आर्थिक बदहाली में खर्च चलाने के लिए लाभ वाली सरकारी कंपनियां चहेते उद्योग समूहों को बेचने की तैयारी में मोदी सरकार

केंद्र की मोदी सरकार अपने विनिवेश लक्ष्य की पूर्ति के लिए मुनाफे वाली सरकारी कंपनियों को निजी हाथों में सौंप रही है। इसमें भी सरकार अपने चहेते उद्योग समूहों का खास ध्यान रख रही है, वहीं घाटे वाली पीएसयू सरकारी कंपनियों के हिस्से में आ रही हैं।

फोटो : सोशल मीडिया
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एस राहुल

जब हमारी आर्थिक हालत अच्छी होती है तो हम अपने घर का कबाड़ बेचते हैं, लेकिन जब हम मुसीबत में होते हैं तो घर का सोना बेचते हैं। सरकार अपनी कंपनियों (पीएसयू) के रूप में यही सोना बेचने जा रही है। लेकिन पहली बार इसमें हर स्तर पर झोलझाल है। एक तो, जो पीएसयू अच्छी खासी कमाई कर रहे हैं, उन पर कमजोर पीएसयू को खरीदने का दबाव बनाया जा रहा है। जबकि सरकार मुनाफे वाले पीएसयू अपने चहेते उद्योग समूहों को बेचने की तैयारी में है।

नवंबर के तीसरे हफ्ते में नरेंद्र मोदी सरकार ने पांच पीएसयू के विनिवेश का निर्णय लिया है। इनमें भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड, शिपिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड, कंटेनर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड, टिहरी हाइड्रो डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड (टीएचडीसी) और नॉर्थ इस्टर्न इलेक्ट्रिक पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (निपको) शामिल हैं। दिलचस्प बात है कि मंत्रिमंडल बैठक में पहले ही तय कर लिया गया कि टीएचडीसी और निपको तो एनटीपीसी लिमिटेड खरीद लेगी, बाकी तीन कंपनियों का रणनीतिक विनिवेश किया जाएगा।

उच्च स्तरीय सूत्रों का दावा है कि शेष तीन कंपनियों (पीएसयू) की बिडिंग शर्तों में स्पष्ट तौर पर उल्लेख होगा कि कोई सरकारी कंपनी बिडिंग में हिस्सा नहीं ले सकेंगी। इसलिए यह समझना जरूरी है कि इसके पीछे सरकार की मंशा क्या है? इसे समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि देश के कौन से ऐसे कारोबारी हैं जो पहले से पेट्रो और शिपिंग कारोबार से जुड़े हुए हैं?

अडानी समूह से मोदी सरकार और बीजेपी के कर्ताधर्ताओं से रिश्ते छिपे नहीं हैं। पोर्ट सेक्टर पर इस समूह का बोलबाला है। एक और पीएसयू है, नवरत्न श्रेणी की कंटेनर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (कॉनकोर)। यह रेलवे मंत्रालय के अधीन है और देश के सात इनलैंड कंटेनर डिपो को ऑपरेट करता है। माना जा रहा है कि अडानी समूह की नजर इस पीएसयू पर भी है। अभी कॉनकोर में भारत सरकार की हिस्सेदारी 54.8 फीसदी है। इसमें से 30 फीसदी हिस्सा बेचने का निर्णय सरकार ले चुकी है। लेकिन कॉनकोर इंडिया उन पीएसयू में से है जिससे सरकार को अच्छा खासा मुनाफा मिल रहा है।

वित्त वर्ष 2018-19 की आखिरी तिमाही में कोनकोर ने 352 करोड़ रुपये का मुनाफा कमाया था जबकि पिछले साल की इसी तिमाही में उसे 292 करोड़ रुपये का मुनाफा हुआ था। इसलिए यह मानना बिल्कुल दुरुस्त है कि इस तरह अपने घर रखे सोनो को सरकार दूसरे को देने जा रही है।

नरेंद्र मोदी सरकार ने ड्रेजिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया से अपनी 73.44 फीसदी हिस्सेदारी को बेचने का भी निर्णय लिया है। इस कंपनी के पास विशाखापट्टनम पोर्ट ट्रस्ट, पारादीप पोर्ट ट्रस्ट, जवाहर लाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट और कांडला पोर्ट ट्रस्ट हैं। उच्च स्तरीय जानकार बताते हैं कि यह कंपनी भी अडानी समूह की पसंदीदा है। इसके जरिये अडानी समूह अपने पोर्ट बिजनेस को बड़ा कर सकता है। अपनी हिस्सेदारी को बढ़ाने के लिए पिछले दिनों गौतम अडानी ग्रुप कृष्णपट्टनम पोर्ट कंपनी लिमिटेड (केपीसीएल) की 72 फीसदी हिस्सेदारी 5500 करोड़ में खरीदने की तैयारी कर चुका है।

अब चूंकि सरकार मेहरबान है तो अडानी ग्रुप के लिए सब कुछ मुमकिन है। इसका छोटा-सा उदाहरण देखिए। अगस्त, 2019 में भारतीय नौसेना ने सबमरीन (पनडुब्बी) प्रोजेक्ट के लिए टेंडर जारी किए। अडानी ग्रुप ने लगभग आखिरी समय में 45000 करोड़ के इस प्रोजेक्ट के लिए टेंडर भर दिया जबकि अडानी के पास अपना कोई शिपयार्ड नहीं है। बावजूद इसके टेंडर इसलिए भरा गया क्योंकि अडानी की मंशा हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड के साथ मिलकर एक स्पेशल परपज व्हीकल (ज्वाइंट वेंचर कंपनी) बनाने की है। हिंदुस्तान शिपयार्ड कंपनी को सबमरीन की रिपेयर और ओवरहॉलिंग का अनुभव है। हिंदुस्तान शिपयार्ड उन पीएसयू में शामिल है जिसमें से सरकार अपनी हिस्सेदारी बेचने जा रही है।

डिफेन्स सेक्टर की एक और पीएसयू है- गार्डन रिच शिप बिल्डर्स एंड इंजीनियरिंग लिमिटेड। इसमें भी भारत सरकार अपने हिस्से की लगभग 25.5 फीसदी हिस्सेदारी बेचने का प्रयास कर रही है। अगर यह हिस्सा भी अडानी समूह खरीद लेता है तो शिपिंग और डिफेंस सेक्टर में गौतम अडानी का रुतबा और बढ़ जाएगा। यह भी ध्यान में रखने की बात है कि अडानी समूह सरकार के सामरिक साझेदारी मॉडल के तहत तीन बड़ी रक्षा खरीद योजनाओं में शामिल हो चुका है और डिफेन्स सेक्टर की बड़ी कंपनी के रूप में अपनी पहचान बना रहा है और भविष्य में फाइटर जेट, नेवल हेलिकॉप्टर्स और पनडुब्बी का निर्माण भी करेगा। अगर पेट्रोलियम सेक्टर की बात की जाए तो हाल ही में मुकेश अंबानी के नेतृत्व वाला रिलायंस समूह दुनिया की छठे नंबर की सबसे बड़ी तेल कंपनी बन गई है। ऐसी स्थिति में यदि आने वाले दिनों में भारत पेट्रोलियम को रिलायंस खरीद ले तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

अपना खर्च चलाने की जुगत

दरअसल, नरेंद्र मोदी सरकार पीएसयू से अपनी हिस्सेदारी बेचकर अपना खर्च चलाना चाहती है। साल 2018-19 में सरकार ने विनिवेश के नाम पर लगभग 80 हजार करोड़ रुपये इकट्ठा करने का दावा किया है जबकि 2019-20 के बजट में 1 लाख करोड़ रुपये का लक्ष्य रखा गया है। यहां उल्लेखनीय यह है कि केवल दो समूहों को छोड़ कर बाकी उद्योग समूह पीएसयू खरीदने में खास रुचि नहीं दिखा रहे हैं। इस वजह से एयर इंडिया अब तक नहीं बिक पाया है। लेकिन अपना लक्ष्य हासिल करने के लिए एक पीएसयू पर दूसरे पीएसयू को खरीदने के लिए दबाव बनाया जा रहा है। ऐसी ही डील हिंदुस्तान पेट्रोलियम और ओएनजीसी के बीच हुई। एचपीसीएल से सरकार की हिस्सेदारी ओएनजीसी ने खरीद ली और 36,915 करोड़ रुपये चुकाए। ये पैसे सरकार के पास आए लेकिन इस डील से ओएनजीसी की हालत बिगड़ गई।

ऐसी ही डील पावर फाइनेंस कॉरपोरेशन और रूरल इलेक्ट्रिफिकेशन कॉरपोरेशन के बीच हुई। आरईसी ने पीएफसी की हिस्सेदारी खरीदी और इससे सरकार को 14,499 करोड़ रुपये मिल गए। इसी तरह एचएससीसी इंडिया लिमिटेड से सरकार की 100 फीसदी हिस्सेदारी एनबीसीसी लिमिटेड ने खरीदी। तो एनपीसीसी इंडिया लिमिटेड से वापकोस लिमिटेड ने सरकार की हिस्सेदारी खरीद ली। इस तरह एक पीएसयू से दूसरे पीएसयू को खरीदने से सरकार का लक्ष्य तो पूरा हो रहा है लेकिन इस तरह कमजोर पीएसयू को खरीदने से ताकतवार पीएसयू की हालत जरूर खराब हो रही है।

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