नफरत के खिलाफ घोषणापत्र: सांप्रदायिक हिंसा के खिलाफ कानून और न्यायाधिकरण बनाने की मांग

लोकसभा चुनावों के मौके पर नफरत के खिलाफ घोषणा पत्र का ऐलान किया गया है। इसमें सांप्रदयिक हिंसा रोकने के लिए प्रभावी कानून और न्यायाधिकरण बनाने की मांग की गई है।

फोटो : नेशनल हेरल्ड
फोटो : नेशनल हेरल्ड
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ऐशलिन मैथ्यू

“हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में कहा था कि देश के अंदर और बाहर भय मौजूद रहना जरूरी है। पीएम ने दोहराया कि भय का बनाना रहना महत्वपूर्ण है। इसके एक दिन बाद पश्चिम बंगाल में बीजेपी नेताओं ने युद्ध की मांग कर दी। यह भय फैलाने की खुली कोशिश है। यह हमलों को जायज ठहराने की कोशिश है।“ यह बात प्रोफेसर और सामाजिक कार्यकर्ता अपूर्वानंद ने कही।

अपूर्वानंद ने यह बात मेनिफेस्टो अगेंस्ट हेट (नफरत के खिलाफ घोषणापत्र) की शुरुआत के लिए हुए कार्यक्रम में कही। यह कार्यक्रम सोमवार 4 मार्च को दिल्ली में युनाइटेड अगेंस्ट के बैनर तले हुआ, जिसमें गज़ाला जमील, उर्मिलेश और संजय हेगड़े ने हिस्सा लिया।

हमलों को जायज़ ठहराने की कोशिशों को रेखांकित करते हुए अपूर्वानंद ने मेघालय के राज्यपाल तथागत रॉय का जिक्र किया जिन्होंने पुलवामा हमले के बाद विवादित बयान दिया था। अपूर्वानंद ने कहा कि, “रॉय ने कश्मीरियों के बहिष्कार का आव्हान किया था। संवैधानिक पद पर बैठा कोई व्यक्ति ऐसा कैसे कर सकता है। कश्मीरी हमारे अपने हैं, उनके खिलाफ कोई ऐसा बयान कैसे दे सकता है।” उन्होंने कहा कि इस पर सवाल उठाने वालों को किसी और नजरिए से देखा जा रहा है।

अपूर्वानमंद ने इस ओर इशारा किया कि राजनीतिक दलों को इन सारे मुद्दों पर आवाज़ उठानी चाहिए। उन्होंने कहा कि, “उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तो नफरत की परिभाषा ही बदल दी है। उन्होंने पुलिस को खुलेआम लोगों को एनकाउंटर में मारने की छूट दे दी है।”

इसी कार्यक्रम मं शामिल मानवाधिकार कार्यकर्ता बनज्योत्सना लाहिरी ने कहा कि, “देश में आज नफरत फैलाने का काम चल रहा है। नफरत फैलाना, धार्मिक अल्पसंख्यकों और दलितों को निशाना बनाना, यह सब व्यवस्थित तरीके से चल रहा है। पुलिस का रवैया भेदभावपूर्ण रहा है। हिंसा फैलाने वालों पर कोई केस दर्ज नहीं होता, बल्कि पीड़ितों पर ही मुकदमे कायम किए जा रहे हैं।”

कार्यक्रम में हिस्सा ले रहे पत्रकार उर्मिलेश ने कहा कि, “सभी समुदायों के बीच एक मित्रता का माहौल होना जरूरी है। नफरत के खिलाफ एक बड़े गठजोड़ की जरूरत है। महाराष्ट्र, झारखंड जैसे राज्यों में दलित और अल्पसंख्यक एक दूसरे के नजदीक आए हैं। हम सबको नफरत के खिलाफ बोलना होगा।”

सेंटर फॉर लॉ एंड गवर्नेंस में असिस्टेंट प्रोफेसर गज़ाला जमील ने कहा कि, “नफरत के खिलाफ यह घोषणापत्र सिर्फ 2019 के चुनाव को लेकर नहीं है, बल्कि इसे आगे लेकर जाना है। जो लोग भी सत्ता में आएंगे हमें उनसे मॉब लिंचिंग के मामलों की जांच कराने की मांग करनी है। ऐसे मामलों के लिए एक स्वतंत्र उच्चाधिकार प्राप्त न्यायिक ट्रिब्युनल की जरूरत है। साथ ही हमें गैरकानूनी गतिविधि निरोधक अधिनियम (यूएपीए) जैसे कानून को खत्म करने की मांग उठानी है।

इस घोषणा पत्र में कहा गया है कि 2014 के बाद से देश में अब तक मॉब लिंचिंग के 122 माले समाने आए हैं, और इनमें से 60 फीसदी में पीड़ित मुस्लिम ही हैं।

घोषणा पत्र में नागरिकता कानून को वापस लेने, धार्मिक अल्पसंख्यक (अत्याचार निरोधक) कानून बनाने, सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन के मुताबिक लिंचिंग रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाने और कानून बनाने, सांप्रदायिकता और लक्ष्य आधारित हिंसा रोकने का कानून बनाने और भेदभाव विरोध कानून बनाने की मांग की गई है।

यूनाइटेड अगेंस्ट हेट का बुनियाद 2017 में पड़ी थी जब देश में अल्पसंख्यकों और दलितों के खिलाफ मॉब लिंचिंग और सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं में लगातार इजाफा हो रहा था।

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