मध्य प्रदेश के इस गांव में दशहरे पर रावण-कुंभकर्ण की पूजा, मन्नत पूरी होने पर होता है भंडारा

मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले के भाटखेड़ी गांव में दशहरे पर रावण और कुंभकर्ण की पूजा होती है। ग्रामीणों की मान्यता है कि मन्नत पूरी होने पर भंडारा कराया जाता है।

फोटो: सोशल मीडिया
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  • मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले के भाटखेड़ी गांव में दशहरे पर रावण और कुंभकर्ण का पुतला जलाने के बजाय उनकी पूजा होती है।

  • मान्यता है कि रावण के दरबार में मांगी गई मन्नत पूरी होती है, जिसके बाद श्रद्धालु प्रसाद चढ़ाते हैं और भंडारा कराते हैं।

  • दशहरे से पहले रावण और कुंभकर्ण की मूर्तियों को रंगा जाता है। पर्व पर रामलीला और भव्य जुलूस के बाद पूजा की परंपरा निभाई जाती है।

  • गांव के लोगों के मुताबिक, यह परंपरा उनके पूर्वजों ने शुरू की थी और आज भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ रही है।

देशभर में दशहरे पर रावण के पुतले का दहन किया जाता है, लेकिन मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले के भाटखेड़ी गांव में यह परंपरा बिल्कुल अलग है। यहां दशहरे के दिन रावण और कुंभकर्ण की पूजा होती है। इसी वजह से इस गांव को ‘रावण वाली भाटखेड़ी’ भी कहा जाता है।

गांव के लोगों की मान्यता है कि रावण उनकी मनोकामनाएं पूरी करता है। मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं, प्रार्थना करते हैं और प्रसाद चढ़ाते हैं। कई लोग इस मौके पर भंडारे का आयोजन भी करते हैं।

दशहरे पर रामलीला और जुलूस के बाद होती है पूजा

दशहरे से पहले गांव में स्थापित रावण और कुंभकर्ण की मूर्तियों को नए रंगों से सजाया जाता है। दशहरे के दिन उत्सव मनाया जाता है और विधि-विधान से पूजा की जाती है। इस दौरान भगवान राम और लक्ष्मण की भूमिका निभाने वाले कलाकार मूर्तियों को भाले से स्पर्श करते हैं और गांव की समृद्धि के लिए प्रार्थना करते हैं।

गांव के निवासी जगदीश चंद्र यादव ने पत्रकारों को बताया कि यह परंपरा बहुत पुरानी है। उनके अनुसार, नवरात्र के सभी नौ दिनों तक गांव में रामलीला का मंचन होता है। दशहरे पर भव्य जुलूस निकाला जाता है और रामलीला के बाद रावण की पूजा की जाती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यहां रावण का दहन नहीं होता।


संकट और संतान की मनोकामना के लिए आते हैं श्रद्धालु

जगदीश चंद्र यादव के मुताबिक, गांव की इस परंपरा के पीछे पूर्वजों से जुड़ी मान्यताएं हैं। उनके अनुसार, गांव पहले हनुमान जी के मंदिर के पास बसा था। बाद में उनके पूर्वज एकांत की तलाश में सड़क के दूसरी ओर आकर बस गए। उन्होंने हनुमान जी के पास मिट्टी से रावण और कुंभकर्ण की मूर्तियां बनाई थीं।

ग्रामीणों की मान्यता है कि जब गांव पर कोई संकट आता था या किसी परिवार को संतान न होने जैसी समस्या होती थी, तो लोग इन मूर्तियों के सामने मन्नत मांगते थे। लोगों का विश्वास है कि उनकी इच्छाएं पूरी होने पर वे यहां आकर पूजा करते और प्रसाद चढ़ाते हैं।

गांव के कृष्णपाल सिंह ने भी कहा कि मान्यता है कि देश-दुनिया से यहां आने वाले श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। वहीं, आरसी यादव ने बताया कि गांव के लोग अपने पूर्वजों की शुरू की गई परंपरा को रामलीला और रावण-कुंभकर्ण की पूजा के जरिए आज भी आगे बढ़ा रहे हैं।

इस तरह भाटखेड़ी गांव में दशहरा केवल रावण दहन का पर्व नहीं, बल्कि स्थानीय आस्था और पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा का प्रतीक है।

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