मनवाधिकार दिवस की हकीकत: सिर्फ तारीख पे तारीख- बिना सुनवाई-मुकदमे के लाखों विचाराधीन कैदी जेलों में

आज यानी 10 दिसंबर को मानवाधिकार दिवस मनाया जाता है। इस दिन मानवाधिकारों के प्रति पूरी दुनिया में आए दिन प्रतिबद्धताएं जताई जाती हैं। भारत भी इसमें पीछे नहीं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और है।

फोटो : सोशल मीडिया
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संयुक्ता बासु

जगजीवन राम – 38 साल बिना मुकदमे के जेल

जगजीवन राम यादव के लिए जिंदगी जैसे 70 साल की उम्र में शुरू हुई जब वह 38 साल जेल में बिताने के बाद बाहर आए। उन्होंने इतने साल विचाराधीन कैदी के तौर पर बिताए और कभी ट्रायल शुरू भी नहीं हो सका। उन्हें हत्या के आरोप में 1968 में गिरफ्तार किया गया था और अप्रैल, 2006 में रिहा किया गया। हालांकि जेल में बिताए इतने सालों के दौरान उन्हें कभी पता नहीं चल सका कि आखिर उन्हें किस बात के लिए जेल में रखा गया। जेल में रहते हुए ही उन्होंने अपना मानसिक संतुलन खो दिया और उन्हें मानसिक चिकित्सा केन्द्र भेज दिया गया। उत्तर प्रदेश के फैजाबाद में जब ट्रायल कोर्ट में उनका मामला आया तो पुलिस ने कह दिया कि उनके मामले से जुड़े रिकॉर्ड गायब हैं। लिहाजा, कोर्ट ने कहा कि जगजीवन राम को जमानत पर रिहा नहीं किया जा सकता और कि रिकॉर्ड नहीं होने की वजह से उन्हें आरोपमुक्त भी नहीं किया जा सकता। उनकी पत्नी और एक बेटा है जिन्होंने उनकी गिरफ्तारी के बाद कभी न तो उन्हें देखा और न ही उनका कोई हालचाल मिला और ऐसे में उन्होंने मान लिया था कि जगजीवन राम की मृत्यु हो चुकी है। उनकी जिंदगी के 38 साल बर्बाद कर देने की जिम्मेदारी सरकार की ओर से मुआवजे की तो बात ही छोड़ दें, अफसोस तक नहीं जताया गया। यह है हाल हमारे देश में मानवाधिकार का!

मोहम्मद आमिर – 14 साल बाद आरोपमुक्त

मोहम्मद आमिर खान 1998 में 18 वर्ष के थे जब सादे कपड़े में आए पुलिस वाले उसे पुरानी दिल्ली की गलियों से उठा ले गए थे। तीन दिनों तक किसी अनजान जगह पर रखकर उसे टॉर्चर किया गया। उसके साथ इतनी बुरी तरह मारपीट की गई कि उसने मजबूर होकर कोरे कागजों पर दस्तखत कर दिए। उसके बाद उसे 19 आतंकी मामलों में गिरफ्तार दिखाते हुए मजिस्ट्रेट कोर्ट के सामने पेश किया गया। उसके खिलाफ लगाया गया कोई आरोप अदालत में सिद्ध नहीं हो सका और 2021 में उसे सभी मामलों में आरोपमुक्त कर दिया गया। लेकिन तब तक विचाराधीन कैदी के तौर पर वह जेल में 14 साल काट चुका था।

बॉलीवुड सुपर स्टार शाहरुख खान के बेटे आर्यन खान की अभी अक्तूबर में हुई गिरफ्तारी और उसे 20 से ज्यादा दिनों तक कैद में रखे जाने ने देश को झकझोर कर रख दिया और इस तरह मनमानी गिरफ्तारी और असमान जमानत के मुद्दे की ओर एक बार फिर मीडिया का ध्यान गया। लेकिन जेल में सड़ रहे जगजीवन राम और मोहम्मद खान-जैसे लोगों की कहानियों को भुला दिया गया।

जेल सांख्यिकी रिपोर्ट, 2019 के मुताबिक, भारत की जेलों में 70% कैदी विचाराधीन कैदी हैं, यानी बिना अपराध साबित हुए ही वे जेलों में बंद हैं। अमेरिका में यह संख्या महज 23.03% है। भारत में जेल की क्षमता 4,03,739 है लेकिन हकीकत यह है कि उनमें 118%, यानी 4,78,600 कैदी हैं। सोचने वाली बात यह है कि इनमें से 3,30,487 (69.05%) विचाराधीन हैं। 2018 में यह संख्या 3,23,537 थी जो 2019 में बढ़कर 3,30,487 हो गई और यह 2.15% की वृद्धि दिखाती है। वर्ष 2001 से 2019 के बीच दोषी कैदियों की तुलना में विचाराधीन कैदियों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। 70 के दशक के शुरू में दोनों की संख्या लगभग बराबर थी लेकिन 80 के दशक के शुरू से यह खाई चौड़ी होने लगी।

यूपी-बिहार में सबसे ज्यादा विचाराधीन कैदी

सबसे ज्यादा विचाराधीन कैदी उत्तर प्रदेश में है और इनकी संख्या 73,418 है जो देश की विभिन्न जेलों में बंद विचाराधीन कैदियों का 22.2% है। उत्तर प्रदेश के बाद सबसे ज्यादा विचाराधीन कैदियों की संख्या बिहार (9.5%, 31,275) और महाराष्ट्र (8.3%, 27,557) में हैं। देश में 5,011 विचाराधीन कैदी ऐसे हैं जो पांच साल से अधिक समय से जेल में बंद हैं और इनमें भी सबसे ज्यादा 42.74% कैदी अकेले उत्तर प्रदेश में हैं। विचाराधीन कैदियों में ज्यादातर (70.6 प्रतिशत) निरक्षर या अर्ध-साक्षर हैं और इससे इस बात का संकेत मिलता है कि वे सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े हैं।

सोचने को मजबूर करने वाले ये आंकड़े आपराधिक न्यायशास्त्र के बुनियादी सिद्धांतों के ‘दोषी साबित होने तक निर्दोष’, और ‘निष्पक्ष और त्वरित सुनवाई का अधिकार’ और संविधान से हर व्यक्ति को मिले ‘जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार’ के घोर उल्लंघन का प्रमाण हैं। हर साल हजारों-लाखों जिंदगियां तबाह हो जाती हैं क्योंकि वे बिना किसी अपराध के जेल में बंद कर दिए जाते हैं। ये लोग या तो थक-हार कर जमानत की कोशिश करना ही छोड़ देते हैं या फिर एक अदालत से दूसरी अदालत तक चक्कर काटते-काटते इनकी माली हालत खराब हो जाती है और वे हथियार डाल देते हैं। इससे भारत की जेल व्यवस्था पर भी बोझ बढ़ता है जिसमें पहले से ही क्षमता से ज्यादा लोग भरे हुए हैं।

जमानत का प्रावधान आपराधिक न्यायशास्त्र और संवैधानिक अधिकारों के बुनियादी सिद्धांतों का ही विस्तार है। भारतीय विधि आयोग की 268वीं रिपोर्ट में भी इस बात का उल्लेख किया गया है कि मानवाधिकार संबंधी दुनिया भर की घोषणा इसे प्रतिपादित करते हैं कि ‘जमानत सामान्य नियम है और जेल एक अपवाद’। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में यह भी कहा कि पारंपरिक रूप से जमानत आरोपी व्यक्ति की सुनवाई के दौरान उपस्थिति सुनिश्चित करने या सबूत या गवाह के साथ छेड़छाड़ से रोकने के लिए एक उपकरण था। अपराध सिद्ध होने को छोड़कर किसी भी व्यक्ति को जेल में रखने का कोई और कारण नहीं होता।

सर्वोच्च न्यायालय ने भी राजस्थान राज्य बनाम बालचंद उर्फ बलिया (एआईआर 1977 2447) के मामले में एक ऐतिहासिक निर्णय में ‘जमानत नियम, जेल अपवाद’ सिद्धांत को निर्धारित किया है जो संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों, खास तौर पर अनुच्छेद 21 के तहत स्वतंत्रता के अधिकार पर आधारित है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी समय-समय पर उच्च न्यायालयों और निचली अदालतों को हिदायत दी है कि इस सिद्धांत का पालन करें। फिर भी, आपराधिक मामलों में जमानत प्राप्त करना बड़ा मुश्किल होता है जिसके परिणाम स्वरूप बड़ी संख्या में विचाराधीन कैदी जेलों में हैं।

नेशनल डेटा ज्यूडिशियल ग्रिड (एनडीजेजी) के अनुसार, देश भर के उच्च न्यायालयों में 91 हजार, 1,96,861 याचिकाएं जिला अदालतों में और सुप्रीम कोर्ट में अंतरिम, नियमित या अग्रिम जमानत के लिए 931 याचिकाएं लंबित हैं। शीर्ष अदालत ने हाल ही में इन संख्याओं पर चिंता जताते हुए उच्च न्यायालयों को बैकलॉग दूर करने का निर्देश दिया।

अदालतों पर इतना बोझ होना भी एक कारण है कि इतने सारे लोगों को जमानत नहीं मिल पाती है। एनजेडीजी के अनुसार, पूरे देश में कुल 2,66,24,817 आपराधिक मामले लंबित हैं जिनमें से 2,07,06,446, यानी 77% एक वर्ष से अधिक पुराने और 14% मामले 5 से 10 वर्ष पुराने हैं। अंधाधुंध गिरफ्तारी, जमानत के अधिकार के बारे में कानूनी जागरूकता की कमी, कुशल और समर्पित वकीलों की कमी के कारण भी लोगों को जमानत पाने में दिक्कत होती है।

सुप्रीम कोर्ट और बिहार के छपरा जिले में प्रैक्टिस करने वाले एडवोकेट सौरभ कुणाल कहते हैं, पुलिस मनमाने तरीके से काम करती है। पहले तो वह अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करती है और उसके बाद जिसे चाहे, उसे उठा लेती है। इनमें तमाम कैदी तो ऐसे होते हैं जिन्हें एफआईआर की कॉपी भी नहीं दी जाती। वे नहीं जानते कि वे जेल में क्यों हैं लेकिन वे इतने गरीब हैं कि इसी को अपनी नियति मान लेते हैं। जेल के बाहर के जीवन में उनके लिए वैसे भी कोई आकर्षण नहीं होता क्योंकि उन्हें दो समय के भोजन की व्यवस्था करने के लिए संघर्ष करना पड़ता है और इसलिए वे जमानत की कोशिश भी नहीं करते हैं। उनके परिवार वाले भी उन्हें नहीं चाहते। वे जेल के अंदर अपना एक अलग ही जीवन तैयार करते हैं, लगभग जेल कर्मचारियों की तरह। वे शक्तिशाली कैदियों के कपड़े धोएंगे, उनके लिए खाना बनाएंगे, उनकी मालिश करेंगे वगैरह-वगैरह।

विधिआयोग ने सिफारिश की कि आपराधिक न्यायशास्त्र की धाराओं में मनमानी गिरफ्तारी को रोकने के लिए संशोधन किया जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि प्रत्येक गिरफ्तार व्यक्ति को उन आरोपों की प्रकृति और उनके जमानत के अधिकार, मुफ्त कानूनी सहायता आदि के बारे में लिखित और वे जिस भाषा को समझते हों, उसमें उन्हें समझाया जाए।

हालांकि इस मामले में गरीबी या निरक्षरता के अलावा और भी बहुत कुछ है। अन्यथा, भारत के चंद सबसे प्रभावशाली व्यक्तियों में से एक के बेटे आर्यन खान की 20 दिनों से अधिक समय तक गिरफ्तारी और जेल में रखने की क्या वजह हो सकती है? केन्द्रीय वित्त मंत्री रहे पी. चिदंबरम को जेल में 106 दिन बिताने पड़े। आखिर क्यों इस सरकार के शासन काल में सैकड़ों मानवाधिकार कार्यकर्ता, छात्र और शिक्षाविद बिना किसी मुकदमे के वर्षों तक जेल में बंद हैं और उनकी बार-बार जमानत की अर्जी खारिज कर दी जाती है?

सुधा भारद्वाज, वरवर राव, आनंद तेलतुम्बडे और अन्य लोगों के साथ एल्गार परिषद मामले में गिरफ्तार किए गए ऐक्टिविस्ट फादर स्टेन स्वामी की जेल में एक विचाराधीन कैदी के रूप में मृत्यु हो जाती है। ऐक्टिविस्ट सुधा भारद्वाज बिना मुकदमे के तीन साल से अधिक समय तक जेल में रहीं। गोरखपुर अस्पताल के बालरोग विशेषज्ञ डॉ. कफील खान, पत्रकार मनदीप पुनिया, कॉमेडियन मुनव्वर फारूकी- सभी को चार्जशीट या मुकदमे के बिना ही महीनों तक जेल में रहना पड़ा है।

इसके विपरीत, सरकार समर्थक पत्रकार अर्नब गोस्वामी की जमानत याचिका दायर करने के एक दिन के भीतर सुप्रीम कोर्ट के सामने सुनवाई के लिए आ जाती है और उन्हें तुरंत जमानत मिल जाती है। दक्षिणपंथी हिंदुत्व समूहों से जुड़े स्वयंभू गौरक्षकों द्वारा मॉब लिंचिंग के दर्जनों मामलों में सभी आरोपी जमानत पर बाहर हैं और पीड़ित परिवारों को इंसाफ नहीं मिल सका है। इन मामलों में तमाम आरोपी गरीब और अनपढ़ हैं लेकिन इस आधार पर उन्हें जमानत मिलने में कोई दिक्कत पेश नहीं आई क्योंकि सत्तापक्ष ने उन्हें जमानत याचिका को दायर करने और उस पर आगे की प्रक्रिया में सक्रिय रूप से कानूनी सहायता प्रदान की।


2018 में झारखंड उच्च न्यायालय ने अलीमुद्दीन उर्फ असगर अंसारी की लिंचिंग के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट द्वारा दोषी ठहराए गए और आजीवन कारावास की सजा पाने वाले चार मुख्य आरोपियों सहित 11 लोगों में से आठ को जमानत दे दी। भाजपा के मंत्री जयंत सिन्हा ने यह बात स्वीकार भी की थी कि भाजपा के कई सदस्यों ने इस मामले के आरोपियों के कानूनी खर्च के लिए पैसे दिए जिनमें खुद जयंत सिन्हा भी थे।

ऐक्टिविस्टों का कहना है कि जमानत-संबंधी सुधारों, सीआरपीसी संशोधन या फिर सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशों से यह पहेली हल नहीं होने जा रही कि आखिर क्यों कुछ लोगों को आसानी से जमानत मिल जाती है और कुछ को तब तक नहीं मिलती जब तक कि अदालतें अपने न्यायिक विवेक का समान रूप से इस्तेमाल न करें। ऐक्टिविस्ट और उत्तर प्रदेश में वकालत करने वाले अकरम अख्तर चौहान कहते हैं कि ‘गरीबी और निरक्षरता निश्चित रूप से ऐसे बड़े कारण हैं जिनकी वजह से बड़ी संख्या में विचाराधीन कैदियों को जमानत नहीं मिल पाती है। लेकिन अगर आप उन लोगों को निशाना बनाना चाहते हैं जो आपके लिए असुविधाजनक हैं या कुछ खास समुदायों से संबंधित हैं तो इन कारकों का मन मुताबिक इस्तेमाल करना आसान हो जाता है।’

एक उदाहरण देखिए। गाजियाबाद में एक दूध वाले की हत्या और लूटके मामले में अज्ञात लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई। जल्द ही, तीन मुस्लिम युवकों को उठा लिया गया। उस घटना को तीन साल हो गए हैं और वे अब भी जमानत पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। दूसरी ओर, मुजफ्फरनगर में 2013 के दंगों के दौरान लोगों के एक समूह ने बार-बार धमकी देने के बाद एक गवाह के भाई की हत्या कर दी थी जबकि पुलिस को बार-बार मिल रही धमकी के बारे में जानकारी दी गई थी। चौहान कहते हैं, आरोपी व्यक्ति के खिलाफ बाकायदा उसके नाम के उल्लेख के साथ प्राथमिकी दर्ज की गई थी और उसके खिलाफ पुख्ता सबूत भी थे, फिर भी वे सभी जमानत पर छूट गए। उन्होंने कहा, ‘जमानत की कार्यवाही का परिणाम भी काफी हद तक अभियोजन पर निर्भर करता है। अभियोजन किसी मामले को कमजोर करेगा या मजबूत, आरोपी की जमानत याचिका का विरोध करेगा या नहीं, यह सब काफी हद तक इस बात पर निर्भर करता है किआरोपी किस समुदाय से है। हम इन मुद्दोंको कैसे सुलझाएंगे?’

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