उत्तर प्रदेश चुनाव: ओबीसी जातियां ही तय करती हैं चुनावी नतीजे, संगठन से लेकर सरकार तक में अहमियत देने की कवायद

अगर ध्यान दिया जाए तो सामने आता है कि उत्तर प्रदेश में सक्रिय सभी प्रमुख राजनीतिक दलों ने जाति के आधार पर ही अपने दलों का गठन किया हुआ है। अर्थात जिस विधानसभा क्षेत्र में जिस जाति का वर्चस्व है, उसी जाति के लोगों को संगठन आदि में अहमियत दी जाती रही है।

Getty Images
i
user

जावेद छौलसी

google_preferred_badge

उत्तर प्रदेश मे अगले साल होने वाले विधांनसभा चुनाव की सरगर्मिया तेज़ हो गई है। उत्तर प्रदेश के चुनाव मे सबसे अहम भूमिका ओबीसी समाज की रही है। प्रदेश की जनसंख्या के अनुसार आधे से भी अधिक तकरीबन 52 से 56 प्रतिशत आबादी ओबीसी समाज से ही है। इस समाज की एक बड़ी विशेषता यह भी रही है कि ओबीसी समाज की अलग-अलग जातियों ने हमेशा अलग-अलग राजनीतिक दलों का समर्थन किया है। यूपी में ओबीसी की तकरीबन 80 जातियां हैं, जिनमें इस समय सबसे बड़ी जाति यादव समाज है। यादव समाज की प्रदेश की आबादी मे तकरीबन 10 प्रतिशत हिस्सेदरी है, वहीं ओबीसी श्रेणी मे यादवों की संख्या तकरीबन 20 प्रतिशत के आस पास है।

अगर ध्यान दिया जाए तो सामने आता है कि उत्तर प्रदेश में सक्रिय सभी प्रमुख राजनीतिक दलों ने जाति के आधार पर ही अपने दलों का गठन किया हुआ है। अर्थात जिस विधानसभा क्षेत्र में जिस जाति का वर्चस्व है, उसी जाति के लोगों को संगठन आदि में अहमियत दी जाती रही है। बीजेपी भी इसी कड़ी में ओबीसी को रिझाने की कोशिश में हैं और हाल के दिनों में ओबीसी समाज को सत्ता के साथ-साथ संगठन में भी अहम भूमिकाएं दी गई हैं।

उत्तर प्रदेश मे ओबीसी समाज को मुख्यत: यादव और गैर-यादव में विभाजित कर सकते हैं। गैर-यादव जातियों में कुर्मी, पटेल, कुशवाहा, मौर्या, शक्या, जायसवाल, जाट, कुमार, नाई, गुर्जर, राजभर आदि शामिल हैं। यादवों के बाद सबसे बड़ी जाति कुर्मी, पटेल, कुशवाहा, मौर्या आदि हैं, जो प्रत्येक विधानसभा में करीब 6 से 7 प्रतिशत हैं।

यादव समाज को आमतौर पर समाजावादी पार्टी का वोटर माना जाता है। बीते कुछेक साल में जिस तरह उत्तर प्रदेश में जाति आधारित राजनीति बढ़ी है, उससे एक बार फिर अनुमान लगाया जा रहा है कि यादव समाजवादी पार्टी के साथ ही जाएंगे। लेकिन, यहां एक पेंच है। यादव समाज में मुलायम सिंह के राजनीतिक रूप से सक्रिय न रहने के बाद समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव से अधिक महत्व शिवपाल यादव को दिया जाता है। ऐसे में अगर शिवपाल यादव और अखिलेश यादव की राहें अलग रहती हैं तो भले ही शिवपाल को उतना राजनीतिक लाभ न मिले, लेकिन अखिलेश यादव का सारा गणित बिगड़ सकता है।


बात अन्य जातियों की करें तो, कुर्मी समुदाय प्रतापगढ़, बरेली, सीतापुर, मिर्ज़ापुर, सोनभद्र आदि ज़िलों में काफी प्रभाव रखता है। जबकि मौर्या समुदाय इटावा, फिरोज़ाबाद, मैनपुरी, ललितपुर, हमीरपुर आदि ज़िलो में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। इन दोनों ही समुदायों को मूल रूप से बीएसपी और समाजवादी पार्टी का बराबर का वोटर माना जाता रहा है। लेकिन, बीते चुनावों में मोदी-योगी लहर में बीजेपी की जीत में इस समुदाय का काफी योगदान रहा है। अब देखना यह है कि मोदी लहर का प्रभाव इन समुदायों पर अभी भी बरकरार है या नहीं।

ओबीसी समाज में लोध समुदाय का भी अहम स्थान है। लोध समुदाय को बीजेपी के पक्के वोटरों में माना जाता रहा है।. बुलंदशहर, आगरा, अलीगढ़, उन्नाव, रामपुर आदि ज़िलों में चुनावी नतीजों में इस समुदाय की भूमिका अहम रहती है। इसके अलावा चौहान, मल्लाह, नोनिय, राजभर आदि जातियों भी चुनाव में अहम भूमिका अदा करती हैं। पूर्वांचल में राजभर समुदाय काफी प्रभावशाली माना जाता है। गुर्जर समुदाय जो कि नोएडा, गाज़ियाबाद मे निर्णायक भूमिका अदा करता है, वह भी पिछ्ले दो-तीन चुनाव से बीजेपी को समर्थन करते आया है। जाट समुदाय जो मुज़फ्फरनगर, बागपत, सहारनपुर में काफी प्रभुत्व रखता है, किसान अंदोलन के कारण इस बार बीजेपी के खिलाफ जाता नज़र आ रहा है।

जो राजनीतिक रणनीतियां अभी तक सामने आई हैं उसके मुताबिक बीजेपी इस बार उत्तर प्रदेश में ओबीसी की ऐसी छोटी-छोटी जातियों पर फोकस कर रही है जो विधानसभावार निर्णायक साबित हो सकती हैं। पिछ्ले कुछ समय में योगी की यात्राओं पर अगर नज़र डालें तो योगी ऐसी ऐसी जगहों पर गए हैं और लोगों से सम्पर्क किया है जहां अपने पूरे कार्यकाल में वे लाख बुलाने पर भी नहीं पहुंचे थे।

Google न्यूज़व्हाट्सएपनवजीवन फेसबुक पेज और नवजीवन ट्विटर हैंडल पर जुड़ें

प्रिय पाठकों हमारे टेलीग्राम (Telegram) चैनल से जुड़िए और पल-पल की ताज़ा खबरें पाइए, यहां क्लिक करें @navjivanindia