मध्य प्रदेश गवाह है आदिवासियों पर जुल्म की अनंत कथाओं का, लेकिन बीजेपी सरकार को नहीं है इसकी परवाह

मध्यप्रदेश में आदिवासियों पर अत्याचार से सरकार को बहुत फर्क नहीं पड़ता। नेमावर में आदिवासी परिवार के पांच सदस्य गायब थे और उनके परिजन पुलिस से लगातार शिकायत कर रहे थे, पर पुलिस ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। 47 दिनों बाद उनके शव 10 फीट गहरे गड्ढे से मिले।

फोटो : सोशल मीडिया़ट
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रामयश केवट

हालांकि कोई उम्मीद करना बेमानी है, पर भोपाल के जंबूरी मैदान में आयोजित समारोह में भाग लेने से पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने थोड़ा होमवर्क कर लिया होता, तो शायद उन्हें अंदाजा होता कि आदिवासियों के सामने की जाने वाली घोषणाओं से जमीनी सच्चाई नहीं बदल सकती।

मोदी और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बढ़-चढ़कर दावा तो किया कि आदिवासियों की हिमायती भारतीय जनता पार्टी ही है। लेकिन वे यह याद करना नहीं चाह रहे थे कि अनुसूचित जनजाति वर्ग के लोगों के उत्पीड़न के मामले में मध्यप्रदेश नंबर वन है। बीते 3 सालों से मध्यप्रदेश इन अपराधों में पहले नंबर पर बना हुआ है जबकि बीच के करीब 15 महीनों को छोड़कर बीते 15 सालों से यहां मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी), 2020 की रिपोर्ट के मुताबिक, तीन साल से इस वर्ग के खिलाफ अपराध या उन्हें प्रताड़ित करने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। वर्ष 2020 में ऐसी 2,401 घटनाएं हुईं जबकि 2019 में ऐसी 1,922 और 2018 में 1,868 घटनाएं ही हुई थीं। मतलब, एक साल के दौरान इस तरह की घटनाओं में 20 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। ऐसे 2,370 मामले हैं जिनकी जांच एक साल से अधिक समय से लटकी हुई है।

यह भी समझने की जरूरत है कि आदिवासियों और कमजोर वर्गों पर तुरंत कार्रवाई करने और मामलों को निबटाने का स्थायी आदेश है, फिर भी पुलिस किस वजह से इन्हें लटकाए रखती है, यह हर व्यक्ति जानता-समझता है। मध्यप्रदेश में पिछले साल इस वर्ग के 59 लोगों की हत्या हुई है और महिलाओं पर हमले के 297 प्रकरण दर्ज हुए हैं। देश के महानगरों में अनुसूचित जाति वर्ग के खिलाफ अपराध में इंदौर 40 मामलों के साथ देश में आठवें स्थान पर है जबकि अहमदाबाद पहले स्थान पर। वैसे, एनसीआरबी के आंकड़े यह भी बताते हैं कि पूरे देश में पिछले तीन साल में आदिवासियों के खिलाफ अपराध और उन्हें प्रताड़ित करने की घटनाएं लगातार बढ़ी हैं।

वैसे, अनुसूचित जातियों के खिलाफ हो रहे अपराध के मामले में भी मध्यप्रदेश का यही हाल है। दलितों के खिलाफ अपराध या उन्हें प्रताड़ित करने की घटनाएं भी यहां बढ़ती ही जा रही हैं। वर्ष 2020 में ऐसी 6,899 घटनाएं हुईं जबकि 2019 में ऐसी 5,300 और 2018 में 4,753 घटनाएं ही हुई थीं। इतनी दुखदायी हालत के बावजूद शिवराज अपनी पीठ ठोक सकते हैं क्योंकि योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाले उत्तर प्रदेश में दलित ज्यादा बेहाल हैं। जो घटनाएं यहां सुर्खियों में रही हैं, वे तो सबकी जानकारी में आ ही जाती हैं, एनसीआरबी के आंकड़े बता रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में दलित उत्पीड़न की वर्ष 2020 में 12,714 घटनाएं हुईं जबकि 2019 में ऐसी 11,829 और 2018 में 11,924 घटनाएं ही हुई थीं।


वैसे भी, मध्यप्रदेश में आदिवासी उत्पीड़न और उन पर अत्याचार की घटनाओं से सरकार को बहुत फर्क नहीं पड़ता। नेमावर में आदिवासी परिवार के पांच सदस्यों की हत्या की घटना ही यह बताने को काफी है कि आदिवासियों को लेकर पुलिस-प्रशासन का क्या रवैया रहता है। ये पांच लोग गायब थे और उनके परिजन 17 मई, 2021 के बाद पुलिस से लगातार शिकायत कर रहे थे, पर पुलिस ने इस ओर ध्यान भी नहीं दिया। 47 दिनों बाद 29 जून को उनके शव 10 फीट गहरे गड्ढे से मिले। मुख्य आरोपी सुरेन्द्र सिंह राजपूत खुद को हिन्दू केसरिया संगठन का अध्यक्ष बताता है और उसके कई बीजेपी नेताओं से अच्छे संबंध रहे हैं इसलिए माना जाता है कि पुलिस उस पर हाथ डालने से अंतिम समय तक बचती रही। इतनी वीभत्स घटना के बाद लगभग सभी प्रमुख दलों और संगठनों के लोग पीड़ित परिजनों से मिले, पर बीजेपी नेताओं ने इसकी जरूरत नहीं समझी।

वैसे, आदिवासी उत्पीड़न की घटना कोई भी हो जब तक किसी वजह से हो-हल्ला नहीं मचता, पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी रहती है। नीमच का ही उदाहरण लें। यहां कन्हैया लाल भील नाम के एक आदिवासी युवक को बर्बर तरीके से पीटा गया और पिकअप वाहन से बांधकर उसे घसीटा गया। बाद में अस्पताल में उसकी मौत हो गई। यह घटना हुई तो 26 अगस्त, 2021 को लेकिन जब घटना का वीडियो 28 अगस्त को सामने आया और देश भर में इसकी निंदा होने लगी, तब पुलिस जागी। इसी तरह, सितंबर के पहले सप्ताह में लूट के शक में खरगोन के बिस्टान थाने में गिरफ्तार आदिवासी युवक बिशन की इतनी पिटाई की गई कि हिरासत में ही उसकी मौत हो गई। जब गांववालों ने धरना-प्रदर्शन किया, तब सरकार ने न्यायिक जांच के आदेश दिए। ऐसे मामलों में न्यायिक जांच करने का नियम है ही।


पुलिस-प्रशासन के रवैये को थोड़ी देर के लिए छोड़ भी दें, तो शिवराज सरकार का आदिवासियों के प्रति क्या रवैया है, इसे एक और उदाहरण से समझा जा सकता है। पिछले विधानसभा चुनावों के बाद जब राज्य में कमलनाथ के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनी थी, तो उसने आदिवासी दिवस- 9 अगस्त पर सरकारी अवकाश की घोषणा की थी। जब कुछ विधायकों ने पाला बदल लिया और शिवराज की सरकार बनी, तो इस अवकाश को खत्म कर दिया गया। यह हाल तब है जबकि विधानसभा में आदिवासी समाज से 48 विधायक हैं।

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