मोदी सरकार की ‘समुद्र मंथन’ योजना का मकसद अडानी समूह को लाभ पहुंचाना, तुरंत रद्द की जाएः कांग्रेस

कांग्रेस ने सवाल किया कि इस राष्ट्रीय मिशन में ओएनजीसी को प्राथमिक भूमिका क्यों नहीं दी जा रही है? मोदी सरकार एक निजी कंपनी को लाभ पहुंचाने के लिए अपनी ही ओएनजीसी के हितों को क्यों नुकसान पहुंचा रही है, जिसके पास तेल खोज का दशकों का अनुभव है?

मोदी सरकार की ‘समुद्र मंथन’ योजना का मकसद अडानी समूह को लाभ पहुंचाना, तुरंत रद्द की जाएः कांग्रेस
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कांग्रेस नेता शक्तिसिंह गोहिल ने सोमवार को आरोप लगाया कि मोदी सरकार की ‘समुद्र मंथन’ योजना अडानी समूह को फायदा पहुंचाने के लिए शुरू की गई है। उन्होंने यह भी कहा कि इस योजना को रद्द किया जाए या इसके लिए आवंटित पूरी राशि सरकारी क्षेत्र की ऊर्जा कंपनी ओएनजीसी को हस्तांतरित कर रोजगार सृजन एवं तेल-गैस की खोज में इस्तेमाल की जाए।

समुद्र मंथन के जरिये अडानी को सहायता

कांग्रेस प्रवक्ता शक्तिसिंह गोहिल ने दिल्ली में एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता वाले केंद्रीय मंत्रिमंडल ने पिछले महीने ‘समुद्र मंथन’ योजना को मंजूरी दी और इसके पहले चरण के लिए 84,084 करोड़ रुपये का ‘बड़ा’ आवंटन किया। उन्होंने आरोप लगाया, ‘‘नरेन्द्र मोदी सरकार ने ऐसा ढांचा तैयार किया है, जिसके तहत ‘समुद्र मंथन योजना’ के माध्यम से अडानी को सहायता दी जाएगी।’’

योजना में सरकार 50 प्रतिशत तक सहायता देगी

शक्ति सिंह गोहिल ने आरोप लगाया कि ‘समुद्र मंथन’ योजना गौतम अडानी और वेल्सपन समूह की संयुक्त कंपनी एडब्ल्यूईएल को सुविधा देने के लिए है। उन्होंने कहा कि इस योजना के तहत सरकार 50 प्रतिशत तक वित्तीय सहायता देगी। गोहिल के अनुसार, सरकार ने स्वीकार किया है कि इस योजना की शुरुआत हाइड्रोकार्बन क्षेत्र में खोज के जोखिम को कम करने और निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए की गई है।


संयुक्त कंपनी में अडानी की 65 प्रतिशत हिस्सेदारी

कांग्रेस नेता ने उन्होंने कहा, ‘‘सरकार ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि इस योजना को गौतम अडानी को लाभ पहुंचाने के लिए तैयार किया गया है।’’ कांग्रेस नेता ने दावा किया कि यह योजना विशेष रूप से अडानी समूह को लाभ पहुंचाने के लिए बनाई गई है। उन्होंने कहा कि अडानी की, इस संयुक्त कंपनी में 65 प्रतिशत हिस्सेदारी है, जिसे उन्होंने 2005 में खरीदा था, जबकि शेष 35 प्रतिशत हिस्सेदारी वेल्सपन समूह के पास है।

गोहिल का कहना है कि तेल की खोज बेहद महंगा कारोबार है और औसतन एक गहरे समुद्र के कुएं की खोज में ही 1,100 करोड़ रुपये से अधिक की लागत आती है। उन्होंने दावा किया कि अब एडब्ल्यूईएल केंद्र सरकार के धन और पाइपलाइन सहित सभी सरकारी संसाधनों तक पहुंच के साथ अपनी कारोबारी गतिविधियां शुरू कर सकती है।

ओएनजीसी के हितों को नुकसान क्यों

गोहिल ने सवाल किया, ‘‘इस राष्ट्रीय मिशन में ओएनजीसी को प्राथमिक भूमिका क्यों नहीं दी जा रही है? मोदी सरकार एक निजी कंपनी को लाभ पहुंचाने के लिए अपनी ही ओएनजीसी के हितों को क्यों नुकसान पहुंचा रही है, जिसके पास तेल खोज का दशकों का अनुभव है?’’ उन्होंने कहा, ‘‘हम मांग करते हैं कि ‘समुद्र मंथन’ योजना को रद्द किया जाए या 84,084 करोड़ रुपये की पूरी राशि सरकार की अपनी सार्वजनिक क्षेत्र की ऊर्जा कंपनी ओएनजीसी को हस्तांतरित की जाए, ताकि रोजगार पैदा किए जा सकें और खोज गतिविधियों को बढ़ावा दिया जा सके।’’

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