बिहार में बाढ़ राहत के नाम पर लूट-खसोट! 9 साल में 1 इंच नहीं बना तटबंध, मरम्मत पर खर्च हो गए 10.65 अरब

2011-12 से 2019-20 के बीच नौ साल में बिहार में तटबंध तो एक इंच नहीं बना, पर जो पुराने तटबंध हैं, उनकी मरम्मत पर 10 अरब 65 करोड़ 72 लाख से अधिक खर्च जरूर हो गए।

फोटो: सोशल मीडिया
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दिवाकर

बिहार में बाढ़ का ‘सीजन’ लाखों लोगों के लिए तबाही लाता है, पर कुछ लोगों के लिए यह खुशहाली भी लाता है। बाढ़ राहत के नाम पर होने वाली लूट-खसोट तो सब जानते हैं और उन पर हर साल हजारों खबरें लिखी ही जाती हैं, कई व्यंग्य रचनाएं भी पढ़ने को समय-समय पर मिल जाती हैं। लेकिन तटबंधों के नाम पर जो कुछ हो रहा है, उसे जानना भी जरूरी है। 2011-12 से 2019-20 के बीच नौ साल में बिहार में तटबंध तो एक इंच नहीं बना, पर जो पुराने तटबंध हैं, उनकी मरम्मत पर 10 अरब 65 करोड़ 72 लाख से अधिक खर्च जरूर हो गए।

यह जानना जरूरी है कि तटबंध बनाने का काम क्यों नहीं हो रहा है। दरअसल, तटबंध किसी काम के नहीं और इससे बाढ़ का खतरा और इससे होने वाली तबाही सब जान गए हैं। सरकार ने बागमती नदी की धारा के दोनों तरफ करीब 100 किलोमीटर और तटबंध निर्माण की अनुमति दी हुई है और 2015 के बाद से नरेंद्र मोदी सरकार इस पर लगातार जोर भी दे रही है। लेकिन कई बार के प्रयास के बाद भी इस पर अमल नहीं हुआ है। सरकारी प्रयास के खिलाफ जनता ने इस पर सघन आंदोलन चला रखा है, इस वजह से नीतीश सरकार को बार-बार अपने पैर खींचने पड़े हैं। बिहार में विभिन्न नदियों को लेकर करीब 40 साल से आंदोलन चला रहे अनिल प्रकाश का कहना है कि लोग समझ गए हैं किये तटबंध उनके लिए कितने विनाशकारी हैं इसलिए लोग खुद ही सघन आंदोलन चला रहे हैं और तमाम प्रयासों के बावजूद सरकार अपनी योजना में सफल नहीं हो पा रही।

बिहार की नदियों पर पिछले पांच दशकों से काम कर रहे इंजीनियर डॉ. दिनेश मिश्र ने अक्टूबर के दूसरे हफ्ते में एक वेबिनार में तटबंधों के विरोध के कारणों को इस तरह बतायाः बाढ़ के दौरान आने वाला नदियों का गाद खेती के लिए बहुत जरूरी है क्योंकि यह मिट्टीकी उपज को बढ़ा देता है जबकि तटबंध बन जाने के बाद बालू तो इन इलाकों में ठहर जाता है जबकि उपज बढ़ाने वाला गाद और दूर चला जाता है।

बिहार में बाढ़ राहत के नाम पर लूट-खसोट! 9 साल में 1 इंच नहीं बना तटबंध, मरम्मत पर खर्च हो गए 10.65 अरब

अब बात तटबंधों की मरम्मत की। ‘संडे नवजीवन’ ने सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत जो जानकारी हासिल की, उससे पता चलता है कि हर डिवीजन में हर साल करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं और अगले साल फिर वही बात होती है। खर्च की रफ्तार कितनी तेज है, इसका एक छोटा-सा उदाहरण। खगड़िया के बाढ़ नियंत्रण डिवीजन-1 ने जनवरी, 2011 से मार्च, 2011 के बीच के सिर्फ तीन महीने में 467.545 लाख रुपये खर्च किए। वैसे, 2011-12 से 2019-20 के बीच इस डिवीजन ने 2012-2013 में सबसे कम खर्च 143.49 लाख किए और इसने अधिकतम खर्च 5656 लाख 2018-19 में किए। खगड़िया के बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल-2 में इस अवधि में सबसे कम 586.75 लाख 2016-17 खर्च हुए जबकि अधिकतम 191 करोड़ से अधिक 2018-19 में खर्च हुए। मुजफ्फरपुर के हथौड़ी बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल ने 2015-16 में 26 लाख ही खर्च किए और अधिकतम 107 करोड़ रुपये 2018-19 में खर्च किए। गोपालगंज के जल संसाधन विभाग के अंतर्गत पडरौना बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल 1 ने सबसे कम 4.17 लाख 2013-14 में खर्च किए जबकि अधिकतम 38.18 लाख 2018-19 में खर्च किए। भले ये आंकड़े पढ़ने में उबाऊ लगें, पर यह खर्च के पैटर्न का अंदाजा तो देते ही हैं।

वैसे, बाढ़ से संबंधित यही खर्च नहीं होते। बाढ़ राहत कार्य में भी हर साल अरबों रुपये खर्च होते हैं। इस बारे में भी जानकारी के लिए ‘संडे नवजीवन’ ने आरटीआई के तहत आवेदन किया। लेकिन वह जानकारी हाल-फिलहाल नहीं मिलने वाली। जानकारी देने की अवधि अनंत काल के लिए करने के खयाल से बिहार सरकार ने बहुत आजमाया तरीका अपनाया है- राज्य मुख्यालय ने वह आवेदन जिला मुख्यालयों को भेज दिया है और फिर, जिला मुख्यालयों ने अंचल कार्यालयों को।

फिर भी, एक सूचना। अभी 10 अगस्त को बाढ़ से संबंधित समस्याओं पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बात की। एक प्रमुख न्यूज वेबसाइट के अनुसार, बाद में कुमार ने बताया कि बाढ़ राहत राशि के तौर पर 2017 में 2,385 करोड़ और 2019 में 2,000 करोड़ का वितरण किया गया। यह बताने की जरूरत नहीं कि 1,000 करोड़ का मतलब होता है 1 अरब रुपये।

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