नरेंद्र मोदी खुद ही हों संदेश, तो फिर जाति, क्षेत्र और लिंग के आधार पर मंत्रिमंडल का विश्लेषण कैसा?

नरेंद्र मोदी मंत्रिमंडल का विश्लेषण और इससे निकलने वाले संदेश का आंकलन करने पर एक ही बात सामने आती है कि नरेंद्र मोदी ही इस पूरी सरकार और कैबिनेट का संदेश हैं,ऐसे में जाति, धर्म, क्षेत्र और लिंग के आधार पर विश्लेषण करना क्या सटीक होगा?

फोटो: सोशल मीडिया 
फोटो: सोशल मीडिया

तसलीम खान

नरेंद्र मोदी दूसरी बार प्रधानमंत्री बन गए हैं और सरकार ने भव्य समारोह में शपथ ग्रहण कर लिया है। सरकार के गठन के बाद इस बात का विश्लेषण कई स्तरों पर हो रहा है। पारंपरिक रूप से विश्लेषण वही पुराने परंपरागत आधारों हो रहा है, जैसे राज्य, जाति, धर्म, युवा और महिलाओं को कितना प्रतिनिधित्व मिला। इन समीकरणों के आधार पर निष्कर्ष निकाला जाता था कि सरकार अपने मंत्रिमंडल के जरिए क्या संदेश देना चाहती है।

लेकिन, मोदी सरकार के दूसरे संस्करण में संदेश तो खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं, ऐसे में इस सरकार को कोई खास संदेश देने की खास जरूरत भी नहीं है। हां, मंत्रिमंडल में शामिल चेहरों से अगले पांच साल के रोडमैप का संकेत जरूर मिलता है। पर, इससे पहले कुछ एडिशन और ऑमिशन (कौन अंदर, कौन बाहर ) का आंकलन कर लेते हैं।

मोदी मंत्रिमंडल में सबसे चौंकाने वाले दो नाम हैं। वह हैं बीजेपी अध्यक्ष और मोदी के सबसे नज़दीकी अमित शाह और पूर्व विदेश सचिव एस जयशंकर। अमित शाह मंत्रिमंडल का हिस्सा होंगे, यह कयास यूं तो उसी वक्त से लग रहे थे, जब उन्हें लोकसभा उम्मीदवार बनाया गया था। अब कयास इस बात पर हैं कि उन्हें क्या जिम्मेदारी मिलेगी।

वैसे इसी में एक और चौंकाने वाली बात यह है कि भले ही अमित शाह नरेंद्र मोदी के बेहद करीबी हों, लेकिन सरकार में उनकी पोजीशन नंबर दो नहीं, बल्कि नंबर तीन होगी। नंबर दो पर राजनाथ सिंह जमें हुए दिखते हैं। यानी गृह मंत्रालय माना जाए कि राजनाथ सिंह के हिस्से ही आने वाला है।

ऐसे में अमित शाह के हिस्से वित्त मंत्रालय आने के कयास हैं। इससे क्या संदेश मिलता है? अमित शाह गुजरात के कारोबारी हैं, कई कंपनियों में अच्छा खासा निवेश है, 2014 में उत्तर प्रदेश के इंचार्ज के तौर पर और 2019 में बीजेपी अध्यक्ष के नाते जातियों और राज्यों का गणित और वहां की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को बेहतर समझते हैं। इस तरह अगर अमित शाह वित्त मंत्रालय का कार्यभार संभालते हैं तो इसका बाजार और कार्पोरेट जगत में अच्छा खासा असर देखने को मिलेगा। वहीं राज्यों की जरूरतों के हिसाब से भी सरकार की वित्त विभाग से संबंधित योजनाओं में एक नयापन भी सामने आ सकता है।

इस सरकार में सुषमा स्वराज नहीं हैं, ऐसे में पूर्व विदेश सचिव एस जयशंकर का कैबिनेट में शामिल होना जाहिर करता है कि विदेश नीति के मुद्दे पर मोदी सरकार एक नए अध्याय की शुरुआत कर सकती है। यानी आने वाले दिनों में नरेंद्र मोदी की कूटनीति का नया रूप सामने आ सकता है।

2014 की ही तरह इस बार भी उत्तर प्रदेश ने बीजेपी को सत्ता के सिंहासन पर पहुंचाया है। ऐसे में जाहिर हैं उत्तर प्रदेश के हिस्से ही सबसे ज्यादा कैबिनेट बर्थ आने वाली थीं, और आईं भी। यूपी से कुल आठ मंत्री सरकार में हैं, लेकिन तीन अहम नाम गायब हैं।

महाराष्ट्र की बात करें तो वहां से तीन मराठा मंत्रियों को मंत्रिमंडल में जगह मिली है। यह हैं शिवसेना के अरविंद सावंत और विदर्भ से आने वाले राव साहब दानवे और संजय धोत्रे। मराठा मंत्रियों की कैबिनेट में एंट्री महाराष्ट्र में शरद पवार के प्रभाव को कम करने की कोशिश कही जा सकती है। महाराष्ट्र में इसी साल विधानसभा चुनाव भी होने हैं।

विधानसभा चुनाव हरियाणा में भी होने हैं, इसलिए जाट बिरादरी भी मोदी के मंत्रिमंडल में नजर आती है। गुजरात का प्रतिनिधित्व तो यूं भी पीएम और अमित शाह के रूप में है, फिर भी वहां से और नेताओं को मंत्रिपरिषद का हिस्सा बनाया गया है। लेकिन रोचक है दक्षिण, और खासतौर से केरल का मंत्रिपरिषद में प्रतिनिधित्व। केरल से मुरलीधरन मोदी सरकार का हिस्सा हैं तो कर्नाटक में विद्यार्थी परिषद से जुड़े रहे नाम मोदी सरकार में नजर आ रहे हैं। लेकिन कर्नाटक के विवादास्पद मंत्री अनंत हेगड़े का पत्ता साफ है।

राजस्थान के लिए एक संदेश साफ मिला और वह है कि वहां अब वसुंधरा राजे युग का अंत हो गया है। राजस्थान से गजेंद्र शेखावत मंत्रिमंडल में हैं, उन्होंने अशोक गहलोत के बेटे वैभव गहलोत को हराया है।

बिहार से चौंकाने वाला गिरिराज सिंह का है, क्योंकि चुनाव से पहले तो उनकी सीट बदलने पर खूब हंगामा और रोना पीटना हुआ था, लेकिन जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार को हराकर उन्होंने फिर से मोदी मंत्रिमंडल में एंट्री मारी है और सीधे कैबिनेट मंत्री बने हैं। लेकिन राम कृपाल यादव की छुट्टी हो गई है।

कुल मिलाकर कई किस्म के समीकरण मोदी मंत्रिमंडल में दिखते हैं। राज्यों में जनाधार बढ़ाने की कोशिश दिखती है, जातियों का ध्यान रखने का प्रयास दिखता है, कार्पोरेट और बाजार के लिए संदेश दिखता है, तो विश्व समुदाय के लिए नई डिप्लोमेसी के प्रयत्न दिखते हैं।

इन सारे समीकरणों के बावजूद कोई भी विश्लेषण और समीकरण से बढ़कर संकेत तो यही है कि नरेंद्र मोदी खुद ही संदेश हैं।

Published: 31 May 2019, 12:25 PM
लोकप्रिय