मीडिया बनाम यूट्यूब शिक्षक : आपका ही गिरेबां आपको दिखाया…तो बुरा मान गए

नीट पेपर लीक और सीबीएसई 12वीं की गड़बड़ी पर देशभर में फैले गुस्से से साबित हो गया कि मुख्यधारा मीडिया पर युवाओं का भरोसा टूट चुका है। इसी बीच ऑनलाइन शिक्षकों और टीवी एंकरों के बीच जैसी जंग छिड़ी, उसमें बहस का सिरा कहीं और जाता दिखा।

एआई निर्मित सांकेतिक तस्वीर
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2016 के भारत में रातों-रात हुई नोटबंदी का वह वीडियो आज भी सोशल मीडिया पर घूमता रहता है, जिसमें एक टीवी एंकर का दावा है कि ‘नए जारी नोटों में नैनोचिप’ लगी हैं, जिन्हें सैटेलाइट से ट्रैक किया जा सकता है और जिसके जरिये छिपाकर रखे गए कैश का पता लगाया जा सकता है। दावे प्राइम-टाइम के अन्य कई एंकरों ने भी ऐसे ही किए थे। खबर भले ही झूठी थी, लेकिन उस मीडिया संस्कृति की पहचान बन गई जो सत्ता के सामने सच बोलने के बजाय गलत जानकारी फैलाता था।  

लगभग एक दशक बाद, मई 2025 में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान, मुख्यधारा के टीवी चैनल गिरावट की नई हदें पार करते दिखे। कई जाने-माने एंकरों का ऑन-एयर दावा था कि भारतीय नौसेना ने कराची बंदरगाह पर हमला किया है। फैक्ट-चेक पोर्टल ‘ऑल्टन्यूज’ ने इसे उसी तरह झूठा, निराधार और प्रोपेगैंडा प्रेरित बताया, जैसा चैनलों की ‘रिपोर्टिंग’ में आमतौर पर होता है।

यह दो घटनाएं पुष्टि करती हैं कि नरेन्द्र मोदी काल में टेलीविजन पत्रकारिता किस कदर मजाक बनकर रह गई है। इससे समझा जा सकता है कि आखिर क्यों युवा पीढ़ी सूचना, समसामयिक मुद्दों, शिक्षा बल्कि हर सही बात जानने के लिए अन्य जगहों का रुख कर रही है।

मुख्यधारा की मीडिया पर युवा भरोसा किस कदर टूटा है, मई 2026 में खुलकर सामने आ गया। नीट पेपर लीक कांड और सीबीएसई क्लास 12 की ऑनलाइन मार्किंग में हुई गड़बड़ी को लेकर देशभर में गुस्सा फैल गया। छात्रों ने शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांगा। सरकार और मुख्यधारा का मीडिया इसे नजरंदाज करते दिखे, लेकिन इसी बीच एक निजी टीवी चैनल की जानी-मानी महिला एंकर और कोचिंग टीचरों के बीच सोशल मीडिया पर जंग छिड़ गई। एंकर ने टीचरों को ‘बेकार और मामूली लोग’ कहा था। 

अब यह मामला दिल्ली हाईकोर्ट में है, जहां उस टीवी नेटवर्क और एंकर ने खान सर, अभिनय शर्मा, बबीता त्यागी और अन्य टीचरों पर दो करोड़ रुपये का मानहानि का मुकदमा किया है। सारी शुरुआत 31 मई को हुई जब X पर अपनी एक पोस्ट में अंजना ओम कश्यप ने ‘सेलिब्रिटी टीचर्स’ पर ‘कोचिंग माफिया’ होने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि ये लोग खुद को जनता का हितैषी बताते हैं, लेकिन असल में छात्रों और उनके माता-पिता का शोषण करते हैं।

ऑनलाइन पढ़ाने वाले शिक्षकों ने तत्काल इस पर प्रतिक्रिया दी। सबसे आगे अभिनय शर्मा थे जो एसएससी की तैयारी करने वाले बच्चों को गणित पढ़ाते हैं (जिनके यूट्यूब पर 30 लाख से ज्यादा सब्सक्राइबर हैं)। लाखों लोगों द्वारा देखे गए लाइवस्ट्रीम में, शर्मा ने ‘गोदी मीडिया’ की आलोचना की कि वह सत्ता में बैठे लोगों से सवाल पूछने के बजाय उन्हें बचाने का काम करता है।


पटना के ‘खान ग्लोबल स्टडीज’ के ‘खान सर’ नाम से चर्चित फैसल खान (61 लाख से ज्यादा सब्सक्राइबर) और सोनीपत की बबीता त्यागी भी उनके साथ आ गए। बबीता ‘आईसीएस कोचिंग सेंटर’ में छात्रों को यूपीएससी और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करवाती हैं (यूट्यूब पर उनके 37 लाख से ज्यादा सब्सक्राइबर हैं)। 1 जून के वीडियो पोस्ट में उन्होंने कहा: “हमारे प्राइम-टाइम न्यूज में ऐसी खबरें होती हैं कि झालमुड़ी में कैसा तेल इस्तेमाल होता है और इसकी महक कैसी होती है।”

महिला एंकर की अन्य रिपोर्टों के हवाले से हुए बबीता ने कहा: “उन्होंने एक बार बांग्लादेश की एक भैंस की तुलना डॉनल्ड ट्रंप से की थी, क्योंकि भैंस का नाम डॉनल्ड ट्रंप रखा गया था। किसी ने उसे इसलिए खरीद लिया, कि उसे काटा न जाए। हमारे देश में पत्रकारिता का अब यही स्तर है।" जल्द ही, देशभर में शिक्षक पूछने लगे: मीडिया नीट पेपर लीक पर बात क्यों नहीं करता? मोदी सरकार की जवाबदेही पर सवाल क्यों नहीं पूछता?

यह सब तब हो रहा था, जब माहौल राजनीतिक रूप से गरम था। राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्ष ‘नीट’ पर शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांग रहा था। पेपर लीक के साथ, भर्ती और प्रवेश परीक्षाओं में गड़बड़ियों को लेकर प्रयागराज जैसे शहरों में छात्र विरोध-प्रदर्शन कर रहे थे। लेकिन इनपर ध्यान देने के बजाय, निशाना शिक्षकों को बनाया जा रहा था?

बबीता ने पूछा कि नीति-निर्माताओं को प्रभावित करने का दावा करने वाला  मीडिया, स्कूलों और परीक्षा प्रणालियों में सुधार पर जोर क्यों नहीं देता? “एक बार पेपर लीक हुआ, तो क्या उससे सबक नहीं लेना था? वही ‘गलती’ बार-बार क्यों होती है?” उनके अनुसार, जब शिक्षक छात्र-अधिकारों और संस्थागत विफलताओं पर मुखर होकर सवाल उठाने लगे, तो उन्हें निशाना बनाया गया।

‘खान सर’ के एक छात्र आफताब कहते हैं, “कॉम्पिटिटिव एग्जाम की तैयारी करने वाले छात्र राजनीतिक रूप से जागरूक होते हैं। हम संविधान, इतिहास और करंट अफेयर्स पढ़ते हैं। पता है कि ‘गोदी मीडिया’ भाजपा सरकार का बचाव करता है। लेकिन जब हमारे हितों पर असर पड़ता है, तो लगता है कि मीडिया हमारे लिए आवाज नहीं उठा रहा। हम पर मनोवैज्ञानिक असर पड़ता है। हमें कोई भविष्य नजर नहीं आता।" वह आगे कहते हैं: “टीचर तब मैदान में उतरे, जब उनके छात्रों की परेशानी बहुत ज्यादा बढ़ गई।"

वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ कलहंस मानते हैं कि ऑनलाइन पढ़ाने वाले लोग भले ही पेशेवर पत्रकार न हों, उनकी बातों की यूं ही अनदेखी नहीं हो सकती। ये ऐसे सार्वजनिक लोग हैं, जिनका लाखों छात्रों से सीधा जुड़ाव है। वे अगर पत्रकारिता के तौर-तरीकों पर सवाल उठाते हैं, तो बदले की भावना वाली प्रतिक्रिया के बजाय संवाद होना चाहिए।


इन शिक्षकों के आगे बढ़ने में देश, खासकर छोटे कस्बों और ग्रामीण इलाकों में सस्ते इंटरनेट के तेज फैलाव की बड़ी भूमिका रही है। वे रूढ़ अर्थों वाले शिक्षक नहीं रह गए हैं, इन्फ्लुएंसर और राय बनाने में भी उनकी बड़ी भूमिका हैं। ऑनलाइन दुनिया में ‘अवस्थी सर’ के नाम से चर्चित अंकित अवस्थी ऐसे ही शिक्षक हैं। आईआईटी ग्रेजुएट और राजस्थान प्रशासनिक सेवा के लिए चयनित अंकित का अपना यूट्यूब चैनल है, जिसकी पहुंच 58 लाख से ज्यादा छात्रों तक है। अंकित अपने चैनल पर शैक्षिक सामग्री के साथ-साथ सम-सामयिक मुद्दों, सार्वजनिक नीतियों पर भी बात करते हैं।

कोविड-19 के बाद यह इकोसिस्टम बदला। महामारी पूर्व भारत के कोचिंग उद्योग में ‘फिजिकल क्लासरूम’ का बोलबाला था। लॉकडाउन में पढ़ाई-लिखाई ऑनलाइन हुई, और जो शिक्षक डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिये अच्छे से बात कर सकते थे, उनके तमाम चाहने वाले बन गए। कई शिक्षक पढ़ाई-लिखाई से हटकर अन्य मुद्दों पर भी भरोसेमंद आवाज बन गए।

‘खान सर’ का सफर इस बदलाव का बेहतरीन उदाहरण है। शुरुआत में ऑफलाइन पढ़ाने वाले खान महामारी के दौरान मशहूर हुए। पढ़ाने का उनका ‘गंवई’ अंदाज छात्रों को खूब भाया। एल्गोरिदम के असर में जैसे-जैसे उनका कंटेंट पहुंचा, दर्शक तेजी से बढ़े। फीस भी कम थी। (खान ग्लोबल स्टडीज यूट्यूब मेंबरशिप 59 रुपये प्रति महीना है। मोबाइल ऐप भी है।) जाहिर है, कम आय वाले परिवारों को खान सर भाए और अपनाए गए।

आफताब बताते हैं कि उन्होंने खान सर के ऑफलाइन कोचिंग प्रोग्राम से बीपीएससी परीक्षा की तैयारी की, जिसके लिए सिर्फ 2,600 रुपये दिए (दूसरे कोचिंग सेंटर 20,000 रुपये लेते हैं)। उन्हें तीन महीने पढ़ाई के साथ  इंस्टिट्यूट की टेस्ट सीरीज का फ्री एक्सेस भी मिला। उनका कहना है कि ऑनलाइन और ऑफलाइन कोचिंग फीस कम हुई, तो खान सर का बड़ा हाथ है। तीन साल पहले, कोचिंग सेंटर रिकॉर्डेड लेक्चर के लिए भी 8,000 से 10,000 रुपये लेते थे। आज, महंगाई के बावजूद, रिकॉर्डेड कोर्स लगभग 2,000 रुपये में मिल जाते हैं। कंटेंट अच्छा है, फीस कम है और टीचर भी अच्छे से पढ़ाते हैं।

आफताब कहते हैं, “खान सर के पढ़ाने का तरीका इतना आसान है कि एक रिक्शा चलाने वाला भी उसे समझ सकता है। जैसे, जब वह ईरान-इराक युद्ध के बारे में बताते हैं, तो ऐसे समझाते हैं मानो दो पड़ोसी लड़ रहे हों। बातों में भोजपुरी भी रहती है। बात करते हैं, तो लगता है जैसे कोई बड़ा भाई बोल रहा हो।”

आज उनके पास प्राइवेट बॉडीगार्ड हैं, तमाम चाहने वाले हैं। मीडिया का भी खासा ध्यान रहता है। हाल ही में कोचिंग इंस्टिट्यूट के बाहर हुई गोलीबारी के बाद, खान सर मुख्यधारा की सुर्खियों में फैसल खान के तौर पर सामने आए। कई बार बिना सोचे-समझे कुछ भी बोलने या महिलाओं को लेकर मजाक की आदत पर उनकी आलोचना भी हुई, जो उचित ही है।

छात्र अरुण पांडे कहते हैं: “यह तो सारे ही टीचर करते हैं, ताकि माहौल हल्का-फुल्का बना रहे... कुछ लोगों को यह अच्छा नहीं लगता, लेकिन कुछ इसे नजरअंदाज भी करते हैं। ...एक घंटे के वीडियो में, संभव है कि सामाजिक या राजनीतिक मुद्दों पर कुछ मिनट की ही बात हो। लेकिन जब आपके पास 300 वीडियो हों, तो हर वीडियो से ऐसा एक हिस्सा लेने पर भी 300 अलग-अलग क्लिप बन जाते हैं।”


खान ग्लोबल स्टडीज की ऑफलाइन स्टूडेंट काजल कुमारी इसे अलग नजरिये से देखती हैं: “इसमें कुछ भी अजीब या असहज नहीं है। वह समय-समय पर ऐसी बातें करते रहते हैं ताकि बच्चे बोर न हों।” काजल 15,000 रुपये की फीस देकर बीपीएससी प्रीलिम्स, मेन्स और इंटरव्यू की तैयारी कर रही हैं। उनके पास कई विकल्प हैं; वह बिहार पुलिस, पैरामेडिकल और फायरफाइटिंग सेवाओं के साथ-साथ बिहार विधान परिषद में एक पद के लिए पहले ही चुनी जा चुकी हैं। वह तल्खी से कहती हैं: “मीडिया अपना काम ठीक से कर रहा होता, तो वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में उसकी रैंकिंग 157वीं नहीं होती।”

ऐसी प्रतिक्रिया की असल वजह शायद यह भी हो कि पहली बार, केन्द्र सरकार की नाकामियां मुख्यधारा के मीडिया के बजाय सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिये उनतक पहुंच रही हैं जो इससे प्रभावित हैं।

इस टकराव से उठा सवाल बहुत सीधा-सादा है: मुख्यधारा का मीडिया अपनी ‘वॉचडॉग’ (निगरानी करने वाली) वाली भूमिका लगातार और ईमानदारी से निभाता, तो क्या ये कोचिंग टीचर और यूट्यूबर उसके सबसे प्रभावशाली आलोचक बन पाते? बेशक, छात्र तब भी उनकी क्लास में जाते और उनके लेक्चर देखते। लेकिन किसने सोचा होगा कि एक दिन वे मुख्यधारा के मीडिया को उसकी जिम्मेदारियों की याद दिलाएंगे, और उसकी पत्रकारिता का ‘पोस्टमॉर्टम’ करेंगे?

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