सांसद पीएम मोदी का क्षेत्र बनारस सबसे प्रदूषित, दावा था बनाएंगे ‘क्योटो’

दूसरी तरफ ‘ग्रीनपीस इंडिया’ की हाल में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार वायु प्रदूषण के सन्दर्भ में उत्तर प्रदेश देश का सबसे प्रदूषित राज्य है और वाराणसी उत्तर प्रदेश का सबसे प्रदूषित शहर।

फोटो: महेन्द्र पांडे
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महेन्द्र पांडे

वायु प्रदूषण का जिक्र आते ही दिल्ली पर चर्चा शुरू होती है और दिल्ली पर ही खत्म भी होती है। इस बार तो बजट में भी दिल्ली के वायु प्रदूषण की चर्चा की गयी और आस-पास के राज्यों में खेतों में कृषि अपशिष्ट को जलाने से रोकने के लिए 1000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। इस प्रावधान के बारे में खूब प्रचार किया गया, जैसे दिल्ली के वायु प्रदूषण का यही एक कारण हो और अब दिल्ली में कभी प्रदूषण नहीं होगा।

दूसरी तरफ ‘ग्रीनपीस इंडिया’ की हाल में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार वायु प्रदूषण के सन्दर्भ में उत्तर प्रदेश देश का सबसे प्रदूषित राज्य है और वाराणसी उत्तर प्रदेश का सबसे प्रदूषित शहर। वर्ष 2016 से लगातार वाराणसी के वायु प्रदूषण को खतरनाक बताया जा रहा है और कई दिन यह देश का सबसे प्रदूषित शहर भी बन जाता है। पीएम मोदी को तो कभी गंगा बुलाती है और कभी बाबा विश्वनाथ बुलाते हैं, अनेक विदेशी अतिथियों को भी पीएम मोदी गंगा-आरती दिखाने ले जाते हैं, पर वहां के वायु प्रदूषण पर कभी चर्चा भी नहीं करते।

सांसद पीएम मोदी का क्षेत्र बनारस सबसे प्रदूषित, दावा था बनाएंगे ‘क्योटो’

ग्रीनपीस की रिपोर्ट को खारिज करना सरकार के बस में भी नहीं है क्योंकि इस रिपोर्ट में आंकड़े केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के हैं। यह रिपोर्ट देश के 280 शहरों के प्रदूषण के उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर तैयार की गयी है और इसमें देश के सबसे प्रदूषित शहरों में वाराणसी का स्थान छठा है। इससे ऊपर के शहर हैं - शीर्ष पर दिल्ली, फिर क्रम से फरीदाबाद, भिवाड़ी, पटना और देहरादून।

उत्तर प्रदेश के शहर हापुड़, बरेली, फ़िरोज़ाबाद, कानपुर, आगरा, नॉएडा, इलाहाबाद और मथुरा अत्यधिक प्रदूषित हैं। उत्तर प्रदेश का कोई शहर ऐसा नहीं है जो वायु प्रदूषण के सन्दर्भ में विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों का पालन करता हो और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मानकों का पालन भी महज़ 20 प्रतिशत शहरों में ही होता है। रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश में करीब 13 करोड़ आबादी ऐसे शहरों में रहती है जहां वायु प्रदूषण के स्तर को मापा ही नहीं जाता। लगभग 65 लाख बच्चे ऐसे शहरों में रहते हैं जहां प्रदूषण का स्तर खतरनाक है।

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पूरी रिपोर्ट यह बताने के लिए काफी है कि प्रदूषण केवल दिल्ली तक ही सीमित नहीं है। सरकारें और मीडिया के साथ ही प्रदूषण के क्षेत्र में काम करने वाले गैर सरकारी संगठन भी दिल्ली से आगे नहीं पहुंचते। सर्वोच्च न्यायलय और राष्ट्रीय हरित न्यायालय भी इस मसले पर केंद्र सरकार को लताड़ चुका है। 28 जनवरी को भी सर्वोच्च न्यायालय में यह मुद्दा उठा था।

प्रदूषण के मुख्य कारण हरेक शहर में एक जैसे ही हैं – निर्माण परियोजनाएं, इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं, मोटर वाहन, अनियोजित उद्योग, जेनेरटर, कचरे का जलना। सबके लिए कानून हैं, पर कानून का पालन करने वाले अपनी जेबें भरने पर ध्यान देते हैं और फिर आंखें बंद कर लेते हैं। कुछ अंकुश ग्रीन ट्रिब्यूनल ने लगाया था, पर अब केंद्र सरकार की लापरवाही के कारण यह बंद होने के कगार पर पहुंच चुका है। यहां 20 जज और 20 विशेषज्ञों में से केवल 6 जज और 2 विशेषज्ञ बचे हैं, बाकी पोस्ट भरी नहीं जा रही हैं।

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