नीतीश राज में बंद हो गया 60 के दशक का फिजिकल एजुकेशन कॉलेज, अब खोल रहे खेल विश्वविद्यालय, गुजरात की तर्ज पर होंगे कोर्स

नीतीश राज में 60 के दशक का इकलौता सरकारी फिजिकल कॉलेज मान्यता नहीं हासिल कर पाने के कारण बंद हो गया। झारखंड बंटवारे के 5 साल बाद से लगभग पूरे समय मुख्यमंत्री रहते हुए ओलंपिक के लिए एक खिलाड़ी तैयार नहीं करा सके। लेकिन अब खेल विश्वविद्यालय खोलने जा रहे हैं।

फोटो : Getty Images
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शिशिर

बिहार के खेल इतिहास में नीतीश कुमार अपना नाम अमिट कराना चाह रहे हैं। इसका विधेयक मानसून सत्र में आज 27 जुलाई को आया है। बिहार में खेल विश्वविद्यालय खुलने जा रहा है। मेडिकल और इंजीनियरिंग के लिए अलग-अलग विश्वविद्यालयों के साथ इस खेल विश्वविद्यालय का विधेयक विधानमंडल से पास होकर राज्यपाल के पास जाएगा और प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। विधेयक में यह भी है कि पदेन मुख्यमंत्री इन तीनों के कुलाधिपति होंगे। मतलब, नीतीश कुमार का नाम पहले कुलाधिपति के रूप में स्थायी तौर पर अमिट हो जाएगा।

वैसे, यह वही नीतीश हैं, जिनके राज में 60 के दशक का इकलौता सरकारी फिजिकल कॉलेज मान्यता नहीं हासिल कर पाने के कारण बंद हो गया। झारखंड बंटवारे के 5 साल बाद से लगभग पूरे समय मुख्यमंत्री रहते हुए ओलंपिक के लिए एक खिलाड़ी तैयार नहीं करा सके। और तो और, झारखंड बंटवारे के 18 साल बाद क्रिकेट के लिए बीसीसीआई ने मान्यता दी तो स्टेडियम का मेंटेनेंस नहीं कराया। हालत यह है कि पटना के ईशान किशन देश का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, लेकिन बिहार नहीं झारखंड के नाम पर।

गुजरात की तर्ज पर होंगे कोर्स, लेकिन क्यों कोई करेगा कोर्स, सोचा ही नहीं

देश में खेल को पढ़ाने वाले किसी संस्थान में संस्थान में सबसे ज्यादा कोर्स है गुजरात की स्वर्णिम स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी में। इम्फाल में बनी नेशनल यूनिवर्सिटी तक में 4 ही कोर्स हैं। ऐसे में नीतीश के सपनों का खेल विश्व विद्यालय गुजरात की राह पर है। अपने गृह जनपद नालंदा के राजगीर में नीतीश यह विश्व विद्यालय खोलने जा रहे हैं। इसमें डिप्लोमा, ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई के साथ रिसर्च भी होगा। शुरुआत में फिजिकल एजुकेशन, स्पोर्ट्स फिजिक्स, स्पोर्ट्स ट्रेनिंग, स्पोर्ट्स मीडिया, स्पोर्ट्स मैनेजमेंट, स्पोर्ट्स एडमिनिस्ट्रेशन जैसे कोर्स होंगे। फिर यह बढ़ाते जाएंगे।

मंगलवार को विधानमंडल के पटल पर उतरे विधेयक का बहुमत के कारण पास होना तय है, लेकिन इस बात का तथ्यपूर्ण जवाब किसी के पास नहीं है कि यह कोर्स करेगा कौन और क्यों? दो दशक से बिहार में खेल पत्रकारिता कर रहे नवीन चंद्र कहते हैं कि, “जो मुख्यमंत्री खेल प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने में कभी दिलचस्पी नहीं दिखाते, उनकी ओर से विश्व विद्यालय का प्रस्ताव चौंकाता है। खासकर, उस राज्य में जिसे बीसीसीआई ने 18 साल तक खेल संगठनों की लड़ाई के बाद अपनी क्रिकेट प्रतियोगिताओं में एंट्री दी, लेकिन खिलाड़ियों को प्रैक्टिस के लिए ग्राउंड नहीं मिले। किसी खाली जमीन पर 6-8 फीट की 3-4 स्टेप वाली तीन-चार सीढ़ियां बनाकर उसे स्टेडियम बताने वाले बिहार के कला-संस्कृति एवं युवा (खेल) विभाग ने कभी यह नहीं देखा कि 14 करोड़ आबादी वाले बिहार से एक भी खिलाड़ी ओलंपिक के लिए क्यों नहीं जा पा रहा है।”


शत्रु से हुआ था प्यार तो कैबिनेट ने नाम बदला, तकदीर नहीं

1951 में पटना में फिजिकल एजुकेशन का कॉलेज खुला था। यहां के रजिस्टर बताते हैं कि 1990 तक दिल्ली, पंजाब, हरियाणा से यहां छात्र फिजिकल एजुकेशन की पढ़ाई के लिए आते थे। यह तब बिहार बोर्ड के लिए एग्जाम पर सर्टिफिकेट और डिप्लोमा देता था। 1995 के आसपास नेशनल काउंसिल फॉर टीचर एजुकेशन की प्रक्रिया शुरू हुई तो ट्रेनिंग वाले ऐसे संस्थानों को इससे संबद्धता कराने के लिए कहा गया। 1995 से 2005 तक यह नहीं हुआ। नीतीश सरकार आई तो इसने भी इस विषय पर ध्यान नहीं दिया, हालांकि पढ़ाई चलती रही। सन् 2005 के बाद से इस कॉलेज का सर्टिफिकेट कई जगह ठुकराया जाता रहा, क्योंकि यह नेशनल काउंसिल फॉर टीचर एजुकेशन से संबद्ध नहीं था। इसके बावजूद यह चलता रहा।

2014-15 में जब नीतीश कुमार और पटना के सांसद शत्रुघ्न सिन्हा में थोड़ी नजदीकी बढ़ी तो मुख्यमंत्री ने कैबिनेट की मुहर से इस कॉलेज का नाम इसके संस्थापक प्राचार्य बी. पी. सिन्हा के नाम पर कर दिया। शत्रुघ्न सिन्हा के पिता स्व. बी. पी. सिन्हा 1951 से 1959 तक इस कॉलेज के प्राचार्य थे। कॉलेज का नाम बी. पी. सिन्हा गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ हेल्थ एंड फिजिकल एजुकेशन हो गया, लेकिन किस्मत बदलने की प्रक्रिया नहीं हुई। 2013 वाले बैच के बाद कॉलेज में एडमिशन बंद हो गया, क्योंकि इसके प्रमाणपत्र को लेकर नौकरी मांगने जाने वाले फर्जी कहे जाने लगे थे।

बिहार प्लेयर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष और राष्ट्रीय जनता दल के नेता मृत्युंजय तिवारी ने बिहार में बूटा सिंह के समय लगे राष्ट्रपति शासन के समय इसके लिए अंतिम प्रयास किया, लेकिन कुछ हुआ नहीं। तिवारी कहते हैं कि नीतीश को कुलाधिपति का भी तमगा लेना था, इसलिए यह चोंचला है। विवि बनाना अच्छी बात है, लेकिन पहले खेल का माहौल तो बनाते। खिलाड़ी पैदा ही नहीं होंगे और खेल को पढ़ाने के लिए विश्वविद्यालय बनाएंगे। यह सिर्फ चेहरा चमकाने की राजनीति है।

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