर कर लाया गया। बसों का रेला खड़ा हो गया। कमल, साइकिल, हाथी, तीर ये सारे निशान फूड पैकेटों, टोपियों, बैचों और टीशर्टों पर दिखने लगे।

आज करीब एक साल बाद, देश की सड़कें सूनी हैं। प्रचार के लिए सब कुछ का इंतजाम करने वाले चेहरे, शायद अगले चुनावों के मुद्दे खोजने में व्यस्त हैं। ज्यादातर वोटर घरों में बंद हैं, लेकिन रैलियों के लिए पताकाएं लगाने वाले, स्टेज बनाने वाले, कुर्सियां लगाने वालों समेत हजारों लोग सड़कों पर हैं।

देश के तमाम राज्यों में बीते कुछ हफ्तों से राष्ट्रीय राजमार्गों पर गाड़ियां कम और लुटे-पिटे दिखते इंसान ज्यादा चल रहे हैं। मई के सूरज ने सड़कों को तपा दिया है। उन पर चलते कई मजदूरों की चप्पलें टूट चुकी हैं। उनकी बनाई हुई सड़कें ही आज उनके पैरों को छील रही हैं और जला भी रही हैं। किसी के कंधे पर बच्चा है तो किसी झुकी कमर पर भारी गठरी। ऐसे बहुत सारे दृश्य हैं जिनमें पत्नी डगमागाते हुए पीछे-पीछे चल रही है और सूटकेस पर निढाल बच्चा सरक रहा है।

बीच-बीच में जब कोई जरा सी मदद करता है या कुछ पूछता है तो मजदूर फफक कर रो पड़ते हैं। अपनी दास्तान सुनाने लगते हैं। हजारों की संख्या में मजदूरों का ऐसा पैदल काफिला भारत के तमाम राष्ट्रीय राजमार्गों पर दिख रहा है। वे किसी तरह अपने गांव वापस पहुंचना चाहते हैं।

24 मार्च से लागू लॉकडाउन के चलते देश में प्रवासी मजदूरों को रोजी रोटी के लाले पड़ गए। केंद्र और राज्य सरकारों के तमाम दावों के बावजूद ज्यादातर मजदूरों तक न तो राशन पहुंचा और ना पैसा। उनके सामने दो विकल्प रह गए, मदद की आस में शहरों में भूख झेलते रहना या जैसे भी हो किसी तरह गांव लौट जाना। ऐसे में परिवहन के तमाम साधन बंद होने के कारण वे पैदल ही निकल गए।

हालांकि, अभी भी कई शहरों से उन्हें डंडे के दम पर बाहर नहीं निकलने दिया जा रहा है। राजनीतिक दल उनकी आड़ में एक दूसरे को नीचा दिखाने पर तुले दिख रहे हैं। चुनावी रैलियों से हफ्ते भर के भीतर सैकड़ों बसों, ट्रकों और लाखों फूड पैकेटों का इंतजाम करने वाले पार्टी पदाधिकारी इस वक्त सोशल मीडिया पर इस त्रासदी का फायदा कैसे उठाया जाए, ये रणनीति बना रहे हैं।

कई जगहों से मजदूरों की मदद करने वाले लोगों की रिपोर्टें आ रही हैं तो कुछ जगहों से मजबूर मजदूरों से 10 गुना किराया वसूलने की खबरें भी हैं। अनुमानों के मुताबिक भारत में दिहाड़ी मजदूरों की संख्या 4 करोड़ से 12 करोड़ के बीच है। इनमें से कितने सड़क के रास्ते एक अंतहीन से दिखते सफर पर निकले हैं, इसकी सटीक जानकारी नहीं है।

देश में कहीं रेल की पटरियों पर उनकी रोटियां बिखरी हैं तो कहीं सड़क किनारे खून से बिखरी फटी कमीज। जिन लोगों को स्वाभिमान ने भीख मांगने के बजाए कड़ी मेहनत करना सिखाया आज वो अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति का उदाहरण देते हुए पैदल ही गांव की तरफ लौट रहे हैं। शहर की लेबर गांव पहुंच पाएगी या नहीं, ये बात गारंटी से कोई नहीं कह सकता।

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