मध्य प्रदेश: सरकारी स्कूलों को पटरी लाने की कवायद में बे-स्कूल हो गए लाखों बच्चे
मध्य प्रदेश के ‘सांदीपनि स्कूल’ की पहल की कड़वी सच्चाई, हजारों सरकारी स्कूलों के छात्र कर रहे ‘एडजस्ट’ होने का इंतजार।
मध्य प्रदेश 2025 से अपनी ‘सांदीपनि स्कूल’ योजना खूब प्रचारित कर रहा है। एक ऐसा दिखाऊ प्रोजेक्ट, जिसमें चंद सरकारी स्कूलों को ‘आधुनिक’ लिबास में पेश किया जाना है; और इसके लिए ‘उच्च गुणवत्ता’ वाली शिक्षा के नाम पर 13,000 करोड़ रुपये अलग रखे गए हैं।
नतीजे मिले-जुले हैं। भोपाल, इंदौर, ग्वालियर जैसे शहरों के कुछ स्कूलों में स्मार्ट क्लासरूम, कंप्यूटर और रोबोटिक्स लैब, लाइब्रेरी, मुफ्त बस सेवा, जिम जैसी सुविधाएं हैं, लेकिन ज्यादातर सरकारी स्कूल बदहाल हैं। बालाघाट, बैतूल और झाबुआ जैसे जिलों में 15 से 30 सरकारी स्कूलों को मिलाकर बनाए गए कई सांदीपनि स्कूल अधूरे हैं। इनसे हजारों छात्रों की पढ़ाई में रुकावट के अलावा कुछ हासिल नहीं हुआ।
14 अगस्त को उज्जैन के सराफा इलाके में एक स्कूल की 300 से ज्यादा छात्राओं ने कलेक्टर ऑफिस के बाहर उस योजना के विरोध में प्रदर्शन किया, जिसके तहत उनके स्कूल बंद कर उन्हें सात किलोमीटर दूर प्रस्तावित सांदीपनि स्कूल में शिफ्ट होना है। छात्राएं रो रही थीं। वे तो पहले ही रोज छह-सात किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल जाती हैं। दूरी दोगुनी हो गई, तब तो उनकी पढ़ाई-लिखाई छूट ही जाएगी। 18 अगस्त को धार में ‘माता शबरी कन्या शिक्षा परिसर’ की छात्राएं खराब भोजन और हॉस्टल की गड़बड़ियों के कारण सड़कों पर उतरीं।
सरकार भले दावा करे कि उसने 161 नई स्कूल इमारतें पूरी कर ली हैं और 97 स्कूलों में कहीं ज्यादा आधुनिक सुविधाएं दी हैं, लेकिन 82,000 सरकारी स्कूल वाले राज्य में यह ऊंट के मुंह में जीरा ही है। खंडवा-नीमच के ग्रामीण इलाकों, आदिवासी क्षेत्रों में कई प्रस्तावित स्कूल निर्माणाधीन ही हैं, क्योंकि भीड़ भरे क्लासरूम, बिजली की अनियमित आपूर्ति और अपर्याप्त सुविधाओं जैसी बुनियादी समस्याएं दूर नहीं हुईं।
सांदीपनि स्कूलों के पीछे आठ लाख छात्रों को सुविधा देने की योजना है, जो सरकारी स्कूलों में अभी पढ़ रहे 70 लाख छात्रों (प्राइमरी से लेकर हायर सेकेंडरी तक) का दस प्रतिशत से कुछ ही ज्यादा है। विधानसभा में स्कूलों के लिए लगातार आवाज उठाने वाले कांग्रेस नेता प्रताप ग्रेवाल कहते हैं कि ज्यादातर छात्रों को इसका लाभ नहीं मिलेगा।
राज्य के 20 से ज्यादा जिलों में छात्रों ने अगस्त में विरोध प्रदर्शन किए, जो किसी हद तक जंतर-मंतर आंदोलन से प्रेरित थे। उनकी मांगें अन्य राज्यों जैसी भले हों, मध्य प्रदेश में विवाद का नया मुद्दा मौजूदा स्कूल बंद कर उन्हें ‘सांदीपनि स्कूलों’ में मिलाना है।
यही कारण है कि कटनी, अशोकनगर, पांढुर्ना, विदिशा, भोपाल और अन्य जगहों पर विरोध-प्रदर्शन हुए। अभिभावक-शिक्षक दोनों कहते हैं कि ग्रामीण स्कूल बंद होने से बच्चों, खासकर लड़कियों को प्रायः बिना किसी भरोसेमंद पब्लिक ट्रांसपोर्ट के, जंगल या असुरक्षित रास्तों से 15 किलोमीटर तक का सफर करना पड़ता है। जबलपुर का एक ऐतिहासिक स्कूल ‘सांदीपनि’ का दर्जा देकर अपग्रेड किया गया, लेकिन फिर उसे अचानक बंद कर 12 किलोमीटर दूर अन्यत्र शिफ्ट कर दिया गया। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने इस मामले में स्थानीय प्रशासन से जवाब मांगा है।
विधानसभा चुनावों से एक साल पहले यानी 2022 में स्कूलों पर अचानक सबका ध्यान गया, जब सरकारी स्कूलों की बदहाली की खबरों से परेशान तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आनन-फानन ‘सीएम राइज’ कार्यक्रम शुरू किया। हर जिले (कुल 55 जिले) में एक सीएम राइज स्कूल खोलने का वादा हुआ। कई मौजूदा स्कूल बतौर ‘उत्कृष्ट’ वर्गीकृत हो गए। मॉडल स्कूल नाम बदलकर सीएम राइज स्कूल हो गए, शिक्षकों का तबादला कर दिया गया, जिससे परीक्षाओं से ठीक पहले छात्रों की पढ़ाई बाधित हुई।
दिसंबर 2023 में जब मोहन यादव मुख्यमंत्री बने, स्कूली शिक्षा उनकी प्राथमिकताओं में नहीं दिखी। लेकिन अप्रैल 2025 में जब यादव ने योजना का नाम बदलकर इसे नए रूप में पेश किया, कहने-सुनने को ही सही, हालात बदले।
तब उन्होंने “सीएम राइज स्कूलों को हिन्दू पौराणिक कथाओं के संदीपनी आश्रम से प्रेरित होकर ‘सांदीपनि विद्यालय’ कहने की घोषणा की थी।” उन्होंने योजना का विस्तार करते हुए बढ़ा-चढ़ाकर आंकड़े पेश किए। आंकड़े कभी हैरान करने की हद तक सटीक ‘9,000’ होते, तो कभी तसल्ली देने वाले अंदाज में ‘हजारों’ तक सिमट जाते।
कागज पर, प्रथम चरण में 368 सांदीपनि स्कूल शामिल हैं- इनमें से 274 शिक्षा विभाग के तहत और 94 जनजातीय मामलों के विभाग के तहत आते हैं। 13,525 करोड़ रुपये से ज्यादा की लागत पर इसमें 4.43 लाख छात्रों को दाखिला देने का लक्ष्य है। दूसरे चरण में 405 स्कूल शामिल हैं, जिनका बजट 11,390 करोड़ रुपये से ज्यादा है और इसमें अतिरिक्त 4.05 लाख छात्रों को दाखिला देने की योजना है। खासी चर्चित इस योजना में गुरुकुल-शैली की मेंटरिंग को एआई, कोडिंग और रोबोटिक्स जैसे आधुनिक विषयों से जोड़ने की बात थी। एक अधिकारी ने इसे “स्कूली शिक्षा को पटरी पर लाने की एक कोशिश” बताया।
जमीनी स्तर पर यह योजना भ्रष्टाचार और अव्यवस्था का उदाहरण बनकर उभरी है। राजधानी भोपाल में प्रस्तावित आठ सांदीपनि स्कूलों में से तीन ही तैयार हैं, जबकि सरकारी स्कूलों के हजारों छात्र अधर में हैं। कुछ को खराब सुविधाओं वाले पास के सरकारी स्कूलों में ‘एडजस्ट’ कर दिया गया है। कम आय वाले परिवारों के लिए स्कूल बदलना मुश्किल होने के कारण शिक्षा में असमानता बढ़ रही है।
शिक्षकों के कुल 2.89 लाख स्वीकृत पदों में से 40 प्रतिशत रिक्त हैं। कमी पूरी करने को सरकार ने एक लाख से ज्यादा अतिथि शिक्षक रखे, जो अब नियमितिकरण और स्थायी शिक्षकों के बराबर वेतन के लिए सड़कों पर हैं।
रतलाम के शिक्षाविद पारस सकलेचा कहते हैं, “विभाग हजारों मुकदमे झेल रहा है। शिक्षक भर्ती, टीईटी परीक्षा रद्द होने आदि को लेकर रोज विरोध-प्रदर्शन हो रहे। बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार से छात्रों का भविष्य बर्बाद हो रहा। स्कूल यूनिफॉर्म, मिड-डे मील और पाठ्यपुस्तकों की आपूर्ति में भ्रष्टाचार, स्कूल नवीनीकरण के नाम पर फंड का गबन... कोई सिरा नहीं है।”
बैतूल के मुलताई में 44 करोड़ की लागत से बने सांदीपनि स्कूल को लेकर लोग इसलिए नाराज दिखे कि बनावट की बुनियादी कमियों के कारण दिन में भी क्लासरूम में अंधेरा रहता है और कॉरिडोर में बारिश का पानी भर जाता है।
सांदीपनि स्कूल के प्रधानाचार्यों के चयन में भी पक्षपात की शिकायतें हैं; कई काबिल शिक्षकों ने प्रक्रिया को हाईकोर्ट में चुनौती दी, और कोर्ट के दखल से ही उनका चयन हुआ। ग्वालियर के डबरा स्थित सांदीपनि स्कूल के प्रिंसिपल पर आरोप लगा कि उन्होंने फर्जी खरीदारी के लिए अपने एक साथी के आधार और ओटीपी का इस्तेमाल कर एक फर्जी गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस (जीईएम) अकाउंट बना डाला। बाद में स्थानीय शिक्षा अधिकारियों द्वारा मामले की जांच दबाने की कोशिश भी सामने आई।
सरकारी आंकड़े भी पिछले दशक में सरकारी स्कूलों में दाखिला लेने वाले छात्रों की संख्या में 62 लाख की कमी बताते हैं, जिनमें आधे से ज्यादा लड़कियां हैं। विधानसभा के पिछले बजट सत्र में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, प्राइमरी और मिडिल स्कूलों की संख्या एक दशक पहले के 1.14 लाख से घटकर लगभग 82,000 रह गई है। मिड-डे मील पाने वाले छात्रों की संख्या 2016 के 60 लाख से घटकर 2025 में 37 लाख रह गई। लड़कियों के लिए शुरू हुई साइकिल बांटो योजना के तहत साइकिलों का वितरण 3.29 लाख (2013) से घटकर 1.63 लाख (2025) रह गया। 8,600 से ज्यादा स्कूल एक टीचर के भरोसे हैं और 28,000 से ज्यादा स्कूलों में महज दो टीचर हैं।
17 अगस्त 2026 को जारी केन्द्रीय शिक्षा मंत्रालय की यूडीआईएसई+ 2025-26 रिपोर्ट में मध्य प्रदेश में शिक्षा तक पहुंच और बुनियादी सुविधाओं से जुड़े कई पैमानों पर सुधार की बात कही गई है, लेकिन रिपोर्ट विभाग के अपने ही नामांकन और स्कूल छोड़ने के आंकड़ों से मेल नहीं खाती। संसद के रिकॉर्ड बताते हैं कि राज्य में प्राइमरी और मिडिल स्कूलों में स्कूल छोड़ने की दर 49 प्रतिशत है, जो चिंताजनक है। ‘स्कूल एजुकेशन डेवलपमेंट इंडेक्स’ जैसी मिली-जुली रैंकिंग में मध्य प्रदेश राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों में 28वें स्थान पर है।
बीते दशक में, स्कूली शिक्षा का बजट 16,000 करोड़ रुपये (2016) से बढ़कर 40,000 करोड़ (2026) भले हो गया, दाखिले में भारी गिरावट आई है। स्कूल छोड़ने की दर भी राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है। हैरानी यह कि बजट आवंटन के साथ-साथ आधिकारिक सरकारी साक्षरता दर भी बढ़ती जा रही है!
विधानसभा में सवाल उठने पर सरकारी जवाब था कि छात्र निजी स्कूल जा रहे हैं। यह बताने पर कि निजी स्कूलों में भी ऐसी ही गिरावट है, सरकार ने घटती आबादी पर ठीकरा फोड़ दिया। असलियत का सामना करने से बचने के लिए कुछ भी बहाना बनाना अब आम है।
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