किसानों पर दोहरी मार: सभी किस्म की खाद की कीमतों में 60 फीसदी तक की बढ़ोत्तरी, 1200 वाला डीएपी का बैग अब 1900 का

किसानों पर दोहरी मार पड़ी है। डीज़ल की कीमतों में लगातार बढ़ोत्तरी के बाद इफको ने सभी किस्म की खाद के दामों में जबरदस्त बढ़ोत्तरी की है। यह बढ़ोत्तरी 60 फीसदी तक है। हालांकि इफको ने कहा है कि पुराना स्टॉर पुराने दाम पर ही बेचा जाएगा।

फोटो : सोशल मीडिया
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नवजीवन डेस्क

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव और केंद्र सरकार के कृषि कानूनों के खिलाफ जारी किसानों के आंदोलन के बीच देश की सबसे बड़ी खाद कंपनी इफको ने खाद के दामों में जबरदस्त बढ़ोत्तरी कर दी है। पहले डीएपी (सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली खाद) का 50 किलो का बैग 1200 रुपए में मिलता था, अब 1900 रूपए में मिलेगा। इसके अलावा इफको ने अन्य खादों के दाम में भी करीब 58 फीसदी की बढ़ोत्तरी की है। इनमें एनपीकेएस (नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश और सल्फर वाली खाद के दामों में भी इजाफा हुआ है। पहले 1175 रुपए में मिलने वाला नाइट्रोजन का बैग ब 1775 रुपए में मिलेगा, फॉस्फोरस का बैग जो पहले 1185 रुपए में मिलता ता अब 1800 रुपए में मिलेगा, पोटाश का बैग जो पहले 925 रुपए का था अब 1350 रुपए का मिलेगा। बढ़े हुए दाम पहली अप्रैल से लागू हो गए हैं।

इंडियन एक्स्प्रेस की एक खबर के मुताबिक इफको के प्रवक्ता ने कहा है कि गैर-यूरिया खाद के दाम पहले से डी-कंट्रोल हैं यानी इनके दाम बाजार भाव के हिसाब से तय होते हैं। प्रवक्ता ने कहा कि दामों में इन बढ़ोत्तरी का किसी राजनीतिक दल या सरकार से लेना देना नहीं है।

बताया जाता है कि खाद के दामों में की गई यह बढ़ोत्तरी हाल के दिनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद के दामों में आई तेजी के कारण हुई है। अक्टूबर में डीएपी के दाम 400 डॉलर प्रति टन थे जो बढ़कर 540 डॉलर प्रति टन हो गए हैं। इसी तरह अमोनिया और सल्फर के दामों में भी बढ़ोत्तरी हुई है।

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हालांकि इफको ने इस पर सफाई देते हुए कहा है कि बढ़े हुए दाम सिर्फ नए स्टॉक पर लागू होंगे और किसानों को पुराना स्टॉक पुरानी कीमतों पर ही मिलता रहेगा। इफको के सीईओ एस यू अवस्थी ने ट्वीट कर कहा है कि इफको के पास अभी 11.26 लाख मीट्रिक टन पुराना स्टॉक है जो पुराने दाम पर ही किसानों को दिया जाएगा। नए दामों की खाद फिलहाल बिक्री के लिए नहीं है।

पेट्रोल-डीज़ल के दामों के बीच ही खाद के दामों में बढ़ोत्तरी का सीधा असर कृषि क्षेत्र पर पड़ेगा और इसके राजनीतिक प्रभाव भी होंगे। ध्यान रहे कि भले ही चार राज्यों में विधानसभा चुनाव पूरे हो चुके हैं, लेकिन पश्चिम बंगाल में अभी कई दौर का मतदान बाकी है। इधर यह भी संभावना है कि गेंहू की कटाई और गन्ने की बुआई के बाद मोदी सरकार के कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों का आंदोलन फिर से तेजी पकड़ेगा।

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