NGT को सरकार की यह मंशा नहीं दिख रही कि वह विकास के नाम पर पर्यावरण पर बुलडोजर चला रही है!

सरकार एनजीटी के आदेश का पालन नहीं कर रही है। दूसरे में एनजीटी को सरकार की यह मंशा नहीं दिख रही कि वह विकास के नाम पर पर्यावरण पर बुलडोजर चला रही है। तो, क्या एनजीटी, मतलब राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण 'बगैर नाखून-दांत' के हो गई है? दुर्भाग्यवश, हो तो यही गया है।

फोटो: सोशल मीडिया
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पंकज चतुर्वेदी

बुंदेलखंड में छतरपुर शहर के सबसे बड़े तालाब किशोर सागर से अवैध कब्जे हटाकर इसे मूल स्वरूप में लाने के लिए एनजीटी, भोपाल में मुकदमेबाजी को अब 15 साल हो गए हैं। एनजीटी ने 7 अगस्त 2014 को तालाब के मूल रकवा, भराव क्षेत्र और 10 मीटर के ग्रीन जोन को कब्जामुक्त करने का आदेश दिया। इसका अनुपालन नहीं होने पर एनजीटी ने 20 सितंबर 2021 को छतरपुर जिला न्यायालय को इस पर कार्रवाई करने को कहा। द्वितीय अपर जिला न्यायाधीश ने 8 अक्तूबर 2023 को एनजीटी के आदेशानुसार कब्जा हटाने को जिला प्रशासन को कहा। कब्जा उसी तरह बरकरार है और कार्रवाई का अब भी इंतजार ही है।

इसके बरक्स एक ताजा उदाहरण भी। 2013 में यूनेस्को के जैवमंडल कार्यक्रम (ह्यूमन एंड बायोस्पियर प्रोग्राम) में शामिल, दुनिया में सबसे अच्छी तरह से संरक्षित उष्णकटिबंधीय वर्षा वनों में से एक और इंडोनेशिया और थाईलैंड के पास के ग्रेट निकोबार द्वीप समूह को लगभग 94,000 करोड़ रुपये से विकसित करने की सरकारी योजना को एनजीटी, कोलकाता ने 16 फरवरी को हरी झंडी दे दी है। यहां धरती की सबसे पुरानी आदिवासी आबादी के करीब 8,000 लोग रहते हैं। तटीय गांवों- खास तौर पर, चिनगेनह, पुलो बाहा, और कोकेओन- में रहने वालों को 2004 में सुनामी की वजह से विस्थापित कर दिया गया था, पर वे अपने मूल आवास पर अब कभी नहीं लौट पाएंगे। यहां ट्रांसशिपमेंट कंटेनर पोर्ट, एक बड़ा टाउनशिप, एक ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट, तथा गैस और सौर ऊर्जा संयंत्र के निर्माण होंगे और बाहर से लाए जाने की वजह से यहां की आबादी बढ़कर लगभग 6.5 लाख हो जाएगी। यहां 130 वर्ग किलोमीटर के जंगल काटे जाएंगे और उसकी भरपाई हरियाणा या मध्य प्रदेश में पेड़ लगाकर की जाएगी।


सतही तौर पर परस्पर विरोधी दिखने वाले लेकिन वस्तुतः एक ही नतीजे वाले इन आदेशों को किस तरह देखना चाहिए? पहले आदेश में सरकार एनजीटी के आदेश का पालन नहीं कर रही है; दूसरे में एनजीटी को सरकार की यह मंशा नहीं दिख रही कि वह विकास के नाम पर पर्यावरण पर बुलडोजर चला रही है। तो, क्या एनजीटी, मतलब राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण 'बगैर नाखून-दांत' के हो गई है? दुर्भाग्यवश, हो तो यही गया है।

आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के बाद भारत तीसरा ऐसा है जहां 2010 में इस तरह की विशेषज्ञ अदालत बनाई गई। उद्देश्य स्पष्ट था- पर्यावरण से जुड़े जटिल कानूनी विवादों का त्वरित निपटारा करना ताकि सरकार या बड़ी कंपनियां मनमाने तरीके से ऐसी परियोजनाओं को आगे न बढ़ा सके जिससे यहां की प्रकृति को नुकसान पहुंचे और वह उच्च न्यायालयों पर बढ़ते मुकदमों के बोझ को भी कम करे। लेकिन आज डेढ़ दशक बाद, यह संस्थान खुद ऐसे 'प्रदूषण' से जूझ रहा है जिसे 'प्रशासनिक शिथिलता' कहा जा सकता है। संसद में हाल ही में पेश किए गए आंकड़े चौंकाने वाले भी हैं।

एनजीटी की कुल स्वीकृत सदस्य संख्या 41 होनी चाहिए, वहीं वर्तमान में यह संस्थान केवल 5 सदस्यों के भरोसे चल रहा है, मतलब अपनी पूरी क्षमता का मात्र 12 प्रतिशत हिस्सा ही। इन 5 सदस्यों के कंधों पर 5,639 लंबित मामलों का बोझ है, मतलब मोटे तौर पर हर सदस्य के जिम्मे औसतन 1,100 से अधिक मामले। यह तब है जबकि संविधान का अनुच्छेद 21 हर व्यक्ति को न केवल जीवन का अधिकार देता है, बल्कि गरिमामय जीवन के अंग के रूप में 'स्वच्छ पर्यावरण' के अधिकार को भी समाहित करता है। सर्वोच्च न्यायालय ने 'सुभाष कुमार बनाम बिहार राज्य' जैसे कई मामलों में स्पष्ट किया है कि प्रदूषण मुक्त जल और वायु का अधिकार एक मौलिक अधिकार है। जब एनजीटी में सदस्य ही नहीं होंगे, तो इस मौलिक अधिकार की रक्षा कौन करेगा?


यह भी ध्यान रखने की बात है कि एनजीटी की संरचना में 'न्यायिक सदस्यों' और 'विशेषज्ञ सदस्यों' का संतुलन अनिवार्य है। विशेषज्ञ सदस्य वे होते हैं जिनके पास पर्यावरण विज्ञान, वन संरक्षण या प्रदूषण नियंत्रण में लंबा अनुभव होता है। वर्तमान में रिक्तियों का सबसे बड़ा प्रहार इसी विशेषज्ञता पर पड़ा है। जब क्षेत्रीय पीठें- जैसे, चेन्नई, पुणे, कोलकाता और भोपाल- सदस्यों के अभाव में पंगु हो जाती हैं, तो दिल्ली स्थित प्रधान पीठ को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से इन राज्यों की सुनवाई करनी पड़ती है। तकनीक का उपयोग निश्चित तौर पर करना चाहिए, पर पर्यावरण जैसे संवेदनशील मामलों में अक्सर 'स्पॉट इनस्पेक्शन' (मौके पर मुआयना) और स्थानीय पारिस्थितिकी की सूक्ष्म समझ की जरूरत होती है। ऐसे में, दूर बैठकर की गई सुनवाई से काम नहीं चलने वाला।

एनजीटी के कमजोर होने के नुकसान को कई तरीके से समझा जा सकता है। दिल्ली में यमुना के डूब क्षेत्र में होने वाले अतिक्रमण या अवैध निर्माण के मामले हों या गुजरात में 'स्टैच्यू ऑफ यूनिटी' के पास नर्मदा के जलग्रहण क्षेत्रों में पर्यावरण नियमों के उल्लंघन या तटीय नियामक क्षेत्र (सी आर जेड ) के नियमों की अनदेखी का मामला हो या फिर, दक्षिण भारत में पश्चिमी घाट के संरक्षण से जुड़ी कस्तूरीरंगन समिति की रिपोर्ट को लागू करने और उससे जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के मामले हों- निर्माण कार्यों पर स्थगन आदेश देने में या उसकी वैधता तय करने में वर्षों की देरी होने से कंक्रीट का ढांचा खड़ा हो चुका होता है और नदी के पारिस्थितिक तंत्र को होने वाली क्षति 'स्थायी' हो जाती है। जब अवैध रेत खनन या औद्योगिक कचरा बहाने वाली कंपनियों के खिलाफ मामले वर्षों तक लटके रहते हैं, तो उन्हें एक तरह की 'मौन स्वीकृति' मिल जाती है। इससे न केवल पर्यावरण को नुकसान होता है, बल्कि उन ईमानदार उद्योगों का भी मनोबल टूटता है जो नियमों का पालन करते हैं।


इस किस्म के अनगिनत उदाहरण हैं। 'आर्ट ऑफ लिविंग' द्वारा दिल्ली में यमुना तट पर आयोजित विश्व सांस्कृतिक महोत्सव मामले में भले ही जुर्माना लगाया गया, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि सुनवाई और प्रक्रिया में लगने वाले समय के कारण वह जमीन आज भी अपनी मूल प्राकृतिक स्थिति में नहीं लौट पाई है। इसी तरह, गोवा में मोपा हवाई अड्डे के निर्माण से जुड़े पर्यावरणीय क्लीयरेंस के मामले में सुप्रीम कोर्ट को तब हस्तक्षेप करना पड़ा जब एनजीटी की प्रक्रिया में लंबा समय लगा। सुप्रीम कोर्ट ने 'हनुमान लक्ष्मण अरोस्कर बनाम भारत संघ' मामले में स्पष्ट रूप से कहा था कि पर्यावरण की रक्षा 'सावधान पूर्ववर्ती' पर आधारित होनी चाहिए। यह सिद्धांत कहता है कि यदि पर्यावरण को गंभीर या अपूरणीय क्षति का खतरा है, तो वैज्ञानिक निश्चितता की कमी को सुरक्षात्मक कदम उठाने में देरी का बहाना नहीं बनाया जाना चाहिए। लेकिन जब जज ही नहीं होंगे, तो यह सिद्धांत केवल कानूनी किताबों तक सीमित रह जाएगा।

एनजीटी में सदस्यों की नियुक्ति में आनाकानी को लेकर सरकार का तर्क है कि डिजिटल बुनियादी ढांचे और ई-फाइलिंग से निपटान दर बढ़ेगी। लेकिन यह तर्क वैसा ही है जैसे किसी अस्पताल में ऑनलाइन अपॉइंटमेंट सिस्टम और डॉक्टरों के बिना केवल आधुनिक मशीनों के भरोसे इलाज का दावा। तकनीक प्रक्रिया को सुगम बना सकती है, लेकिन वह उस 'न्यायिक विवेक' का विकल्प नहीं हो सकती जो एक विशेषज्ञ सदस्य किसी प्रदूषणकारी इकाई की विस्तृत ईआईए (इनवायरनमेंटल इम्पैक्ट असेसमेंट- पर्यावरणीय आकलन अनुमान) रिपोर्ट पढ़ते समय इस्तेमाल करता है।

5,639 मामले केवल फाइलें नहीं हैं, ये सूखती हुई जीवनदायिनी नदियां हैं, कटते हुए फेफड़ेनुमा जंगल हैं और जहरीली होती हवा है। यह एक ऐसा पारिस्थितिकीय घाव छोड़ रही है, जिसकी भरपाई कोई भी आर्थिक विकास नहीं कर पाएगा। रिक्त पदों को भरना कोई प्रशासनिक उपकार नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के प्रति नैतिक और संवैधानिक ऋण है।