मोदी सरकार का ‘उपवास’: क्या मीडिया और जनता समझेगी बीजेपी का यह ‘उपहास’ !

प्रधानमंत्री और उनके मंत्रिमंडलीय सहयोगी और बीजेपी-एनडीएके सांसद आज उपवास रखेंगे। उपवास कथित तौर पर विपक्ष द्वारा संसद में गतिरोधपैदा करने के विरोध में रखा जा रहा है। क्या उपहास को समझेगी जनता?<b></b>

फोटो सोशल मीडिया
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नवजीवन डेस्क

बजट सत्र के दूसरे चरण में जब संसद में गतिरोध बन रहा था तो प्रधानमंत्री ने इसमें दखल नहीं दिया। आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग पर जब टीडीपी सांसद और कावेरी प्रबंधन बोर्ड बनाने की मांग पर एआईडीएमके सांसद संसद में हंगामा कर रहे थे, तो भी प्रधानमंत्री ने इन सांसदों से बात करने की जहमत नहीं उठाई। सर्वदलीय प्रतनिधिमंडल उनसे मिलना चाहता था, लेकिन उन्होंने मिलने से इनकार कर दिया।

ये सब करने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उपवास आज उपवास रखेंगे, और विपक्ष पर दोष मढ़ रहे हैं कि उसने संसद नहीं चलने दी। क्या मीडिया प्रधानमंत्री मोदी के इस उपवास रूपी ढोंग को बेनकाब करेगा?

वरिष्ठ पत्रकार मानिनी चटर्जा ने ‘द टेलीग्राफ’ में लिखा है कि, “सरकार भले ही विपक्ष पर कितना भी दोषारोपण करे, लेकिन हर सांसद और हर वह शख्स जिसने संसद की कार्यवाही दीर्घा से देखी है, जानता है कि 5 मार्च से 6 अप्रैल तक चला यह सत्र सत्तारुढ़ दल ने नहीं चलने दिया, क्योंकि सत्ताधारी पार्टी इस सरकार के खिलाफ आए अविश्वास प्रस्ताव का सामना करने से डर रही थी।”

उन्होंने आगे लिखा है कि, “लगातार व्यवधान को होने देने और उसे उकसाने के पीछे सरकार की मंशा सिर्फ अविश्वास प्रस्ताव से पैदा राजनीतिक संकट से बचने की रही। लेकिन ऐसा करने सरकार ने अपने खुद पर और अपने नेताओं पर भी विश्वास न होने का पक्का सबूत सबके सामने पेश कर दिया। सरकार का यह कृत्य उसका कार्यकाल पूरा होने तक उसे बार-बार शर्मिंदा करता रहेगा।”

सरकार ने मार्च में तीन सप्ताह तक संसद नहीं चलने दी, वजह यही थी कि राज्यसभा में ऐसे मुद्दों पर चर्चा होनी थी, जिन्हें लेकर सरकार राजनीतिक तौर पर असहज थी और लोकसभा में उसे अविश्वास का सामना करना पड़ता। सरकार ने ऐसा करने लोकसभा स्पीकर और राज्यसभा के सभापति दोनों ही पदों की गरिमा पर बट्टा लगा दिया। सरकार भले ही संसद के गतिरोध का ठीकरा विपक्ष के सिर फोड़कर उपवास पर जा रही हो, लेकिन उसने लोकसभा और लोकसभा स्पीकर को उपहास का पात्र बना दिया जब लगातार 22 दिनों तक लोकसभा स्पीकर 50 सदस्यों की गिनती नहीं कर पाईं। हर दिन उनके सामने कम से कम 100 सांसद खड़े होते थे, कई बार हाथों में तख्तियां लेकर, ताकि स्पीकर का ध्यान उनकी तरफ जाए, लेकिन वे इन्हें नहीं देख पाईं।

राज्यसभा के सांसद डेरेक ओ ब्रायन ने सरकार द्वारा प्रायोजित व्यवधान करार दिया तो कांग्रेस के जयराम रमेश ने इसे सरकार का संगठिक व्यवधान की संज्ञा दी। ‘द हिंदू’ को दिए एक इंटरव्यू में जयराम रमेश ने कहा कि, “मुझे सबसे ज्यादा हैरानी इस बात पर हुई कि राज्यसभा में यह सब प्रधानमंत्री की मौजूदगी में हुआ। उन्हें खड़े होकर सांसदों से बोलना चाहिए था, कि आइए मेरे कमरे में बैठकर बात करते हैं।” लेकिन प्रधानमंत्री ने ऐसा कुछ भी नहीं किया।

संसदीय कार्यमंत्री अनंत कुमार ने यह कहकर आग में घी का काम किया कि संसद में गतिरोध के लिए सोनिया गांधी और राहुल गांधी जिम्मेदार हैं। नतीजतन सोनिया गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे ने उनके इस बयान को ‘झूठ’ करार दिया। यह स्पष्ट है कि जब टीडीपी और एआईएडीएमके के सांसद हंगामा करते हुए स्पीकर के वैल में आते थे, तो सोनिया और राहुल दोनों ही अपनी सीट पर बैठे होते थे।

लेकिन नरेंद्र मोदी की नाटकीयता की पराकाष्ठा तो बुधवार शाम को नजर आई, जब उन्होंने कहा कि, “वह लोग 2014 में सत्ता हासिल नहीं कर सके, वे नहीं चाहते कि देश आगे बढ़े। उन्होंने संसद का काम एक दिन भी नहीं चलने दिया। इन्होंने लोकतंत्र की हत्या की है। उनके अपराध को उजागर करने के लिए हम उपवास रखेंगे। मैं भी उपवास रखूंगा, लेकिन मैं अपना काम करता रहूंगा।”

तो, प्रधानमंत्री और उनके मंत्री, जिन्होंने दलितों पर बढ़ते अत्याचार, कठुआ में बलात्कार और हत्या, प्रधानंत्री का नाम लिखकर आत्महत्या करने वाले किसान की मौत, पीएनबी घोटाला, नीरव मोदी या सीबीएसई और एसएससी पेपर लीक पर न तो कोई ट्वीट किया और न कोई उपवास रखा, गुरुवार को किसी दुख या किसी का अपराध छिपाने के लिए नहीं बल्कि राजनीतिक स्टंट से अपनी गलती छिपाने के लिए उपवास रखेंगे।

दरअसल विश्लेषक तो साफ कहते हैं कि प्रधानमंत्री संसद में भी गुजरात विधानसभा का गुजरात मॉडल अपना रहे हैं। उनके कार्यकाल में गुजरात विधानसभा की कार्यवाही देश में सबसे कम रही थी। उनके कार्यकाल में करीब 90 फीसदी बिल बिना किसी बहस के पेश होने के दिन ही पास होते रहे। बाकी दस फीसदी तीन दिन में, वह भी बिना किसी बहस के पास हुए।

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