पाबंदियों में ढील होते ही आतंकी निशाने पर गैर-कश्मीरी, घाटी छोड़ने को मजबूर व्यापारी-मजदूरों का पलायन

मोदी सरकार ने दावा किया था कि जम्मू-कश्मीर में बाहरी राज्यों से आने वाले व्यापारियों, श्रमिकों और पर्यटकों को आतंकी धमकियों के मद्देनजर अतिरिक्त सुरक्षा मुहैया कराई जाएगी। लेकिन पुलवामा में पंजाब के व्यापारी की हत्या के बाद ऐसे दावों की पोल खुल रही है।

फोटो: सोशल मीडिया
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अमरीक

केंद्र सरकार के हालिया इन दावों के बाद कि अनुच्छेद 370 खत्म होने के बाद असामान्य हुआ जम्मू- कश्मीर अब सरकारी कोशिशों से ‘सामान्य हो रहा है, पंजाब के व्यापारी धीरे धीरे वहां जाने लगे थे। इसलिए भी कि त्योहारी सीजन शुरू हो चुका है और कश्मीरी सेब की मांग बदस्तूर सबसे ज्यादा बनी हुई है। केंद्र और जम्मू कश्मीर प्रशासन का दावा था कि बाहरी राज्यों से आने वाले व्यापारियों, श्रमिकों और पर्यटकों को आतंकी धमकियों के मद्देनजर अतिरिक्त सुरक्षा मुहैया कराई जाएगी। लेकिन दक्षिण कश्मीर के पुलवामा के सोफिया क्षेत्र में पंजाब के अबोहर के सेब व्यापारी की हत्या के बाद ऐसे दावों की पोल खुल रही है और पंजाब के फल और अन्य व्यापारियों ने अब खरीदारी के लिए कश्मीर ना जाने की घोषणा की है।

बीते एक सप्ताह से सेब और अन्य कश्मीरी सामान खरीदने और मजदूरी के लिए वहां गए पंजाब के व्यापारी और श्रमिक घरों को वापस लौटने लगे हैं। उन्होंने केंद्र सरकार के प्रति नाराजगी जताई हैं कि सरकार कश्मीर के ‘सामान्य’ होने की बाबत सरासर झूठ बोल रही है।

फल व्यापारियों के अलावा लकड़ी, अंडा, चिकन, चावल, मेवा, केसर, राजमा, ऊन और कपड़े का थोक व्यापार करने वाले व्यापारी भी पिछले दिनों कश्मीर जाना शुरू कर दिया था लेकिन अब हत्याओं के बाद दहशत जुदा होकर वापस लौट रहे हैं।

त्योहारों के सीजन में कश्मीर और पंजाब के बीच कई वस्तुओं का करोड़ों रुपयों का व्यापारिक आदान-प्रदान होता है। 5 अगस्त के बाद यह सिलसिला पूरी तरह से टूट गया था और फिर सरकारी आश्वासनों और दावों के बाद दोबारा पिछले हफ्ते रफ्ता रफ्ता शुरू हुआ था। मजदूर भी जाने लगे थे। लेकिन अब वहां के मौजूदा हालात उन्हें घर वापसी के लिए मजबूर कर रहे हैं। बुधवार को पंजाब का एक फल व्यापारी आतंकी हमले में ठौर मारा गया और दूसरा गंभीर जख्मी हो गया। इसी के साथ दहशत में आए, पंजाब से कश्मीर में गए व्यापारी और श्रमिक पलायन करने लगे।

लुधियाना के एक बड़े फल व्यापारी कर्म सिंह सहोता ने 'नवजीवन' को बताया, “मैं अपने तीन सहयोगियों के साथ 13 अक्टूबर को सोपोर में सेबों का सौदा करने कश्मीर यात्रा पर निकला था लेकिन माहौल देखकर बीच रास्ते से लौट आया। बहुत से लोग इसी तरह लौट रहे हैं। सरकार गुमराह कर रही है कि वहां सब ठीक-ठाक है और व्यापार पटरी पर है। ऐसा है नहीं।”

जालंधर के अंडा व्यापारी एसपी सिंह कहते हैं, “मैं कश्मीर के कुछ हिस्सों में थोक में अंडा भेजता था। 5 अगस्त के बाद पेमेंट रुकी हुई थी। 15 अक्टूबर को नए आर्डर और बकाया पेमेंट लेने कश्मीर जा रहा था लेकिन पता चला कि वहां बाहरी व्यापारियों को निशाना बनाया जा रहा है। यह सुनकर मैं बीच रास्ते से लौट आया।”

जालंधर स्पोर्ट्स मार्केट के अरुण मेहरा भी इसी तरह बीच रास्ते से लौट आए। वह कहते हैं, “भ्रम की स्थिति बनी हुई है। हमारा बहुत कुछ कश्मीर पर निर्भर है पर हकीकत में वहां हालात नॉर्मल नहीं हैं। पता नहीं क्यों झूठा प्रचार किया जा रहा है कि बेखौफ होकर लोग वहां जाएं। दरअसल, वहां तो हर तरफ दहशत ही दहशत है।”

अमृतसर के कपड़ा व्यापारी जगतार सिंह कालड़ा के मुताबिक, “व्यापारियों को भ्रम में डाला गया। हकीकत यह है कि कश्मीर में लोग दोहरी दहशत में जी रहे हैं।” गुप्ता ट्रेडिंग कंपनी के मालिक अजय गुप्ता भी कहते हैं कि लगता नहीं, निकट भविष्य में पंजाब और कश्मीर के बीच बरसों से चलने वाला काम धंधा पहले की तरह सुचारू हो पाएगा। अमृतसर के मेवा व्यापारी रोशन लाल बजाज का कहना है, “अब बदले हालात में कश्मीरी व्यापारियों के पास पैसा नहीं और हमारे लिए वहां सुरक्षा नहीं। बेहद खराब स्थिति है।”

पंजाब के कश्मीर यात्रा अधूरी छोड़कर लौटे बहुत से लोगों के साथ बातचीत में यह पहलू प्रमुखता से सामने आता है कि अब आम कश्मीरी भी बाहर के राज्यों से आए लोगों को संशय की दृष्टि से देखता है। घोर अविश्वास इसकी एक बड़ी वजह है। गौरतलब है कि पंजाब के तमाम बड़े फल विक्रेता और आढ़ती, जो थोक के भाव में फल आगे बेचते हैं, सेब के सीजन में घाटी में डेरा जमा लेते हैं। वे बगीचों में लगे सेबों का सौदा पहले ही स्थानीय उत्पादकों से कर लेते हैं। मजदूर भी वे अपने साथ लेकर जाते हैं जो तुड़ान और पैकिंग और लदान का काम करती है। सालों का यह सिलसिला अनुच्छेद 370 के पचड़े के बाद थम गया था, अब कुछ शुरू हुआ तो दहशत और आशंकाओं भरी है अविश्वास की भावना ने उसे फिर बाधित कर दिया है। इससे दोनों तरफ एक जैसा आर्थिक नुकसान हो रहा है। सबकी रीढ़ टूट रही है। व्यापारी, उत्पादक और श्रमिक मुसीबत में हैं।

दिवाली पर पंजाब और शेष देश में कश्मीरी सेब की मांग सबसे ज्यादा रहती है लेकिन इस बार इस लिहाज से इनकी दिवाली यकीनन बेहद फिकी होगी। कोई नहीं जानता यह आलम कब बदलेगा। जब बदलेगा, तब कश्मीर में सेब सड़ चुके होंगे और और त्योहार बीत चुके होंगे। लगभग एक पखवाड़े पहले कश्मीर के राज्यपाल के सलाहकार फारुक अहमद खान ने आश्वस्त किया था कि कश्मीरी सेब के विक्रय को सुरक्षित घाटी से बाहर भेजा जाएगा लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। जो कश्मीरी सेब किसी तरह पंजाब पहुंचा है, उसकी कई पेटियों में "कश्मीर को आजादी दो" सरीखे नारे लिखे गए हैं।

पंजाब के मानसा जिले के कस्बे भिखी में सोपोर से आई सेब की एक पेटी से ऐसे कुछ सेब निकले जिनपर इस नारे के साथ साथ "पाकिस्तान जिंदाबाद" भी (मार्कर से) लिखा हुआ था। इन पंक्तियों को लिखने तक कुछ अन्य जगहों से भी ऐसे नारे कश्मीरी सेबों पर लिखे होने की खबरें मिल रही हैं। इस बाबत स्थानीय पुलिस विक्रेताओं की शिकायत पर रपट दर्ज कर रही है। यानी कश्मीर के मीठे फलों में भी अब अलगाववाद का जहर घुल रहा है और सरकार भी इसके लिए कम दोषी नहीं।

इस बीच नवजीवन को हासिल जानकारी के मुताबिक हजारों की तादाद में ट्रक ड्राइवरों, मजदूरों और छोटे बड़े व्यापारियों ने कश्मीर छोड़कर घर वापसी कर ली है। इसे लेकर उनके घर वाले भी उन पर दबाव बना रहे हैं। जालंधर जिले के गीदड़ पिंडी गांव के एक ट्रक ड्राइवर नाजर सिंह कहते हैं, “कश्मीर गया था तो जम्मू से घर बात की। तब तक खबर छप चुकी थी कि पंजाब के दो लोगों को कश्मीर में गोली मारी गई है। घरवालों ने तत्काल वापस आने को कहा। इस दलील के साथ कि अब वहां जाना खुदकुशी करने के बराबर है। गोली खाकर मरने से अच्छा अभाव में रह लेना है।”

कुछ ऐसी ही भावना अमृतसर के श्रमिक लालचंद की है। तो यह आज के कश्मीर का खुला सच है कि वहां इन हालात में जाना नहीं चाहता और जो गए हैं वे सही सलामत लौटने के दबाव में हैं। वहां सब ठीक होने का दावा करने वाली केंद्र सरकार को शायद यह सच नहीं दिख रहा। पंजाब को सबसे ज्यादा दिख रहा है और इसका नकारात्मक असर भी इसी राज्य को सहना पड़ रहा है, क्योंकि पूरे देश की तुलना में सबसे ज्यादा लोग पंजाब से कश्मीर जाते हैं।

Published: 18 Oct 2019, 3:04 PM
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