शिव 'सेनाओं' के युद्ध के लिए तैयार मुंबई: कल होने वाली दशहरा रैलियों के लिए दोनों सेनाएं मोर्चे पर तैनात

अब 12 घंटे से भी कम समय रह गया है शिवसेना के दोनों गुटों की रैलियों में और मायानगरी में रैलियों की हलचल और शोर-शराबा नजर आने लगा है। माना जा रहा है कि इन रैलियों की गर्जना से शिवसेना पर आधिपत्य का भी निर्णय हो जाएगा।

सौजन्य : @ShiSena
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सुजाता आनंदन

शिवसेना के शुरुआती दिनों में जब भी बाल ठाकरे को कोई जनसभा करनी होती और हजारों लोगों को लामबंद करना होता, तो वे अपनी राजनीतिक-व्यंग्यात्मक कार्टून पत्रिका ‘मार्मिक’ में एक छोटा सा नोटिस छाप देते कि फलां तारीख को फलां जगह पर सभा होनी है।

देखते-देखते यह सूचना एक दूसरे से बड़े पैमाने पर फैल जाती और बाल ठाकरे तय वक्त पर अपनी कार में बैठकर वहां पहुंचते और सभा को संबोधित करते थे। ठाकरे की शब्दकला ऐसी थी कि बाद में तो उन्हें सभा की सूचना न तो ‘मार्मिक’ में और न ही शिवसेना के मुखपत्र ‘सामना’ में छापने की जरूरत पड़ती थी। तय समय पर हजारों लोग जमा हो जाते थे, खासतौर से विजयादशमी की रैली में, जहां बाल ठाकरे एक विशेष अंदाज़ में लोगों को संबोधित करते थे।

बदलते वक्त के साथ शिवसेना के लिए भी काफी कुछ बदल गया है। तेजी से फैलती तकनीक के चलते सूचनाओं पर ध्यान जमा रहने की अवधि कम हुई है और कोई भी सूचनाओं को अब उस तरह नहीं पड़ता। बाल ठाकरे के उत्तेजक और उकसाऊ भाषण भी अब अतीत की बात हो गए हैं और पार्टी का नेतृत्व भी पहले के मुकाबले कहीं अधिक सौम्य और मृदु है। इसलिए शुरुआती हिचक के बाद शिवसेना ने भी तकनीक का इस्तेमाल शुरु कर दिया और अपने सामाजिक समारोहों और राजनीतिक रैलियों के लिए वह केवल ‘सामना’ के पाठकों पर ही निर्भर नहीं रह गई।

शिवसेना ने शुरुआत में गांवों आदि में ऑडियो टेप के जरिए सूचना देना शुरु किया, लेकिन अब शिवसेना सोशल मीडिया पर बाकायदा वीडियो अपलोड करती है। इस साल की दशहरा रैली के लिए भी शिवसेना ने ऐसा ही किया है। यह एक नया प्रयोग है जब शिवसेना ने किसी रैली के लिए टीज़र जारी किया है, बिल्कुल उसी स्टाइल में जैसा कि फिल्मों का ट्रेलर होता है। ऐसा ही शिवसेना के एकनाथ शिंदे गुट ने भी किया है।

उद्धव ठाकरे गुट जहां परंपराओं की निरंतरता की बात कर रहा है और उसी पर उसका विशेष अनुरोध है, खासतौर से बॉम्बे  हाईकोर्ट से शिवाजी पार्क में रैली की इजाजत मिलने के बाद, वहीं एकनाथ शिंदे गुट भगवा पर जोर दे रहा है। उद्धव ठाकरे गुट का फोस ‘एक नेता, एक झंडा और एक मैदान’ पर है, जिसके जरिए लोगों को शिवाजी पार्क में शिवसेना की परंपरागत और ऐतिहासिक रैली का न्योता दिया गया है।


दोनों गुटों के बीच शुरु हुई वीडियो वॉर और हजारों लोगों के दोनों रैलियों में आने की संभावना के मद्देनजर मुंबई पुलिस के सामने बड़ी चुनौती आ गई है। चुनौती है किसी भी अनहोनी या दोनों गुटों के बीच संभावित टकराव को टालने की, बड़ी संख्या में बाहर से आने वाले हुजूम को काबू करने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की। हालांकि बॉम्बे हाईकोर्ट ने दोनों ही गुटों को हिदायत दी है कि किसी किस्म की गड़बड़ नहीं होनी चाहिए और अगर कुछ भी हुआ तो जिम्मेदारी उनकी ही होगी।

शिवाजी पार्क जहां एक तरफ शिवसेना की दशहरा रैली का परंपरागत मैदान है, वहीं शिंदे गुट की रैली का बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स स्थित एमएमआरडीए ग्राउंड मातोश्री (बाल ठाकरे का निवास स्थान) के ठीक पीछे है। बागी गुट की रैली घर के एकदम नजदीक होने से उद्धव ठाकरे कुछ असहज भी हैं।


वैसे तो मुंबई पुलिस ने ट्रैफिक आदि को लेकर सारी व्यवस्थाएं पुख्ता करने का दावा किया है, लेकिन शिवसेना में और फूट डालने के लिए शिंदे क्या स्टंट कर जाएं, कुछ कहा नहीं जा सकता। वैसे तो शिंदे गुट ने सफाई दी है कि वे अपनी रैली में बीजेपी कार्यकर्ताओं को नहीं चाहते, लेकिन एनसीपी खुलकर उद्धव ठाकरे की रैली के समर्थन में सामने आई है। एनसीपी ने तो रैली के समर्थन में मातोश्री और शिवाजी पार्क के पास बैनर-पोस्टर भी लगाए हैं।

एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने दोनों गुटों को हिदायत दी है कि कुछ गड़बड़ नहीं होनी चाहिए, लेकिन सूत्रों का कहना है कि दशहरा रैली के दौरान एनसीपी छिपकर कोई विशेष भूमिका नहीं निभाने वाली है। एनसीपी सक्रिय रूप से उद्धव की रैली के लिए लोगों को लामबंद कर रही है, क्योंकि उद्धव की रैली की सफलता में उसकी अपनी राजनीतिक कामयाबी भी कहीं न कहीं छिपी है और आने वाले समय में गठबंधन की मजबूती के लिए भी यह जरूरी है।

अब 12 घंटे से भी कम समय रह गया है दोनों रैलियों में और मायानगरी में रैलियों की हलचल और शोर-शराबा नजर आने लगा है।

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