उत्तराखंड : न खेती, न रोज़गार और कान बंद करके बैठी है बीजेपी सरकार, ऐसे में पलायन न हो तो कैसे चले घरबार

पहाड़ के लोग लगातार खेत भी खाली छोड़ रहे हैं। इसकी बड़ी वजह है कि जैसे ही फसल तैयार होती है, बंदर या सूअर फसलों को बर्बाद कर देते हैं। लोगों का कहना है कि वे लगातार इस बारे में सरकार से अपील कर रहे हैं कि इसका स्थायी समाधान निकाला जाए लेकिन कुछ हो नहीं रहा।

Getty Images
Getty Images
user

एस राजू

नीरज राजनीति विज्ञान में पोस्टग्रेजुएट हैं। ढंग की कोई नौकरी नहीं मिली तो अपने गांव में एक दुकान खोलकर बैठे हैं। इससे ज्यादा कमाई नहीं होती इसलिए बीमा एजेंट का भी काम कर रहे हैं। वैसे, वह अब भी बेहतर जीवन के लिए एक अदद नौकरी की तलाश कर रहे हैं। परंतु उन्हें लगता नहीं कि उन्हें अपने राज्य में कोई बेहतर काम मिल पाएगा। नीरज उत्तराखंड के पौड़ी जिला मु्ख्यालय से कुछ ही दूरी पर स्थित एक गांव के रहने वाले हैं। उत्तराखंड में लाखों युवाओं की यही कहानी है।

राज्य में बेरोजगारी और पलायन की यह समस्या लगातार बढ़ रही है। सेंटर फॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तराखंड में मई से अगस्त, 2021 के चार महीनों के दौरान बेरोजगारी की दर 5.3 प्रतिशत रही जो देश के 28 राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों में 17वें नंबर पर थी। रिपोर्ट का पहलू यह भी है कि यहां बेरोजगारों की दर सबसे अधिक 20 से 29 वर्ष आयु वर्ग में है। इस आयु वर्ग में बेरोजगारी 56.41 प्रतिशत थी जबकि 20 से 24 वर्ष के आयु वर्ग में बेरोजगारी दर 81.76 प्रतिशत थी। इस उम्र में यहां ढंग का काम न मिलने के कारण ही युवा पलायन को मजबूर हो जाते हैं।

चुनाव को देखते हुए राज्य की भाजपा सरकार ने अब लगभग 22 हजार नई भर्तियों की कवायद शुरू की है। लेकिन पिछले रिकॉर्ड को देखते हुए इसे चुनावी कसरत मानते हुए आसानी से पचाया नहीं जा रहा है। दरअसल, राज्य के साल 2021-22 के बजट दस्तावेज के मुताबिक, विभिन्न विभागों में लगभग 57 हजार पद रिक्त है जो कुल पदों का 23 प्रतिशत है।

हालांकि केन्द्र और राज्य सरकारें युवाओं के लिए स्वरोजगार की कई योजनाएं चलाने का दावा करती हैं लेकिन वे योजनाएं कितनी सफल रहती हैं, इसका उदाहरण देते हुए अनुलोम बताते हैं कि एक योजना के तहत मुर्गीबाड़ा बनाने के लिए 35 हजार रुपये दिए जाते हैं। उन्होंने भी बड़ी उम्मीद से इस योजना के लिए आवेदन किया। भागदौड़ के बाद 35 हजार रुपये मिल गए। लेकिन यह पैसा केवल मुर्गीबाड़ा बनाने के लिए ही था। इसके बाद किसी तरह पैसे का इंतजाम करके देसी मुर्गे और मुर्गियां खरीदीं। एक मुर्गी दो दिन में एक अंडा देती है। यह अंडा 10 से 12 रुपये का बिकता है। लेकिन चारे और अन्य देखरेख पर रोजाना पांच से छह रुपये खर्च हो जाते हैं। बचत न होती देख उन्हें यह काम बंद करना पड़ रहा है। वह कहते हैं कि कुछ महीने पहले तक मुर्गियों का चारा 25 रुपये प्रति किलो आता था। उसका रेट बढ़कर 35 रुपये किलो हो गया है जिससे अब उन्हें घाटा हो रहा है।


कोरोना के पहले दौर में मार्च, 2020 में जब अचानक देशव्यापी लॉकडाउन लगा, तो बड़े शहरों में काम ठप होने पर उत्तराखंड में 3.50 लाख से अधिक लोग अपने गांव-घरों को लौटे। तब के मु्ख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने गढ़वाली में भावुक अपील जारी कर युवाओं से अपने प्रदेश में ही रहने को कहा और मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना सहित कई योजनाओं की घोषणा की। लेकिन ये काम नहीं आईं। उत्तराखंड ग्राम्य विकास एवं पलायन आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, सबसे अधिक पलायन पौड़ी जिले से हुआ और सबसे अधिक प्रवासी भी इसी जिले में लौटे लेकिन सरकारी योजनाएं इन प्रवासियों के काम नहीं आई। पौड़ी शहर के स्थानीय पत्रकार आशुतोष नेगी बताते हैं कि जिन लोगों ने अपने पैसे से कारोबार शुरू भी किए, स्थानीय लोगों की परचेज पावर न होने के कारण उनका कारोबार चल नहीं पाया और लॉकडाउन खुलते ही मजबूरन उन्हें लौटना पड़ा।

यहां खुले में शौच मुक्त (ओडीएफ) योजना तक को लेकर लोग अब तक उत्साहित नहीं हैं। स्थानीय निवासी दिनेश रावत बताते हैं कि सरकार एक शौचालय के लिए 12 हजार रुपये दे रही है लेकिन पहाड़ में कोई भी निर्माण करना महंगा पड़ता है। एक शौचालय बनाने में 40 हजार रुपये से अधिक खर्च आ जाते हैं, इसलिए अधिकतर लोगों ने ये पैसे नहीं लिए और शौच के लिए अब भी जंगल या खेत जाते हैं।

पहाड़ी क्षेत्र के लोग लगातार खेत भी खाली छोड़ रहे हैं। इसकी बड़ी वजह यह है कि जैसे ही फसल तैयार होती है, बंदर या सूअर फसलों को बर्बाद कर देते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि वे लगातार इस बारे में सरकार से अपील कर रहे हैं कि इसका स्थायी समाधान निकाला जाए लेकिन कुछ हो नहीं रहा। ऐसे में उनके लिए खेती करना मुश्किल होता जा रहा है।

आशुतोष नेगी कहते हैं कि स्थानीय लोग मांग करते रहे हैं कि चार धाम मार्ग को वन-वे कर दिया जाए और दूसरा रास्ता पौड़ी राष्ट्रीय राजमार्ग से जोड़ा जाए ताकि इस क्षेत्र में पर्यटन का विकास हो सके। लेकिन इसकी अनदेखा कर दी गई। इस वजह से पौड़ी क्षेत्र में आर्थिक गतिविधियां न के बराबर हैं। जब तक आर्थिक गतिविधियां शुरू नहीं होंगी, तब तक क्षेत्र का विकास संभव ही नहीं है।

नवजीवन फेसबुक पेज और नवजीवन ट्विटर हैंडल पर जुड़ें

प्रिय पाठकों हमारे टेलीग्राम (Telegram) चैनल से जुड़िए और पल-पल की ताज़ा खबरें पाइए, यहां क्लिक करें @navjivanindia