मालेगांव ब्लास्टः क्या जांच एजेंसियों ने अपनी भूमिका से न्याय किया?

मालेगांव के बाशिंदों, खासकर बम धमाका पीड़ितों के लिए यह दोहरा झटका है। पहले 2008, और अब 2006 बम धमाका मामले में अभियुक्तों को कोर्ट से राहत मिल गई है।

फोटोः सोशल मीडिया
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नंदलाल शर्मा

2006 के मालेगांव बम धमाकों के मामले में अभियुक्त चार लोगों के खिलाफ आरोप तय करने का स्पेशल कोर्ट का आदेश बॉम्बे हाईकोर्ट ने बुधवार, 22 अप्रैल को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि अभियुक्तों के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस श्री चंद्रशेखर और जस्टिस श्याम चंडक की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने यह फैसला चार आरोपियों - मनोहर राम सिंह नरवारिया, राजेंद्र चौधरी, धन शिव सिंह और लोकेश गोपाल किशन शर्मा की ओर से दायर अपीलों पर सुनाया।

मालेगांव के बाशिंदों, खासकर बम धमाका पीड़ितों के लिए यह दोहरा झटका है। पहले 2008, और अब 2006 बम धमाका मामले में अभियुक्तों को कोर्ट से राहत मिल गई है। कोर्ट के फैसले के बाद 2006 के बम धमाके में अपने 8 साल के बेटे आमिर को खोने वाले 54 साल के पान दुकान मालिक मोहम्मद आरिफ ने इंडियन एक्सप्रेस से सवालिया अंदाज में कहा कि 'क्या कभी न्याय होगा। कोर्ट का फैसला सर माथे पर, लेकिन हम न्याय मांगने कहां जाएं।'


दरअसल 2006 और 2008 के बम धमाका मामले में जांच एजेंसियां (महाराष्ट्र एटीएस, एनआईए और सीबीआई) यह साबित नहीं कर पाई हैं कि बेकुसूरों के गुनहगार कौन हैं। किन लोगों ने बम धमाकों को अंजाम दिया?

2006 बम धमाका मामले में स्पेशल कोर्ट ने अपने फैसले में चार अभियुक्तों के खिलाफ गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) कानून (UAPA) और आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत हत्या और आपराधिक साजिश रचने के आरोप तय करने का आदेश दिया था। मगर हाईकोर्ट ने इस आदेश को रद्द कर दिया है। इस सवाल जांच एजेंसियों पर हैं कि क्या उन्होंने अपनी भूमिका के साथ न्याय किया?

द हिंदू के मुताबिक हाईकोर्ट ने कहा कि अभियुक्तों के खिलाफ मुकदमा चलाने के भी पर्याप्त सबूत नहीं है। धमाके की जांच करने वाली दो एजेंसियों (नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी और एंटी टेररिज्म स्क्वॉड) ने एक दूसरे के बिल्कुल उलट दलीलें पेश कीं, और आरोपियों के खिलाफ मामले में विरोधाभास हैं। हालांकि इस मामले की जांच सीबीआई ने भी की थी।

कोर्ट ने कहा कि एनआईए एक्ट के तहत स्पेशल कोर्ट के जज ने सबूतों के मामले में न्यायिक पैमानों को लागू नहीं किया, और उन चीजों (मैटेरियल्स) को सबूत के तौर पर स्वीकार कर लिया, जिन्हें कानून के तहत आरोप तय करने के लिए सबूत नहीं माना जा सकता।


अंतिम चार अभियुक्तों के ‘डिस्चार्ज’ होने के बाद मामले में ट्रायल की प्रक्रिया आभासी तौर पर थम गई है। डिस्चार्ज, आरोप पत्र दाखिल होने के बाद की प्रक्रिया है, जिसमें अदालत आरोप पत्र देखती है और तय करती है कि अभियुक्तों के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त सबूत हैं कि नहीं।

शुक्रवार, 8 सितंबर 2006, को शब ए बरात का मौका था। दोपहर के 1:45 बजे से 2 बजे के बीच मालेगांव स्थित हमीदिया मस्जिद, बड़ा कब्रिस्तान और मुशवरत चौक पर बम धमाके हुए । इन धमाकों में 31 लोगों की मौत हुई और 300 से ज्यादा लोग घायल हुए थे।

मामले की जांच सबसे पहले महाराष्ट्र एंटी टेररिज्म स्क्वॉयड (ATS) को मिली। रिपोर्ट्स के मुताबिक एटीएस ने सबसे पहले आरोप लगाया कि यह धमाका 9 मुस्लिम पुरुषों ने किया, और एजेंसी ने चार्जशीट दाखिल की। फिर आगे की जांच सीबीआई ने की और एक सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल की। 2011 में केंद्र सरकार ने मामले की जांच एनआईए को सौंप दी। जांच एजेंसी ने 2013 में एक सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल की और धमाके का आरोप चार हिंदू पुरुषों (मनोहर राम सिंह नरवारिया, राजेंद्र चौधरी, धन शिव सिंह और लोकेश गोपाल किशन शर्मा) पर लगाया।

इससे पहले नवंबर 2010 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता और स्वघोषित साधु असीमानंद की गिरफ्तारी हुई। मक्का मस्जिद धमाके की जांच के दायरे में आने के अलावा असीमानंद का नाम अजमेर, हैदराबाद और समझौता एक्सप्रेस धमाके में भी अभियुक्त के तौर पर शामिल था। जांच के दौरान असीमानंद ने कहा कि मालेगांव ब्लास्ट (2006) हिंदुओं ने किया था। हालांकि असीमानंद भी बाद में सभी मामलों से बरी हो गए।

द हिंदू के मुताबिक हाईकोर्ट ने कहा कि एनआईए ने मुख्य रूप से अपीलकर्ताओं और असीमानंद के कथित इकबालिया बयानों, साथ ही गवाहों और पूर्व आरोपियों के वापस लिए गए बयानों के आधार पर अपनी कहानी पेश की। अदालत ने पाया कि एनआईए ने ऐसा कार्य किया, जो एक नई जांच के जैसा था, जबकि सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि कानून के तहत इसकी अनुमति नहीं है। एनआईए द्वारा कराई गई टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (TIP) के संबंध में कोर्ट ने कहा कि यह घटना के लगभग छह साल बाद हुई। बेंच ने कहा कि इतनी देरी इस परेड के साक्ष्यात्मक महत्व (प्रोबेटिव वैल्यू) को समाप्त कर देती है।


कोर्ट ने यह भी कहा एटीएस का आरोप था कि बम किसी दूसरे समूह के आरोपियों ने लगाया था, और फॉरेंसिक रिपोर्ट इसका समर्थन करती है, जिसमें विस्फोट स्थल और एक आरोपी से जुड़े गोदाम से आरडीएक्स के निशान मिलने की बात कही गई थी। दूसरी ओर, एनआईए का दावा था कि अपीलकर्ताओं ने साइकिल खरीदी और मध्य प्रदेश के बागली में प्रशिक्षण लेने के बाद विस्फोटक तैयार किए।

हाईकोर्ट ने कहा कि साइकिल की खरीद और घटनास्थल की पहचान से जुड़े जो साक्ष्य एनआईए ने जुटाए हैं, वे अपीलकर्ताओं के खुलासे वाले बयानों पर आधारित हैं। पुलुकुरी कोट्या केस (Pulukuri Kotayya case) का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि किसी वस्तु के पूर्व उपयोग के बारे में जानकारी, कानूनी दृष्टि से किसी तथ्य की खोज (डिस्कवरी) नहीं मानी जाती।

बेंच ने आगे यह भी कहा कि कोई भी गवाह सामने नहीं आया है जिसने यह बताया हो कि उसने आरोपियों में से किसी को विस्फोट स्थल पर देखा था। उनके खिलाफ मामला पूरी तरह कमजोर परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित है, जिसमें सुनी-सुनाई बातें (हियरसे) और बाद में वापस लिए गए बयान शामिल हैं।

अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष के दो विरोधाभासी संस्करणों को आपस में मिलाया नहीं जा सकता। पर्याप्त सामग्री के अभाव में अपीलकर्ताओं को मुकदमे का सामना करने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए।


एनआईए के आरोपपत्र को देखते हुए 2016 में महाराष्ट्र की एक सत्र अदालत ने नौ मुस्लिम पुरुषों को यह कहते हुए डिस्चार्ज कर दिया कि उन्हें "सिर्फ़ शक़ के आधार पर" अभियुक्त बनाया गया था, हालांकि एटीएस ने इन नौ मुस्लिम पुरुषों को डिस्चार्ज किए जाने का विरोध किया, और इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील दायर की, जो अब भी लंबित है।

इस मामले में ट्रायल का सामना करने नुरूल हुदा समसुदोहा ने टाइम्स ऑफ इंडिया से सवालिया अंदाज में कहा कि क्या सरकार चार अभियुक्तों को डिस्चार्ज किए जाने के कोर्ट के फैसले को चैलेंज करेगी। नुरूल ने कहा कि 'कोर्ट ने एनआईए की जांच के आधार पर हम 9 लोगों को क्लीन चिट दी थी। उसी एनआईए ने चार लोगों को गिरफ्तार किया और उनके खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया। अब कोर्ट ने उन चार लोगों को डिस्चार्ज कर दिया है। हम धमाकों में मारे गए लोगों के लिए इंसाफ चाहते हैं।'

इससे पहले 2008 के मालेगांव बम ब्लास्ट केस में भी एक विशेष अदालत ने सभी सात अभियुक्तों को बरी कर दिया था। इनमें भोपाल से पूर्व बीजेपी सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर और लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत पुरोहित शामिल हैं। अदालत ने कहा था कि अभियोजन पक्ष अपना मामला साबित करने में विफल रहा। मामले के अन्य आरोपियों में रमेश उपाध्याय, समीर कुलकर्णी, अजय राहिरकर, सुधाकर द्विवेदी और सुधाकर चतुर्वेदी शामिल थे।


द हिंदू के मुताबिक 31 जुलाई, 2025 को मुंबई स्थित विशेष एनआईए अदालत में विशेष न्यायाधीश ए.के. लाहोटी ने अपना सुनाते हुए कहा कि 'अभियोजन पक्ष कोई ठोस साक्ष्य पेश करने में असफल रहा और उपलब्ध साक्ष्य विरोधाभासों से भरे हुए हैं। इसलिए अदालत को सभी आरोपियों को संदेह का लाभ देना पड़ता है।'

कोर्ट का फैसला आने से पहले प्रज्ञा ठाकुर को बीजेपी ने 2019 के लोकसभा चुनावों में टिकट दिया और भोपाल से जीतकर वह संसद पहुंचीं। चुनाव प्रचार के दौरान प्रज्ञा ठाकुर ने नाथूराम गोडसे को देशभक्त करार दिया था, और जब विपक्ष ने घेरा तो नरेंद्र मोदी ने कहा कि ‘वह बीजेपी की उम्मीदवार प्रज्ञा ठाकुर को दिल से माफ नहीं कर पाएंगे।’

इधर भारतीय सेना ने कर्नल श्रीकांत पुरोहित को ब्रिगेडियर रैंक पर प्रमोशन दिया है। पुरोहित 31 मार्च, 2026 को रिटायर होने वाले थे, लेकिन सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (AFT) ने उनकी प्रमोशन की याचिका पर विचार किया और उनकी रिटायरमेंट पर रोक लगी दी थी। इन सबके बीच मालेगांव बम धमाका पीड़ितों को न्याय का इंतजार है।

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