मणिपुर: कब और कैसे खत्म होगा संघर्ष? दो आवाजें, दो समाधान

पूर्वोत्तर के इस संवेदनशील सीमांत राज्य में हिंसा और अविश्वास की गहरी खाई पाटने के लिए दो विरोधी पक्षों के दो बिल्कुल अलग रास्ते हैं।

फाइल फोटो (Getty Images)
i

मणिपुर के हालात पर प्रधानमंत्री और केन्द्रीय गृह मंत्री की चुप्पी हैरान करने वाली है। नई दिल्ली में कुछ का मानना है कि भारतीय सेना महज़ कुछ हफ्तों में शांति बहाल कर सकती है। उन्हें यह ख़ामोशी समझ नहीं आती। इस बीच, केन्द्र के रवैये से निराश मणिपुरी नेता खूनी टकराव ख़त्म करने के अलग-अलग उपाय सुझा रहे हैं।

विधानसभा में रखी गई मणिपुर गृह विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक, सितंबर 2026 तक 28,899 आंतरिक रूप से विस्थापित लोग राहत शिविरों और अस्थायी ठिकानों में रहने को मजबूर हैं। अगस्त-सितंबर में हथियारबंद गिरोहों द्वारा आम नागरिकों पर हमलों में तेजी आई है।

अगस्त-सितंबर 2026 के 30 दिनों में सुनियोजित हमलों में पहाड़ी जिलों के 23 लोग मारे गए, जिससे ग्रामीणों को धान के खेतों और जंगलों में शरण लेनी पड़ी। मैतेई और कुकी दोनों ही नई दिल्ली के रवैये से उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। 

मैतेई समुदाय का मानना है कि मैतेई-बहुल इंफाल घाटी में हालात सुधरे हैं और अब अशांति केवल नगा और कुकी आबादी वाले पहाड़ी इलाकों तक सीमित है। वहीं, कुकी समुदाय का आरोप है कि मैतेई और नगा उनके खिलाफ एकजुट हो चुके हैं। दूसरी ओर, कुकी समुदाय के साथ साझा भूगोल और ईसाई धर्म साझा करने वाले नगा अपने नफ़ा'-नुक़सान का आकलन करते हुए फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं।

मैतेई सिविल सोसाइटी के प्रमुख संगठनों के साझा मोर्चे ‘कोऑर्डिनेटिंग कमेटी ऑन मणिपुर इंटीग्रिटी’ के प्रवक्ता मयंगबाम धनंजय ने सवाल किया: ‘अफस्पा लागू होने के बावजूद पहाड़ियों में हिंसा फिर भड़क उठी है। कुकी हथियारबंद समूहों के साथ हुआ ऑपरेशन निलंबन समझौता पहाड़ियों में सख्ती से लागू क्यों नहीं किया जा रहा है?’

सौरभ सेन ने इस अंतहीन टकराव पर दोनों पक्षों का नजरिया समझने के लिए ‘मैतेई लीपुन’ के प्रमोत सिंह और ‘कुकी इनपी मणिपुर’ के प्रवक्ता पाओलियनलाल हाओकिप से बातचीत की।

ड्रग्स वॉर और म्यांमार असली जड़ 

कट्टरपंथी मैतेई नेता और ‘मैतेई लीपुन’ से जुड़े प्रमोत सिंह अपने संगठन को मैतेई संस्कृति और विरासत का रक्षक बताते हैं, जबकि कुकी इसे आरएसएस से जुड़ा उग्रवादी संगठन करार देते हैं। प्रमोत का मानना है कि मोदी राज्य के संकट को सुलझाने में इसलिए दिलचस्पी नहीं दिखा रहे, क्योंकि म्यांमार के प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जे को लेकर अमेरिका और चीन आमने-सामने हैं; ऐसे में मोदी का कोई भी सीधा दखल मामले को और उलझा सकता है।  बातचीत के संपादित अंश:

जातीय टकराव नहीं, ड्रग्स सिंडिकेट की जंग 

मणिपुर में जारी हिंसा दरअसल तस्करों द्वारा भड़काया गया ‘ड्रग्स वॉर’ है, जिसे जातीय संघर्ष का रूप दिया जा रहा है। सभी बड़े ड्रग माफिया ताकतवर सियासी ओहदों पर काबिज हैं। 2006 में यूएनडीपी समर्थित अपने शोध कार्य के दौरान मैंने पाया था कि नेताओं, अराजक तत्वों और सुरक्षा बलों के संरक्षण में चलने वाले सिंडिकेट भारत-म्यांमार सीमा पर मानव, नशीले पदार्थों और हथियारों की तस्करी रैकेट चला रहे हैं।


कुकियों को साधने में सरकार नाकाम

कुकी समूहों के साथ ऑपरेशन निलंबन समझौते को रद्द करने के लिए विधानसभा में दो प्रस्ताव पारित किए जा चुके हैं। लेकिन कोई सुनने को तैयार नहीं। हाल ही में मेरी भेंट विहिप के एक नेता से हुई, जिन्होंने मुझसे कहा कि हिंसा में नष्ट हुए मंदिरों के पुनर्निर्माण में कुकी सहयोग करेंगे। अगर ऐसा है, तो केन्द्र सरकार कुकी हथियारबंद गुटों को मैतेई समुदाय को परेशान न करने की हिदायत क्यों नहीं दे सकती? स्थानीय भाजपा कहती है कि समझौता कांग्रेस लाई थी। तो भाजपा सरकार इसे खत्म क्यों नहीं कर देती? किसी को- यहां तक कि राज्य सरकार को भी नहीं पता कि बंद कमरों में इस त्रिपक्षीय समझौते की मियाद बढ़ाने का फैसला किसने लिया। 

प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप से संकट भू-राजनीतिक रूप ले सकता है

अमेरिका पूरे इलाके में दिलचस्पी ले रहा है ताकि वह म्यांमार के ऊर्जा और अहम खनिज संसाधनों पर चीन का कब्जा रोक सके। यही उन तमाम कारणों में से एक है जिसके चलते मोदी मणिपुर पर खामोश हैं। एक संवेदनशील सीमावर्ती इलाके में उनका सीधा दखल इस टकराव को अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीतिक पेचीदगियों में उलझा सकता है, जो अब तक स्थानीय स्तर तक सीमित रहा है।

बंटवारा समाधान नहीं

कुकी होमलैंड परियोजना में कुकी पारंपरिक कानून ही सर्वोपरि होंगे। इसी तरह ‘नागालिम’ में तमाम सामाजिक व्यवस्थाएं नगा पारंपरिक कानूनों के अधीन होंगी। मणिपुर की परंपरा सामुदायिक सह-अस्तित्व और परस्पर सम्मान की रही है। हमारे पुरखों ने ऐसे ही इस सरजमीं की हिफाजत की। मणिपुर ऐसे ही बचा रह सकता है। कुकी होमलैंड की अवधारणा कामयाब नहीं हो सकती क्योंकि मैतेई, नगा और अन्य इसके लिए राजी नहीं होंगे। नागालिम भी लागू नहीं हो सकता क्योंकि मैतेई, कुकी और अन्य समुदाय इसे स्वीकार नहीं करेंगे।

राज्य के तीन हिस्से हों: हाओकिप

चुराचांदपुर जिले के साइकोट विधानसभा क्षेत्र से भाजपा विधायक और कुकी शीर्ष संस्था ‘कुकी इनपी मणिपुर’ के प्रवक्ता पाओलियनलाल हाओकिप का मानना है कि मणिपुर को मैतेई, नगा और कुकियों के लिए विभाजन ही स्थायी हल है। उनका सुझाव है कि भारत को म्यांमार में सैन्य हस्तक्षेप करके सीमा पार कुकी व नगा-बहुल क्षेत्रों को मिला लेना चाहिए।

पहाड़ी लोगों को एकजुट होना होगा

प्रधानमंत्री समेत पूरी केन्द्र सरकार मणिपुर पर खामोश है। हालांकि, जब तक मणिपुर के पहाड़ी लोगों को विकास के भेदभाव से बचाने वाला कोई ठोस राजनीतिक समाधान नहीं निकलता, स्थायी शांति मुमकिन नहीं। नगाओं का एक तबका भले मैतेई-कुकी टकराव का फायदा उठाने की फिराक में हो, लेकिन ‘समझदार’ नगा महसूस करते हैं कि आदिवासी पहाड़ी समुदाय को सुरक्षित बस्तियों में एक साथ होना चाहिए, ताकि मैतेई उनके आंतरिक मामलों में दखल न दे सकें। मणिपुर को तीन हिस्सों में बांटना ही रास्ता है। संभव है कि साल भर कुछ अशांति रहे, लेकिन म्यांमार की सीमा से सटे इस संवेदनशील राज्य में यह मसला हमेशा के लिए सुलझ जाएगा।


आक्रामक हो विदेश नीति 

म्यांमार के सागाइंग डिवीजन में नगा और कुकी समुदाय की बड़ी आबादी रहती है। वे सैन्य शासन के खिलाफ हैं। भारत को अपनी सीमाओं के विस्तार पर विचार करना चाहिए। म्यांमार निस्संदेह ऐसे किसी भी कदम का पुरजोर विरोध करेगा, लेकिन अगर हम दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दावा करते हैं, तो हमें सागाइंग के लोगों की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं का समर्थन करना चाहिए। जब बात पड़ोस की आती है, तो भारत की विदेश नीति आधी-अधूरी नजर आती है।

(सौरभ सेन कोलकाता में रहने वाले लेखक व पत्रकार हैं)

प्रिय पाठकों हमारे टेलीग्राम (Telegram) चैनल @navjivanindia से जुड़िए और पल-पल की ताज़ा खबरें पाइए