बंगाल चुनाव: स्वामी विवेकानंद की जन्मस्थली पर बीजेपी के हिंदुत्व का कोई नामलेवा नहीं

इस सीट पर मिलीजुली आबादी है, जिसमें बिहार, राजस्थान के लोगों को अलावा मारवाड़ियों की भी अच्छी तादाद है। आंकड़े बताते हैं कि इस इलाके के हिंदू अपनी धार्मिक पहचान से इतर अपनी राजनीतिक विचारधारा के आधार पर अपना विधायक चुनते रहे हैं।

फोटो : विश्वदीपक
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विश्वदीपक

महान समाज सुधारक स्वामी विवेकानंद के कोलकाता स्थित घर के दरवाजे पर ही एक नोटिस चस्पां है जिस पर लिखा है, ‘स्वामी की प्रतिमा के सामने किसी भी किस्म की राजनीतिक सभा करना प्रतिबंधित है।’ वहीं अंदर स्थित स्वामी की धातु की प्रतिमा पर लगे शिलालेख में लिखा है, “स्वामी विवेकानंद का जन्म इस घर में 12 जनवरी 1863 को हुआ था।”

वेदांत मानवतावाद के सिद्धांत को प्रतिपादित करने वाले स्वामी विवेकानंद ने शुरु से ही जातिवाद का विरोध किया था। लेकिन जातिवाद का नाम लेकर हिंदुत्व विचारधारा को प्रचारित करने वाली आरएसएस-बीजेपी ने स्वामी विवेकानंद का चित्रण एक अलग तरह से किया है। स्वामी विवेकानंद उन पहले बंगाली महापुरुषों में हैं जिनके सहारे बीजेपी बंगाल में अपनी जमीन तलाशने की कोशिश कर रही है।

बंगाल चुनाव: स्वामी विवेकानंद की जन्मस्थली पर बीजेपी के हिंदुत्व का कोई नामलेवा नहीं

लेकिन जिस स्थान पर स्वामी विवेकानमंद का जन्म हुआ, उस इलाके में बीजेपी की हिंदुत्व विचारधारा का असर विधानसभा चुनाव में नजर नहीं आता। स्वामी विवेकानंद का जन्मस्थल जिस इलाके में है वह जोरासंको विधानसभा सीट के दायरे में आता है। इस सीट पर 2001 से ही तृणमूल का वर्चस्व रहा है और इसे टीएमसी का गढ़ माना जाता है। बीजेपी इस इलाके में कोई रास्ता तलाशने में नाकाम ही साबित हुई है।

इलाके के एक कारोबारी जो आरएसएस के समर्थक भी हैं, वे शिकायत करते हैं कि हिंदू वोटों का बंटवारा हो गया है। उनका कहना है कि इलाके के हिंदू एकजुट नहीं हैं और उनके वोट बीजेपी, तृणमूल और लेफ्ट-कांग्रेस के बीच बंट गए हैं, जबकि मुस्लिम वोट एकजुट हैं।

बंगाल चुनाव: स्वामी विवेकानंद की जन्मस्थली पर बीजेपी के हिंदुत्व का कोई नामलेवा नहीं

हालांकि इस सीट पर मिलीजुली आबादी है, जिसमें बिहार, राजस्थान के लोगों को अलावा मारवाड़ियों की भी अच्छी तादाद है। आंकड़े बताते हैं कि इस इलाके के हिंदू अपनी धार्मिक पहचान से इतर अपनी राजनीतिक विचारधारा के आधार पर अपना विधायक चुनते रहे हैं।

संभवत: यही कारण है कि बीजेपी ने हिंदू वोटों का विभाजन रोकने के लिए इस बार यहां से एक मारवाड़ी मीना पुरोहित को मैदान में उतारा है। वहीं तृणमूल ने विवेक गुप्ता को उम्मीदवार बनाया है। वह भी एक मारवाड़ी हैं। इलाके में उनकी अच्छी प्रतिष्ठा है जिसके चलते बीजेपी के समीकरण गड़बड़ा गए हैं। गुप्ता कोलकाता से निकलने वाले के पुराने हिंदी अखबार सन्मार्ग के मालिक हैं। उन्हें इलाके के मुस्लिमों का भी अच्छा समर्थन मिल रहा है।

विवेकानंद के घर के नजदीक एक परचून की दुकान चलाने वाले दुकानदार का कहना है कि, “बीजेपी को यहां इसलिए मुश्किलें आ रही हैं क्योंकि सदियों से यहां लोग मिलजुलकर रहते आए हैं।” वे कहते हैं कि, “हिंदू और मुस्लिम सारे त्योहार मिलकर मनाते हैं।” वे कहते हैं कि वाम मोर्चे की सरकार के दौरान ज्यादा जोर सांस्कृतिक समागम पर था।

विवेकानंद के घर के दर्शन करने आए एक युवा से बात करने पर उन्होंने कहा, “स्वामी विवेकानंद को एक संत, आध्यात्मिक नेता और क्रांतिकारी सुधारक माना जाता है, न कि हिंदुत्व की राजनीतिक का प्रतिनिधि...।” करीब में ही किताबों की दुकाने चलाने वाले प्रसून कांत का कहना है कि यूं तो पश्चिम बंगाल को वाम मोर्चे की सरकार की जरूरत है लेकिन, इस बार ऐसा होना मुश्किल लग रहा है। वे यह भी कहते हैं कि बीजेपी को जो भी समर्थन मिल रहा है वह हिंदुत्ववादी राजनीति के कारण नहीं बल्कि मौजूदा सरकार के काम से नाराजगी और भ्रष्टाचार क आरोपों के चलते मिल रहा है।

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