महाराष्ट्र: मराठा आंदोलन पर सीएम और दोनों डिप्टी सीएम के अलग-अलग सुर

महाराष्ट्र सरकार के तीन दिग्गज, मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे, डिप्टी सीएम देवेंद्र फडणवीस और डिप्टी सीएम अजीत पवार, यूं तो अलग-अलग सुर में बोलते हैं, कभी जबरन एक-दूसरे के साथ ठुंसे रहते हैं।

मराठा आरक्षण के मुद्दे पर पिछले साल सितंबर में सीएम एकनाथ शिंदे, डिप्टी सीएम देवेंद्र फडणवीस और अजीत पवार ने प्रेस कांफ्रेंस की थी (फोटो : Getty Images)
मराठा आरक्षण के मुद्दे पर पिछले साल सितंबर में सीएम एकनाथ शिंदे, डिप्टी सीएम देवेंद्र फडणवीस और अजीत पवार ने प्रेस कांफ्रेंस की थी (फोटो : Getty Images)
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सुजाता आनंदन

एक और आंदोलन की बुनियाद

एकनाथ शिंदे सरकार ने मराठा आरक्षण मुद्दे पर खुद को ही घेर लिया लगता है। आरंभ में सरकार ने कहा कि मराठा खुद को 'कुनबी' मान सकते हैं- मराठाओं का एक वर्ग इस रूप में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के तौर पर पहले से ही मान्य है। मराठाओं का एक बड़ा वर्ग अपने को उच्च जाति का 'सवर्ण' मानता है और कुछ तो अपने को शाही वंश का भी मानते हैं। ऐसे लोगों ने सरकार की इस बात का खासा विरोध किया। तब, सरकार को जल्दी ही अपने पैर खींचने पड़े और उसने फैसला किया कि ओबीसी का लाभ चाहने वाले लोग अपने को 'कुनबी' घोषित करें और इस बारे में प्रमाण पत्र हासिल करें।

मुख्यमंत्री शिंदे ने साफ किया कि ऐसे प्रमाण पत्र सिर्फ व्यक्तिगत तौर पर मान्य होंगे, परिवार के सभी सदस्यों के लिए नहीं। इसने ऐसे वर्ग को निराश कर दिया जो दोनों ही चीजें चाहते थे- वे अपनी मराठा पहचान तो बनाए रखना चाहते ही थे (अपने बच्चों के लिए जीवनसाथी पाने के खयाल से), अपनी ओबीसी पहचान भी बनाए रखना चाहते थे (ताकि उन्हें रोजगार और आरक्षण का लाभ मिल सके)।

इस बात से मराठा नेता मनोज जरांगे-पाटिल को मराठाओं को इकट्ठा करने और मुंबई मार्च निकालने का अवसर मिल गया। उन्होंने मराठाओं को बिना शर्त ओबीसी दर्जा देने की मांग की। राज्य सरकार तुरंत झुक गई और ऐसा अध्यादेश जारी किया जिसने मराठाओं को वे सभी लाभ दे दिए जिसके लिए अभी ओबीसी अर्हता रखते हैं- जब तक कि उन्हें अपना कोटा नहीं मिलता है।

इस मसले पर शिंदे अपनी पीठ थपथपा पाते, उससे पहले ही ऐसे पक्षों से विरोध सामने आया जो अनपेक्षित था। अपने को अलग-थलग महसूस कर रहे केंद्रीय मंत्री नारायण राणे ने चेतावनी दी कि अध्यादेश वापस नहीं लिया गया, तो सरकार को बड़े पैमाने पर सामाजिक असंतोष झेलना होगा। शिंदे सरकार में मंत्री छगन भुजबल ने इस मांग का समर्थन किया।

ध्यान रहे, शिंदे, राणे और भुजबल- तीनों ने अपना राजनीतिक कॅरियर बाल ठाकरे की शिव सेना से आरंभ किया था लेकिन ये सभी एक-दूसरे को नापसंद करते हैं। इस बीच उपमुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस ने एक और विवादास्पद घोषणा कर दी। उन्होंने कहा कि सिर्फ प्रमाण पत्र काफी नहीं होगा, सरकार 'कुनबी' होने को लेकर दावे की जांच करेगी। इन सबसे बात घूम-फिरकर वहीं आ गई।

इन सबकी वजह से एक और लंबे आंदोलन की आधारशिला तैयार हो गई है।


व्यंग्य दोहरी तलवार

केंद्री. मंत्री नितिन गडकरी अपनी व्यंग्यात्मक टिप्पणियों के लिए कई बार चर्चा में रहते हैं। देश की स्थितियों को लेकर उन्होंने पिछले साल टिप्पणी की थी कि 'घोड़ों को नहीं मिल रही घास, गधे खा रहे हैं च्यवनप्राश।' हाल में उन्होंने एक पत्रकार की बात पर व्यंग्य कस दिया। पत्रकार ने पूछा था कि क्या प्रेस वालों को हाईवे पर टोल चुकाने पर छूट मिल सकेगी। गडकरी ने इस पर कहा कि 'फोकट क्लास' के लिए कोई जगह नहीं है। इस पर सोशल मीडिया पर उन्हें ध्यान दिलाया गया कि 'फोकट क्लास' में राजनीतिज्ञ और नौकरशाह भी आते हैं।

हाल में वह फिर चर्चा में रहे जब उन्होंने कहा कि समाज में जातिगत भेद पैदा करने वालों को लात मारना चाहिए। वैसे, इस तरह की बात पहले भी करते रहे हैं, पर इस बार गांधीवादी चिंतक रघु ठाकुर की किताब 'गांधी-आम्बेडकरः कितने दूर, कितने पास' की लॉन्चिंग के मौके पर उन्होंने यह कहा। ठाकुर का तर्क है कि लोग जितना सोचते हैं, दोनों में उससे अधिक समानता थी और दोनों जातिविहीन समाज और सबको समान अवसर चाहते थे।

गडकरी ने स्वतंत्रता आंदोलन और स्वदेशी में भागीदारी के लिए गांधी जी को याद किया। उन्होंने कहा कि 'युवा पीढ़ी को लगता है कि गांधी और आम्बेडकर एक-दूसरे के खिलाफ बहुत अधिक विरोधी थे। बहुत कम लोग जानते हैं कि उनके सिद्धांत अधिक मिलते-जुलते थे... मैंने कभी जाति या नस्ल पर यकीन नहीं किया.... जाति के स्तर पर बांटने वाले व्यक्ति की मेरी तरफ से लात मारना चाहिए।' पता नहीं, इसका उनके श्रोताओं ने क्या निहितार्थ निकाला? क्या वह उनलोगों (मराठाओं) को निशाना बना रहे थे जो अलग जाति पहचान के लिए आंदोलन कर रहे हैं?

इतनी चिढ़ क्यों?

लगता है, लात मारने की बात फैशन में आ गई है। मराठी फिल्म हीरो और रियलिटी शो 'बिग बॉस मराठी' के पिछले भाग में लोकप्रिय रहे पुष्कर जोग ने भी उस व्यक्ति को लात मारने की धमकी दी है जो उनकी जाति जानना चाहेंगे।

उन्होंने इन्स्टाग्राम पर पोस्ट कियाः 'कल एक नगरपालिका कर्मचारी ने सर्वे के दौरान मेरी जाति जानने के लिए मुझसे संपर्क किया; अगर वह महिला नहीं होतीं, तो मैंने उन्हें दो लात मार दी होतीं। मैं चेतावनी देता हूं- कृपया भविष्य में मुझसे इस किस्म के सवाल न पूछें, अन्यथा जोग बात नहीं करेगा, सीधे कान के नीचे एक बजा देगा...।'

जोग भी गडकरी की तरह 'उच्च जाति' के ब्राह्मण हैं। उनकी पोस्ट पर मिश्रित प्रतिक्रियाएं आईं। कुछ ने व्यंग्यपूर्वक पूछा कि क्या उन्हें अंदाजा भी है कि जाति के आधार पर लोगों के साथ किस तरह का भेदभाव हो रहा है या उन्होंने देश में जातीय जनगणना की जरूरत समझी भी है। कुछ लोगों का कहना था कि स्त्री-पुरुष के आधार पर नहीं, उन्हें अधिकारी-कर्मचारियों के प्रति अधिक संवेदनशील होना चाहिए क्योंकि वे अपना काम कर रहे हैं।


फिलहाल तो बच गया

नागपुर के पश्चिमी भाग में 200 साल पुराने तालाब को नष्ट करने के प्रयास पर सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार की खिंचाई की है। इसे फुटाला लेक या तेलंखाड़ी लेक कहा जाता है। उच्चतम न्यायालय ने मेट्रो रेल परियोजना से इसे अलग रखने को कहा है।

यह 60 एकड़ में फैला है। यह तीन तरफ से जंगलों से घिरा है। एक तरफ खुली जगह है। इसका निर्माण भोसले राजाओं ने किया था। यह नागपुर के कुछेक जल स्रोतों में से एक है। इसे देश में बड़ी आर्द्रभूमि (वेटलैंड) में गिना जाता है। इसकी लंबे समय से उपेक्षा हो रही है। गणपति और दुर्गा प्रतिमाओं के विसर्जन के लिए इसका उपयोग होता रहा है। महानगरपालिका अब इसका व्यावसायिक उपयोग करना चाहती है और यहां रेस्तरां, दुकानें, रंगीन फव्वारे और मिलने-जुलने की रोमांटिक जगहें बना रही है।

स्वच्छ नागपुर अभियान ने सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में कहा कि तेलंखाड़ी लेक और गार्डन के आसपास के क्षेत्र को केन्द्रीय वन और पर्यावरण मंत्रालय ने आर्द्रभूमि घोषित कर रखा है, फिर भी यहां 7,000 टन कंक्रीट डाल दिया गया है, इसके केन्द्र में स्टील झरना बनाया जा रहा है और 16,000 एकड़ जमीन पर व्यूयर्स गैलरी बनाई जा रही है। कोर्ट ने निर्माण गतिविधियां फिलहाल रोकने को कहा है और जानना चाहा है कि स्थायी निर्माण को कबतक हटा लिया जाएगा।

खुद कोतवाल तो डर कैसा

मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की सरकार में देवेन्द्र फडणवीस के साथ अजीत पवार भी उपमुख्यमंत्री हैं। कार में अधिकतम पांच लोगों के बैठने का नियम है, पर हाल में तीनों ऐसी कार में थे जिसमें छह लोग सवार थे। चालक के साथ शिंदे आगे बैठे थे जबकि फडणवीस और पवार पीछे बैठे थे। इन दोनों के साथ भाजपा प्रदेश अध्यक्ष चंद्रशेखर बावनकुले के साथ फडणवीस के करीबी मंत्री गिरीश महाजन भी थे।

मोटर वाहन नियमों के इस तरह उल्लंघन पर जब बवेला मचा, तो पवार ने कहा कि कार चालक और चार लोगों के साथ निकली, पर पांचवें ने साथ चलने की जिद की, तो वे क्या कर सकते थे? वैसे, इस तर्क ने शायद ही किसी को संतुष्ट किया। राज्य में हर मंत्री के साथ एक नहीं बल्कि आधा दर्जन कार हैं, ऐसे में इनलोगों ने क्यों ऐसा किया, समझ से परे है।

अजीत पवार एक और वजह से चर्चा में हैं। संजय गांधी नेशनल पार्क के निदेशक इसलिए निलंबित कर दिए गए क्योंकि पार्क के कैलेंडर में देवनागरी में पवार के मध्य नाम 'अनंत' की जगह 'आनंद' छप गया। ऐसे हजारों कैलेंडर छपकर बंटने के लिए भेज दिए गए। जब इस बात का पता चला, तो निदेशक ने खेद व्यक्त किया और उन कैलेंडरों को वापस भी ले लिया गया। उनके निलंबन के बाद सोशल मीडिया पर यह व्यंग्य भी चला कि निदेशक वन्यजीव संरक्षक हैं, प्रूफरीडर नहीं। लेकिन उपमुख्यमंत्री के पिता का नाम गलत जाना गंभीर मामला था, यह छोटी-मोटी बात नहीं थी। महाराष्ट्र के लोग नाम के बीच में अपने पिता का नाम लगाते हैं।

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