धीमी पड़ी मानसून की रफ्तार: सात दिन बाद देगा दस्तक, 10 फीसदी कम होगी बारिश, अल-नीनो कर रहा कमजोर
मौसम विभाग का आंकलन है कि भूमध्यरेखीय प्रशांत क्षेत्र में तटस्थ स्थितियां अल-नीनो में बदल रही हैं। जून तक अल नीनो की स्थितियों की संभावना बढ़कर 82 प्रतिशत हो जाएगी, और जुलाई-अगस्त तक यह 90 फीसदी से ऊपर पहुंच सकती है।

देश में मानसून की रफ्तार धीमी पड़ गई है और इसके केरल पहुंचने में करीब एक सप्ताह की देरी हो सकती है। इस बीच मौसम विभाग ने सामान्य से कम बारिश की आशंका जताई है। वहीं, अल-नीनो का असर बढ़ने से खरीफ फसलों पर खतरा मंडरा रहा है।
मौसम विभाग ने शुक्रवार को बताया कि मानसून पिछले पांच दिनों से श्रीलंका के तटवर्ती क्षेत्र में अटका हुआ है। केरलम तट से 30-35 किमी दूर अटके मानसून के दो-तीन दिन आगे बढ़ने की उम्मीद नहीं है। यही नहीं, इस बार सामान्य से 10 फीसदी कम बारिश हो सकती है। मौसम विभाग ने दक्षिण-पश्चिम मानसून पर जारी दूसरे दीर्घकालिक अनुमान में बताया कि इस बार 90 फीसदी बारिश हो सकती है। इसमें चार फीसदी की मॉडल त्रुटि हो सकती है। यानी यह चार फीसदी ज्यादा या चार फीसदी कम हो सकती है।
मौसम विज्ञान के महानिदेशक डॉ. मृत्युंजय महापात्र ने जून-सितंबर मानसून के लिए दूसरे चरण का अपडेट देते हुए यह जानकारी दी। 13 अप्रैल को कुल वर्षा दीर्घकालिक औसत का 92 प्रतिशत होने का अनुमान जताया गया था। संशोधित आकलन के अनुसार, सामान्य से कम या अल्पवर्षा वाले मानसून की संभावना 84 प्रतिशत तक पहुंच गई है। जून से सितंबर तक पूर्वोत्तर को छोड़कर देश के अधिकांश हिस्सों में सामान्य से कम वर्षा हो सकती है, जिसका असर कृषि, जल संसाधनों और जनजीवन पर पड़ने की आशंका है।
अल-नीनो का असर
मौसम विभाग का आंकलन है कि भूमध्यरेखीय प्रशांत क्षेत्र में तटस्थ स्थितियां अल-नीनो में बदल रही हैं। जून तक अल नीनो की स्थितियों की संभावना बढ़कर 82 प्रतिशत हो जाएगी, और जुलाई-अगस्त तक यह 90 फीसदी से ऊपर पहुंच सकती है।
इस बीच उत्तर-पश्चिम और पूर्वी भारत में आंधी-तूफान और गरज-चमक के साथ हुई भारी बारिश ने कहर बरपाया है। उत्तर प्रदेश में 28 और बिहार व बंगाल में 16 लोगों की जान चली गई। वहीं बंगाल में सात लोगों की मौत की खबर है।
मौसम विभाग के अनुसार, जून में बारिश 92 प्रतिशत से कम रह सकती है। इसका मतलब है कि मानसून की शुरुआत से ही कई क्षेत्रों में बारिश की कमी महसूस की जा सकती है। खरीफ सीजन की बुआई पर इसका सीधा असर पड़ने की आशंका है। विशेष रूप से धान, मक्का और सोयाबीन जैसी फसलों की शुरुआती खेती बारिश कम होने से प्रभावित हो सकती है।
इसी बीच राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने देश में प्रचंड गर्मी और लू के संकट पर कड़ा रुख अपनाते हुए केंद्र और राज्य सरकारों को नोटिस जारी कर तत्काल कार्ययोजना पेश करने का निर्देश दिया है। एनजीटी की प्रधान पीठ ने स्वतः संज्ञान लेते हुए कहा, लू देश की सबसे कम पहचानी गई पर्यावरणीय आपदाओं में से एक बनती जा रही है। एनजीटी के अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव और विशेषज्ञ सदस्य डॉ अफरोज अहमद की पीठ ने कहा- गर्मी के प्रभाव अक्सर अन्य आपदाओं की तरह नजर नहीं आते। यह देश की सबसे उपेक्षित आपदा बनी हुई है।
यूपी के बांदा में पारा 48 डिग्री पहुंच गया। दिल्ली सहित कई राज्य भीषण लू की चपेट में हैं। इससे लोगों की सेहत कृषि, उत्पादकता और अर्थव्यवस्था पर विनाशकारी प्रभाव पड़ रहा है। पीठ ने इसे पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत गंभीर मुद्दा माना है।
एनजीटी ने कहा, क्षेत्र-विशिष्ट या माइक्रो-प्लानिंग की सख्त जरूरत है। ट्रिब्यूनल ने उच्चस्तरीय तापमान मैपिंग, रिमोट सेंसिंग और बेहतर मौसम पूर्वानुमान प्रणालियों के उपयोग का सुझाव दिया है। एनजीटी ने पर्यावरण एवं जल शक्ति मंत्रालय और उत्तर प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली, गुजरात, पंजाब, उत्तराखंड से 18 अगस्त से पहले जवाब मांगा है।
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