तेल पर टैक्स का खेल: आपकी जेब में सेंध लगाकर अर्थव्यवस्था की खस्ता हालत छिपाने की कोशिश कर रही सरकार

मोदी सरकार ने अपने अब तक के कार्यकाल के दौरान तेल पर टैक्स को कमाई के बड़े साधन के तौर पर देखा है। कच्चे तेल की कीमतें गिरने पर खुद को नसीब वाला कहने वाले पीएम ने यह फायदा आपको देने के बजाय सरकारी खजाना भरने की ऐसी मुहिम शुरु की, जिससे आज तेल कीमतों में न बुझने वाली आग लग चुकी है।

फोटो : सोशल मीडिया
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नवजीवन डेस्क

सरकारों का काम तो टैक्स से मिले पैसे से ही चलता है। लेकिन इसकी भी एक सीमा होती है। जब टैक्स जरूरत से ज्यादा हो जाता है तो वही जनता नाकों चने चबाने पर मजबूर हो जाती है जिसके हित की दुहाई देते हुए सरकारें टैक्स लगाती हैं। हमारे यहां पेट्रोलियम उत्पादों पर कर के मामले में ऐसा ही हो रहा है। इन पर भारी-भरकम टैक्स लगाकर सरकारें तो अपने लिए पैसे का इंतजाम कर ले रही हैं लेकिन इसका खामियाजा आम लोगों को भुगतना पड़ रहा है। ढुलाई महंगी हो गई है और इसका असर जीवन के हर पहलू पर पड़ रहा है। छोटे काम-धंधों के लिए तो अपना अस्तित्व बचाना भी मुश्किल हो रहा है।

भारत की तुलना में ब्रिटेन और फ्रांस की प्रति व्यक्ति जीडीपी बेशक करीब 20 गुना अधिक हो लेकिन पेट्रोल के मामले में हम उनके बराबर ही टैक्स दे रहे हैं। इन देशों के लोगों की आय हमसे कहीं अधिक है और पेट्रोल पर वे अपनी आय का जितना हिस्सा टैक्स के रूप में सरकार को दे रहे हैं, उसकी तुलना में हम अपनी आय का ज्यादा बड़ा हिस्सा पेट्रो-टैक्स के तौर पर दे रहे हैं।

पेट्रोलियम उत्पादों पर ऊंचे टैक्स का यह दौर कोविड के दौर में आपातकालीन कदम के तौर पर शुरू हुआ क्योंकि हर स्रोत से टैक्स की आमदनी एकदम घट गई थी। तब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत काफी कम हो गई थी और नतीजतन तेल कंपनियां मोटा मुनाफा कमा रही थीं। इसी से प्रेरित होकर सरकार ने पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क यानी एक्साइज ड्यूटी में प्रति लीटर 13 और डीजल में 16 रुपये की वृद्धि कर दी।

तेल पर टैक्स का खेल: आपकी जेब में सेंध लगाकर अर्थव्यवस्था की खस्ता हालत छिपाने की कोशिश कर रही सरकार
TASLEEM KHAN

एक साल के दौरान इस वृद्धि के कारण लोगों की जेब से अतिरिक्त 2.25 लाख करोड़ रुपये निकल जाने का अनुमान है। इस दौरान सरकार और तेल कंपनियों ने रोजाना करीब 730 करोड़ रुपये बनाए। ब्लूमबर्ग इंटेलिजेंस के एक अध्ययन के मुताबिक, इसका मतलब यह हुआ कि रोजाना हर भारतीय ने 5 रुपये अतिरिक्त कर दिया। ऐसे में अगर आप एक किसान हैं और आपके परिवार में चार सदस्य हैं तो आपको प्रधानमंत्री किसान योजना के तहत मिला तो 500 रुपये प्रतिमाह लेकिन आपसे सरकार ने 600 रुपये से अधिक सिर्फ अतिरिक्त पेट्रो-टैक्स के तौर पर वापस ले लिया।

जो कदम तेल बेचने वाली कंपनियों के आसमानी मुनाफे को कम करने के लिए उठाया गया था, वह अंततः आम लोगों पर अतिरिक्त बोझ के तौर पर सामने आया क्योंकि तेल के रिटेल मूल्य में प्रति लीटर करीब 20 रुपये की वृद्धि हो गई। सरकार चाहे तो बड़े आराम से पेट्रोल-डीजल की कीमत में 10 रुपये प्रति लीटर की कमी कर सकती है लेकिन वह ऐसा करेगी नहीं क्योंकि इससे यह बात साफ हो जाएगी कि हमारी अर्थव्यवस्था कितनी खस्ताहाल है।

सरकार दावा कर रही है कि अर्थव्यवस्था कोविड के साये से बाहर आ चुकी है और सब कुछ सामान्य हो रहा है लेकिन यह सच्चाई नहीं। अभी इस वित्त वर्ष के समाप्त होने में करीब एक माह का समय है और सरकार चाहती है कि वित्तीय घाटा कम-से-कम रहे और संभवतः इसी कारण वह इस समय टैक्स में कमी नहीं करना चाह रही है।


इसे ऐसे समझा जा सकता है। कोविड ने 2020-21 के लिए सरकार को अपने कर संग्रह के लक्ष्य को लगभग 12 प्रतिशत घटाकर 21.6 लाख करोड़ रुपये से 19 लाख करोड़ रुपये करने के लिए मजबूर कर दिया। इसी दौरान पेट्रोल और डीजल से होने वाले कर संग्रह में 48% की भारी वृद्धि हुई और यह वक्त था अप्रैल से नवंबर, 2020 का। सरकार ने बजट में अनुमान जताया है कि 2021-22 में कर संग्रह 16.7 प्रतिशत बढ़कर 22.2 खरब हो सकता है और उस आंकड़े को पाने के लिए सरकार कर कटौती में जल्दी कोई फैसला करने से परहेज ही करेगी। संक्षेप में कहें तो सरकार या तो कॉर्पोरेट और व्यक्तिगत आय में नाटकीय इजाफे की उम्मीद कर रही है या फिर वह पेट्रोलियम उत्पादों पर ऊंचे कर को जारी रखते हुए अपनी कमाई बनाए रखना चाहती है।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का कहना है कि तेल कंपनियां कीमतें तय करती हैं, न कि सरकार। लेकिन यह केवल आंशिक रूप से सही है। कारण यह है कि कीमतें ज्यादा इसलिए हैं कि कर बेहद ज्यादा हैं। तेल कंपनियां केवल इसलिए कीमतें बढ़ा रही हैं क्योंकि कच्चे तेल की कीमतें बढ़ रही हैं लेकिन यह वृद्धि उतनी अधिक नहीं। पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में तब तक कमी नहीं आएगी जब तक कि करों में कमी न हो।

हालांकि, जड़ की बात यह नहीं कि आज क्या हो रहा है। मुद्दे की बात तो यह है कि बीजेपी सरकार ने अब तक के अपने छह साल के कार्यकाल के दौरान पेट्रो उत्पादों पर कर को कमाई के बड़े साधन के तौर पर देखा है। मनमोहन सरकार के कार्यकाल के अंतिम कुछ वर्षों के दौरान अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर थी लेकिन बीजेपी सरकार के सत्ता में आने के कुछ ही माह बाद यह एकदम से नीचे आ गई। सरकार ने कर की दरें बढ़ाईं और फरवरी, 2015 में दिल्ली की एक चुनावी रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस संदर्भ में खुद को ’नसीब वाला’ भी कहा।

इसमें दो राय नहीं कि मोदी सरकार के दोनों कार्यकाल के दौरान ज्यादातर समय तक कच्चे तेल की कीमतें नरम ही रहीं और सरकार ने इसका भरपूर फायदा उठाते हुए अतिरिक्त कमाई के लिए पेट्रोलियम उत्पादों पर उत्पाद शुल्क में वृद्धि का सिलसिला बनाए रखा। नवंबर, 2014 से जनवरी, 2016 के बीच उत्पाद शुल्क में सात गुना बढ़ोतरी की गई जिससे प्रति लीटर पेट्रोल की कीमत 6.53 रुपये बढ़ गई। इस संदर्भ में जरूरी है कि हम इस बात पर गौर करें कि मई, 2014 में हालात कैसे थे। मई 2014 में बेस प्राइस और ढुलाई की लागत 47.2 रुपये प्रति लीटर, केंद्रीय कर 10.39 रुपये, दिल्ली में राज्य का कर 11.9 रुपये और डीलर का कमीशन 2 रुपये प्रति लीटर था। उसी साल पेट्रोल की कीमत में तेल की कीमत दो तिहाई थी जब राज्य और केंद्रीय कर लगभग 32% और डीलर कमीशन लगभग 3% कर दिया गया था।

लेकिन फरवरी, 2021 में इसमें बड़ा अंतर आ चुका है। आज बिक्री की कीमत में तेल की कीमत 36% है जबकि केंद्रीय कर 37% हो गया है और राज्य तथा केंद्रीय कर मिलाकर 60% हो गया है। सबसे बड़ी बात यह है कि तब के मुकाबले अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत में 32% की कमी आई है लेकिन 2014 में कर की प्रभावी दर 47% से बढ़कर अब 167% हो गई है।


पेट्रोलियम उत्पादों पर मनमाने कर की यह हालत ऐसे समय है जब मध्यम वर्ग कोविड महामारी के प्रभाव से बड़ी ही मुश्किल से उबरने की कोशिश कर रहा है और महामारी की दूसरी लहर लोगों को डरा रही है। महामारी के दौरान बेरोजगारी का आंकड़ा 23% तक पहुंच गया था और बेरोजगारों की इस विशाल फौज में से बड़ी संख्या ऐसे लोगों की रहने वाली है जिन्हें आने वाले कुछ समय और काम-धाम मिलने से रहा क्योंकि महामारी ने खास तौर पर अर्थव्यवस्था और मध्यम वर्ग की कमर तोड़कर रख दी है। सेंटर फॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) की जुलाई, 2020 की रिपोर्ट के मुताबिक, मध्यम आय वर्ग में भी खास तौर पर उन लोगों पर ज्यादा असर हुआ जिनकी आय कुछ अधिक थी। इसकी वजह यह थी कि उनके पास खोने के लिए काफी कुछ था।

अब सवाल प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों का है और कायदे की बात तो यह है कि सरकारों को आय पर कर लगाना चाहिए, न कि उपभोग पर क्योंकि ऐसी व्यवस्था के कारण अमीर वर्ग बहुत कम कर देता है जबकि मजदूर वर्ग दैनिक उपयोग की वस्तुओं पर भी अत्यधिक करों का भुगतान करता है। मोटे तौर पर यह ट्रेंड रहा है कि प्रत्यक्ष कर संग्रह अनुमान से कम रह जाता है जबकि अप्रत्यक्ष कर अनुमान से अधिक। मार्च, 2020 में इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, 2019-20 के अप्रैल- फरवरी के दौरान प्रत्यक्ष कर संग्रह में 3.5 प्रतिशत की कमी आई जबकि इसी अवधि में अप्रत्यक्ष कर 3.8 प्रतिशत बढ़ा। इकोनॉमिक टाइम्स का आकलन है कि 2020-21 में स्थिति और खराब होने की उम्मीद है क्योंकि इस दौरान कुल कर संग्रह में अप्रत्यक्ष करों का हिस्सा बढ़कर 56 प्रतिशत हो जाने वाला है जो एक दशक में सबसे अधिक होगा। वहीं, प्रत्यक्ष कर संग्रह में 26-27 प्रतिशत की तेज गिरावट आने वाली है। इन अप्रत्यक्ष करों का एक बड़ा हिस्सा पेट्रोलियम उत्पादों पर करों से ही तो आ रहा है।

अच्छी सरकार वह होती है जो आपके अधिक कमाने का इंतजार करती है क्योंकि जब आप अधिक कमाएंगे तो टैक्स भी अधिक देंगे। एक बुरी सरकार आप जो भी उपभोग करते हैं, उस पर भारी टैक्स लगाती है, भले ही इससे खपत और आर्थिक वृद्धि धीमी पड़ जाए। मोटे तौर पर मोदी सरकार यही कर रही है। जैसे ही अर्थव्यवस्था में सुधार का हल्का भी संकेत दिखता है, सरकार उस पर चढ़ाई कर देती है। कर विभाग फूल के खिलने के पहले ही उसका रस निचोड़ने के लिए कमर कस लेते हैं।

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