मध्य प्रदेशः पानी के अधिकार का कानून लाएगी कमलनाथ सरकार, देश में पहली बार होगा ऐसा

देश के संविधान का अनुच्छेद-21 नागरिकों को जीने और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हक देता है, जिसमें पानी जैसी जीवनोपयोगी जरूरत भी शामिल है। इसी भावना के तहत देश में पहली बार किसी राज्य सरकार ने अपने नागरिकों की दैनिक बुनियादी जरूरत को मान्यता देने का मन बनाया है।

फोटोः सोशल मीडिया
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नवजीवन डेस्क

मध्य प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने पानी के अधिकार का कानून बनाने की घोषणा की है। राज्य सरकार का यह प्रासंगिक निर्णय प्रशंसनीय है। देश के संविधान का अनुच्छेद-21 नागरिकों को जीने और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हक प्रदान करता है, जिसमें पानी जैसी जीवनोपयोगी जरूरत भी शामिल है।

संविधान की भावना के अनुरूप देश में पहली बार किसी राज्य सरकार ने अपने नागरिकों की दैनिक बुनियादी जरूरत को मान्यता देने का मन बनाया है। अगर यह कानून लागू हो पाया तो निश्चित ही प्रदेश के जरूरतमंद नागरिकों को बड़ी राहत देने वाला क्रांतिकारी कदम सिद्ध होगा।

संयुक्त राष्ट्र संघ के ‘आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय करार-2002’ में भी पानी के अधिकार के तहत सभी को जरूरत का पर्याप्त पानी किफायती दरों पर उपलब्ध करवाया जाना शामिल है। भारत की बड़ी आबादी की अभी भी स्वच्छ पानी तक पहुंच नहीं है, जिसके कारण कई बीमारियां पैदा होती हैं।

साल 2016 में मध्य प्रदेश में 0-14 वर्ष के आयु समूह में हुई मौतों में से 31.1 प्रतिशत की मौत जल-जनित रोग डायरिया के कारण हुई थी। डब्ल्यूएचओ और यूनिसेफ के एक अध्ययन में प्रदेश के कई ग्रामीण क्षेत्रों के पेयजल में आर्सेनिक, फ्लोराइड, लोहा, नाइट्रेट और दूषित सूक्ष्म जीवों की मात्रा सामान्य से काफी अधिक पाई गई है। कुछ साल पहले तक प्रदूषण विहीन नर्मदा नदी का पानी सरदार सरोवर, इंदिरा सागर, ओंकारेश्वर और बरगी जलाशयों में बंधने के कारण अब सड़ांध मारने लगा है और इसके किनारे बसे ग्रामीणों को पेयजल के नए स्रोत तलाशने पड़ रहे हैं।

राज्य में शहर और उनके आसपास के तालाब और नदी-नाले इस हद तक प्रदूषित हो चुके हैं कि वे निस्तार लायक भी नहीं बचे हैं। जल का अधिकार तभी सफल हो सकता है, जब जल स्रातों को प्रदूषण और बेजा कब्जों से बचाना सुनिश्चित किया जा सके। यह कठिन काम है, लेकिन इसके बिना जल का अधिकार बेमानी रहेगा।


सरकार का सभी नागरिकों को घर बैठे नल से जल प्रदान करने का आश्वासन भी बड़ा, व्यापक और समय लेने वाला काम है। ऐसे में जब तक यह न हो, तब तक घर से निकटतम स्थान, जो किसी भी स्थिति में आधा किलोमीटर से अधिक न हो, के दायरे में पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाना चाहिए। अस्पताल, स्कूल, अन्य शैक्षणिक संस्थानों, सरकारी कार्यालयों, हाट-बाजार और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर पानी और स्वच्छता की सुविधाएं मुफ्त उपलब्ध करवाई जानी चाहिए।

इस समय प्रदेश के सारे 378 नगरीय निकायों में कोई-न-कोई ऐसी जलप्रदाय योजना संचालित हो रही है, जिसमें उपभोक्ताओं से संचालन-संधारण के खर्च की वसूली की शर्त रखी गई है। इसी प्रकार प्रदेश की करीब डेढ़ करोड़ ग्रामीण आबादी के लिए 100 से अधिक ग्रामीण सामूहिक जलप्रदाय योजनाएं प्रस्तावित हैं। इन महंगी योजनाओं की पूर्ण लागत भी उपभोक्ताओं से ही वसूली जानी है।

पानी का अधिकार तभी सफल हो सकता है जब यह सबको किफायती दरों पर उपलब्ध हो। जो व्यक्ति अथवा समूह या समुदाय किफायती सेवा-शुल्क चुकाने में सक्षम न हो, उन्हें भी पानी से वंचित नहीं किया जाना चाहिए और निर्धारित न्यूनतम जरूरत का पानी मुफ्त उपलब्ध करवाया जाना चाहिए। पानी के बिना खेती की कल्पना नहीं की जा सकती है। मध्य प्रदेश की कुल आय में खेती का योगदान 36 प्रतिशत से अधिक है। इससे प्रदेश की 73 प्रतिशत आबादी की आजीविका चलती है।

इसी प्रकार मछुआरों जैसे समुदायों की आजीविका भी पानी पर निर्भर है। पशुपालकों को पशुओं के लिए अधिक पानी की जरूरत होती है। इसलिए पानी के अधिकार में आजीविका के लिए आवश्यक पानी को भी शामिल किया जाना चाहिए। वंचित समुदाय और हाशिये पर जी रहे ऐसे समूहों को जिन्हें पानी प्राप्त करना बेहद कठिन है, पानी की उपलब्धता में प्राथमिकता प्रदान की जानी चाहिए। इसलिए जरूरी है कि जल प्रबंधन सार्वजनिक क्षेत्र में ही रहे और इसका संचालन किसी तीसरे, निजी पक्ष को न सौंपा जाए।


मध्य प्रदेश के प्रस्तावित पानी का अधिकार कानून में नागरिकों की बुनियादी जरूरत को मान्यता देने की पहल की गई है। इस वृहत कार्य की सफलता के लिए निगरानी से लेकर प्रबंधन में भागीदारी सहित हर स्तर पर सक्रिय जनभागीदारी आवश्यक होगी। ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में सामुदायिक संगठनों को यह अधिकार देकर इस कानून को प्रभावी ढंग से लागू किया जा सकता है।

(सप्रेस से रेहमत मंसूरी का लेख साभार)

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